Sunday, September 21, 2008

जंगल जिंदगी

कहानी
नूर मुहम्मद नूर
नूर मुहम्मद नूर समकालीन हिंदी ग़ज़ल में एक चर्चित नाम है। हिंदी के अलावा उर्दू, अरबी, फ़ारसी, बांग्ला और भोजपुरी में साहित्य की हर विधाओं में पिछले तीन दशकों से सक्रिय लेखन। दो दर्जन कहानियां, विभिन्न विधाओं की पचास पुस्तकों की समीक्षा, ढेरों व्यंग्य रचनाएं, ग़ज़लें, कविताएं हिंदी की विभिन्न लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित। कविताओं की पहली किताब ताकि खिलखिलाती रहे पृथ्वी, कहानी संग्रह आवाज़ का चेहरा, ग़ज़ल संग्रह दूर तक सहराओं में प्रकाशित। दस पुस्तकें प्रकाशनाधीन।


पिछले पांच दिनों के भयावह अंतर्द्वन्द्व से आज कहीं जाकर नसीम को मुक्ति मिली। सोमवार की दोपहर अपने दो साल के मटमैले चिथड़े पहने, बेटे को अपनी गोद में सुला रही, उस पागल जैसी औरत को देखने के बाद से, निरंतर पांच दिनों की लंबी मानसिक उथल-पुथल ने अंदर से पूरी तरह तहस-नहस कर रखा था। वह औरत बार-बार उसके जेहन में अपने बच्चे समेत आ धमकती। उसका बार-बार चारों ओर, आते जाते लोगों को देख कर हाथ फैलाना, रिरियाना...मुंह और बच्चे की ओर इशारा करना, खाते-पीते, सोते-जागते उसके जेहन में कौंधती रही वो। नसीम उसके बच्चे के बारे में सोचता। पता नहीं कौन है पिता उसका? अगर बच्चे को बुखार हो गया तो? अगर वो औरत ही किसी बड़ी बीमारी की गिरफ़्त में अचानक आ जाये तो...अच्छा बच्चे को बुखार है, यह औरत क्या जान पाएगी? बच्चा उस दिन औरत की गोद में बेसुध पड़ा सो रहा था...क्या उसे बुखार था? सोमवार की उस दोपहर जब वो घाट से पुस्तकालय के लिए पत्रिकाएं लेकर लौटा तब भी, उसने देखा बच्चा उसकी गोद में बेसुध पड़ा हुआ है...पास ही बैठे खीरे वाले से उसने दो छिले हुए खीरे कऱीद कर उस औरत को देते हुए कहा-- ''एकटा बाच्चा के देबै'' (एक बच्चे को दे देना)
''ओ घुमोच्चे।'' (वो सो रहा है)
''ठीक आछे। वो उठले ओके दिए देबे।'' (ठीक है, जब वो उठेगा तो उसे दे देना)
''हां, रेखे दिच्छी'।'' (अच्छा, मैं रख देती हूं)
उस औरत ने खीरे को कटोरे में डाल लिया था। वो फिर अपने दफ्तर चला आया था। पर एक नामालूम सी बेचैनी थी कि उसे मथे दे रही थी और उसकी जड़ में वो पागल सी औरत और उसका दो साल का बेटा...उसी दिन बाद में, कोई चार बजे के आसपास उसे हठात ख्याल आया अरे! उस बच्चे को बुखार है या नहीं यह तो, उस औरत को खीरे देते वक्त पूछना ही भूल गया था। नसीम अपने अंदर की पागल बेचैनियों पर सवार फिर भागा घाट की ओर। पर यह क्या? औरत वहां नहीं थी। वह अपने बच्चे के लेकर कहां चली गई? उसने दोनों तरफ के फुटपाथों पर दूर तक...घाट पर...फेयरली से लेकर आर्मेनियम घाट तक चारों ओर उस औरत को तलाशा पर वह कहीं नहीं थी। इसके साथ ही नसीम ने भी जैसे महसूस किया कि वह भी कहीं नहीं है। आखिर खुदा ने उसे इस बेदिल दुनिया में भी ऐसा कमबख्त दिल क्यों अता फरमाया? इतनी भावुकता, ऐसी छल-छल संवेदना कोई अच्छी बात नहीं मानी जाती इस दुनिया में। आलोचना भी अति भावुक एवं सघन संवेदनशील रचनाओं को अच्छी निगाह से नहीं देखती। इसे वह लेखक की कमज़ोरी और नासमझी कहकर ख़ारिज कर देती है।
फिर नसीम ने खुद को दिलासा दिया...अरे ठीक है, कहीं और चली गई होगी...हो सकता है बच्चे को सचमुम बुखार हो और उसे पता चल गया हो और वह बच्चे के लिए कहीं दवा मांगने चली गई हो। उसने कई तरह से खुद को तसल्ली दी...बड़े बेवकूफ हो यार। अरे इतना भी क्या परेशान होना? दुनिया में हज़ारों-लाखों ऐसे हैं, जिनका घर नहीं है, दर नहीं, ज़र-ज़मीन नहीं। खाने-पहनने को नहीं...ऊपर से दर-दर की ठोकरें, फिर तुम तो यूं परेशान हो रहे हो मानो वो कोई तुम्हारी रिश्तेदार हो...छोड़ो यार...कहीं होगी वह..फिर किसी दिन नज़र आ जाएगी अपने बच्चे के साथ..इस बार खीरा नहीं...पावरोटी बिस्कुट खिला देना। नसीम फिर अपने दफ्तर के 'कहीं' में लौट आया था, जैसे वह दुनिया के किसी और कहीं में हठात समा गई थी।
सोमवार, मंगलवार, वह अंदर ही अंदर टूटता-बिखरता रहा, पिघलता रहा...एक अजीब किस्म की उदासी-बेचैनी व्याकुलता में लिपटा, सोचता ...बसों में, दफ्तर और घर में...पत्नी ने कई बार उसको इस कैफियत के साथ पकड़ा भी...''का हुआ है जी? कई दिन से बड़ा खोए लग रहे हैं। ऑफिस में किसी से झगड़ा-वगड़ा हुआ है का? कौनो अफसर कुछ बोल दिया है...कितनी बार समझाया कि अफसर लोग से दूर रहिए...ऊ लोग आपका क़दर नहीं करेगा...पर आप?'' ''अरे, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। ...दौरा पड़ा है...देख नहीं रही हो, सुबह उठकर...फिर दफ्तर से आकर क्या करता हूं।''
फिर बुध से शुक्रवार तक यही कैफ़ियत बनी रही...पहले कुछ शेर सूझे...नसीम ने सोचा एक ग़ज़ल ही हो जाय...पर बात नहीं बनीं...फिर एक नज़्म...उसे लगा यही ठीक रहेगी। पर ग़ज़ल की तरह वो भी चार-पांच पंक्तियों के बाद बिला गई...तमाम मशक्कतों पर पानी फिर गया। न ग़ज़ल पूरी हुई, न नज़्म अपने अंज़ाम को पहुंची...बेचैनी थी कि उसने ग़ज़्लोनज़्म के अश्आर में दाखिल होने से इंकार कर दिया था...बहुत कोशिश की,...फिक्र और ख्याल के घोड़े दौड़ाए...पर हासिलअदूरी नज़्में-ग़ज़लें...फटे हुए दिल की बेचैन आवाज़ें अल्फाज़ में पनाह नहीं पा सकीं। उन ग़ज़लों के अलफाज़ में, जिनमें ग़ालिब ने दर्दे ग़म की कितनी ही कायनात निचोड़ डाली थीं। लेकिन उनसे भी तो वो सबकुछ, जो आदमी को आदमी के अंदर के आदमी और उसकी दुनिया को यकायक तबाहो बर्बाद कर दी जाती है, लफड़ों में उसी तरह नहीं निचोड़ा गया था। तब उन्हें भी अपने दुखों को बयान करने के लिए डायरी 'दस्तम्बू' लिखनी पड़ी थी...और ख़ुतूत भी।
पर आज उसने अपनी इन बेचैनियों से छुटाकारा पा ही लिया...पांच दिनों से अंदर ही अंदर घुमड़ रही बेचौनियों का लावा अन्तत: पूरी तरह पिघल कर बाहर निकल ही गया। उसने चार-पांच पन्ने घसीटे और पूरा का पूरा लावा एक कहानी के हज़ार शब्दों में... नसीम को तभी से कुछ राहत सी महसूस हो रही है...पर राहत से उसे अपनी अंदरूनी हलचलों-बेचैनियों से मिली है। पर वो औरत और उसका नंगधड़ंग मटमैला भूखा बच्चा...उस औरत और बच्चे को उसने अपनी कहानी में नहलाया और अच्छे कपड़े पहनाकर अच्छे भोजन भी दिया है...अपने मन की तसल्ली उसने कहानी लिख कर कर ली है...अपना सारा बेचैन गुबार भी उसने निकाल लिया है...पर सचमुच वह औरत क्या अब तक कहीं नहा चुकी होगी और उसने अपने बच्चे को भी नहला दिया होगा? क्या उन दोनों ने इस समय साफ़ कपड़े पहन लिये होंगे...बढ़िया भरपेट भोजन क्या उन्हें मिल गया होगा? क्या वह औरत इस समय किसी सुरक्षित स्थान पर अपने बच्चे को अपनी छाती से चिमटाए सुख की नींद सो रही होगी?
नसीम को लगा उसकी राहत बाढ़ज़दा लोगों को मिली रही राहत से ज़्यादा नहीं है। उन्हें आसमान से गिराए गए चिउड़ा-गुड़-बिस्कुट के पैकेट बड़ी मुश्किल से मिल पाते हैं, और उसे एक कहानी मिल गई है...लेखक का ज़मीर भी लेखक ही होता है...नसीम को लगा मगर उसके लेखक का ज़मीर मगर लेखक नहीं है...वह लेखक की तरह नहीं सोचता...शाइरों की तरह फिक्रमंद और फनपरस्त नहीं है...
उसका ज़मीर उसके अंदर से बल खाकर बाहर निकल आया और बोंसाई आदमी की शक्ल में उसके राइटिंग टेबल पर खड़ा हो गया... ''क्यों मिल गई तुझे राहत? पांच दिन से इसी के लिए तड़प रहा था न तू? ग़ज़ल, नज़्म और आखिर में कहानी... वाह क्या कहानी है? एक औरत जिसका कोई नहीं...पर उसका एक बच्चा है...वह भीख मांग कर अपना और अपने बच्चे का गुजारा करती है...फुटपाथों पर रहती है...अरे! वह भी पैदा हुई होगी...होंगे उसके भी मां-बाप...भाई-बहन...रिश्तेदार कहां मर गए सब? उस बच्चे का बाप कौन है? कहां है वो... किसने उस औरत को इस दशा में पहुंचाया...देखा है तुमने...किसी मर्द को एक बच्चे के साथ रहते हुए इस हालत में...फुटपाथ पर भीख मांग कर खाते हुए...चीरहरण द्रोपदी का, युधिष्ठिर का क्यों नहीं? क्या है औरत में जो सिर्फ और सिर्फ उसी की बेहुरमती, उसी का अनादर..हर काल खंड में...और आज भी स्त्री विमर्श...काहे का विमर्श...विमर्श के लिए विमर्श...दलित विमर्श...दलित को और...और...रोज...रोज पददलित करो और फिर उस पर दलित विमर्श... कहानी लिखकर राहत महसूस कर रहे हैं...अरे कैसी और कहां की राहत...क्या राहत पाने के लिए ही लिखा जाय केवल? और चीजें-सूरते बनी रहें...प्रेमचंद ने सैकड़ों कहानियां लिखीं, उपन्यास लिखे, भाषण दिए...कथा और उपन्यास सम्राट माने गए...सारा जीवन उन्होंने किसानों-मजूरों और गरीबों की कहानियों की खेती की। आज उनके नाम पर लाखों-करोड़ों के वारे न्यारे हो रहे हैं लेकिन आज स्थिति क्या है? उनके हलकू-होरी मुल्क में चारों ओर आत्महत्याएं कर रहे हैं...जगह-जगह उनके हलकू-होरी की ज़मीनें जबरन उनसे छीन कर उन्हें मारा पीटा और उनकी ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है, उनके घीसू-माधव की संततियों की संख्या देश भर में दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रही है...कालिदास की शकुंतला ही उनकी निर्मला है...और तुम्हारी निर्मला औरत...यह औरत जो अनाम है...और निश्चित रूप से वह लड़का इस औरत का भरत नहीं है...कौन है यह लड़का....कहानी लिख कर राहत महसूस कर रहे हो...पूछो...पूछो...अपनी बीवी से पूछो...सारा सारा दिन गृहस्थी के हिमालय वो लांघती है....पार करती है रोज रोज अभावों के भयावह जंगल...। वसंत जले हुए वनों की तरह उसके होठों पर फड़फड़ाता रहता है...सारा...सारा दिन...झाड़ू-बुहरू, धोना-पोंछना, सीना-पीरोना, रसोई और...रात फिर तोड़ती है सितम...सितम उसकी देह पर...और वह पसर जाती है पृथ्वी की तरह बेजुबान....पूछो...पूछो...कितना राहत महसूस करती है वह यह सब करते हुए...एक कहानी लिखकर राहत महसूस कर रहे हो....और बस सारी जिम्मेदारी खत्म....लानत है...हज़ार लानत है तुम पर....तुम्हारे लेखक पर...आख थूsss....
इतना लंबा डायलॉग झाड़ कर नसीम का ज़मीर तो गायब हो गया पर उसने सिर पकड़ लिया। लगा किसी ने उसके सिर पर हथौड़ों से प्रहार किया हो। उसने एक सिगरेट सुलगा ली मानो ऐसा करते ही उसे इस भयानक मानसिक स्थिति से मुक्ति मिल जाएगी। थोड़ा स्थिर होने पर फिर वह कहानी के नेकपल ठीक करने लगा...तभी उसने देखा...पत्नी जो रसोई में थी...हठात् बरामदे में आकर फर्श पर धम्म से बैठ गई 'या अल्लाह! रहम कर मालिक।' उसकी आवाज़ में एक अजीब तरह की वेदना और खीझ भरी हुई थी और उसके भाव भी जैसे उसके चेहरे पर उभर आए थे. उसने देखा गमले में आटा सानने के लिए अभी वैसा ही पड़ा हुआ था। सामने जग में पानी भी पड़ा था। उसने इस बार गौर से देखा, गर्मी और घमौरियों की मार से पत्नी की गर्दन और निचले हिस्से स्याह धब्बों से हो रहे थे।
''क्या हुआ? बहुत थक गई लगती हो, तबीयत तो ठीक है ना...दो... मैं आटा सान दूं....''
पत्नी ने उसे घायल सिंहनी की तरह घूर कर देखा मानो नसीम ने कोई बहुत गलत बात कह दी हो। ''हम आपको बोले हैं आटा सानने के लिए?''
''नहीं लेकिन सान दूंगा तो क्या हो जाएगा? सारा दिन ही तो खटती हो...अगर मैं इसमें थोड़ा हाथ बंटा दूं तो इसमें गलत क्या है? आखिर मैं कर ही क्या रहा हूं? कहानी ही तो लिख रहा हूं...कहानी-कविता लिख सकता हूं तो आटा भी सान सकता हूं। मैं क्या कोई लाट-गवर्नर हूं?''
''नहीं...नहीं...आप अपना ही काम कीजिए। जिसका जो काम, उसको वही करे तो अच्छा।''
''क्यों? तुम तो आजकल देख रहा हूं कविताएं भी लिख रही हो। एक पूरी नई डायरी तुमने लगभग भर दिया है। यह क्या तुम्हारा काम है?''
''वो तो मैं ऐसे ही , जब कुछ फुरसत होती है, नींद नहीं आती है तो लिख लेती हूं...पर आप तो कवि हैं....आपका इतना नाम..मान-सम्मान है...इतना छपता है....किताबें हैं....आपका तो काम ही लिखना-पढ़ना है...आटा सोनेगो--अचानक आकर कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा? कहेगा कि देखो मरद से घर का काम करवा रही है।''
''क्यों यह घर मेरा नहीं है क्या? मैं घर का काम क्यों नहीं कर सकता? वैसे भी सारा काम बाहर का करता ही हूं। राशनपानी, दवा-दारू, सब्जी, कपड़ा-लत्ता कौन लाता है? मैं ही ना...लाओ...इधर दो...सान देता हूं आटा...जाओ तुम थोड़ा आराम कर लो।''
नसीम ने उठकर आटा का गमला ले लिया। अभी उसमें वो वहीं बैठकर इसके पहले कि पानी डालता...मोबाइल घनघनाने लगा। विद्युत गति से उठकर नसीन ने मोबाइल कान से चिपका लिया। ''हलो,'' उधर से आवाज़ आ रही थी।
''नानू, सलामालेकुम,...क्या करते हैं? मैं साहिल बोलता...नानी कहां है...खाला..अम्मी...मामा...'' नाती का फोन था। उसकी मां ने फोन लगाकर उसे थमा दिया होगा। चार-साढ़े चार साल का साहिल। उसका नाती। अचानक वो जैसे तनाव मुक्त हो गया था। एक अनजानी खुशी जाने कहां से आकर उसके दिल में समा गई थी। उसने पत्नी को आवाज़ दी ''ए जी, सुनती हो...नाती को फोन है...लो बात कर लो।'' उसने पत्नी को फोन थमा दिया था।
पर तभी उसके जेहन में वह औरत अपने बेटे के साथ कौंध गई...लगा यह वही लड़का है...जो नानू कहकर फोन कर रहा है...और उसकी मां वही पगली सी औरत...उसकी बेटी ही जैसे...उसकी अपनी बेटी...अपना नाती...।

Thursday, September 18, 2008

मन में खड़ी थी दीवार

उर्दू कहानी

बीच की दीवार--भाग 2

गियासुर्रहमान
अनुवाद : नसीम अजीजी


कल कहानी के पहले भाग दंगा और एक बाप की बेबसी में आपने पढ़ा मशकूर अली का संकट। आज पढ़िए कहानी की दूसरी और आखिरी किस्त

आस-पड़ोस में सभी हिंदुओं के मकान थे। यों तो उनके ताल्लुकात सभी से अच्छे थे लेकिन इस फ़साद ने तो दिलों में दरारें पैदा कर दी थीं, किस पर एतबार किया जाय? उनके घर की दीवार के उस तरफ पंडित रतनलाल रहते थे। उनकी बच्ची भी सुग़रा के साथ एक ही स्कूल में पढ़ती थी। दोनों में इस क़दर दोस्ती थी कि एक दूसरे के बगैर एक पल भी रहना गंवारा न था। ऊषा की गुड़िया और सुग़रा का गुड्डा, जिनकी कई बार शादी रचाई गई थी, आज अलग-अलग थे। ऊषा उधर रो-रो कर सुग़रा के घर जाने की जिद कर रही थी लेकिन पंडित रतनलाल खतरा महसूस कर रहे थे। ''मशकूर अली मुसलमान है, वैसे तो वो भला आदमी है लेकिन दंगे में तो सारे मुसल्ले एक जैसे हो जाते हैं। नारा-ए-तकबीर की आवाज़ कान में पड़ते ही आपे से बाहर हो जाते हैं। मैं अपनी बेटी को उसके घर भेजूं और वो उसका गला दबा दे तो क्या होगा?''
वो अपनी बेटी को बहुत समझाते लेकिन उसकी जिद बढ़ती ही जा रही थी। उधर सुग़रा की हालत ग़ैर हो रही थी। मशकूर अली की बेगम और राशिदा रोने लगीं। मशकूर अली उन्हें दिलासा तो दे रहे थे लेकिन खुद उनकी आवाज़ भी भर आई थी और आंखें डबडबाने लगीं। वो कुछ कहना ही चाहते थे कि अचानक उनकी दीवार पर आहट हुई। रात काफी हो चुकी थी। कोई उनके घर की दीवार तोड़ रहा था। दीवार के उस तरफ पंडित रतनलाल का मकान था। मशकूर अली ने अपनी बंदूक कस के पक़ड़ ली। उसमें कारतूस भर दिए और खतरे से निपटने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने बेगम से कहा कि वो सुग़रा को लेकर दूसरे कमरे में चली जायं और राशिदा को अपने साथ रहने का हुक्म दिया। वो दिल ही दिल में बड़बड़ाए, '' मुझे रतनलाल से ऐसी उम्मीद न थी कि वो फसादियों को अपने घर से मेरे घर में दाखिल करेगा। वैसे तो बड़ा प्यार जताता था लेकिन आज उसने अपना कमीनापन दिखा ही दिया।''
मशकूर अली ने मुस्तहकम इरादा कर दिया कि फ़सादियों के अंदर घुसते ही वो गोली चला देंगे चाहे उनमें रतनलाल ही क्यों नो हो, जब उसको दोस्ती का एहसास नहीं है तो मैं क्यों हिचकिचाऊं।
दीवार के पीछे से कुदाल की ज़र्बें लग रही थीं और हर ज़र्ब के साथ मशकूर अली के दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी, राशिदा उनके पीछे सहमी हुई, ज़ख्मी फ़ाख़्ता की तरह कांप रही थी--''पुराने ज़माने की दीवार इतनी आसानी से नहीं गिरेगी''---एक जगह से चूना उखड़ना शुरू हुआ। मशकूर अली दीवार के बिल्कुल करीब आ गए। बहुत देर के बाद दीवार की एक ईंट घऱ में गिरी और आर-पार एक सुराख हो गया। मशकूर अली ने ललकार कर कहा--''खबरदार! अगर किसी ने अंदर घुसने की कोशिश की तो गोली चला दूंगा।'' और उन्होंने बंदूक की नाल ईंट से निकले हुए सूराख पर लगा दी लेकिन दूसरे ही लम्हे ऊषा की आवाज़ ने चौंका दिया।
''मशकूर चाचा, मैं सुग़रा के लिए खाना लाई हूं।'' और उसने सूराख से एक छोटा सा टिफिन अंदर की तरफ बढ़ा दिया।

Wednesday, September 17, 2008

दंगा और एक बाप की बेबसी

उर्दू कहानी

बीच की दीवार


गियासुर्रहमान
अनुवाद : नसीम अजीजी

पूरे दस दिन हो गए थे। फ़साद की आग जो भड़की तो बुझने का नाम नहीं लेती थी। सारे शहर में सख्त कर्प्यू के बावजूद वारदातें हो रही थीं। पूरी दस रातें आंखों में गुजर गईं। इस क़दर शोर-शराबे में नींद किसको आती है? फिर हर वक्त ये डर कि कहीं फ़सादी हमला न कर दें। यों तो पहले ही सब कुछ लुट चुका है लेकिन जान सबको प्यारी होती है और उससे भी प्यारी औलाद।
मशकूर अली और उनकी बेगम, अपनी दो बेटियों को गले लगाए बारगाहे-इलाही में दुआएं करते रहते थे कि ''खुदाया इन मासूम बच्चियों पर कोई आंच न आये, चाहे हमारी चिक्का बोटी कर दी जाये।''
बड़ी लड़की राशिदा हाई स्कूल पास करके इंटर में दाख़िल हुई तो अचानक ही उस पर ऐसा निखार आया कि पूरे मुहल्ले की नज़रों में समा गई। कॉलेज के मनचले हसरत भरी निगाहों से देखने लगे। आस-पास क्या, दूरदराज़ से भी कई पैग़ाम आने लगे लेकिन मशकूर अली ये कहकर इंकार कर देते कि ''अभी बच्ची पढ़ रही है और मैं इसको आला तालीम दिलवाना चाहता हूं। खुदा ने बेटा नहीं दिया तो क्या, ये मेरी बेटियां ही बेटों से बेहतर हैं।''
लेकिन राशिदा की जवानी ने मां-बाप की आंखों से नींद छीन ली थी और दिन-ब-दिन एक अजीब सा इज़्तेराब बढ़ता जा रहा था और पिछले दस रोज़ से तो वो सिर्फ राशिदा की फिक्र में इतने परेशान थे कि कोई मौत से भी इतना परेशान न होगा। वैसे कई बार मशकूर अली ने अपनी दो नाली बंदूक निकाल कर उसकी सफाई की थी और पुराने करातूस को धूप दिखाई थी। वो रोजाना कारतूस गिन-गिन कर रखते थे। कुल नौ कारतूस थे।

उन्होंने अच्छी तरह सोच रखा था कि अगर फ़सादी आते हैं, पहले तो सद्र दरवाज़ा ही आसानी से नहीं टूट सकेगा। अगर दरवाज़ा टूट भी जाता है और वो अंदर घुसने की कोशिश करते हैं तो मशकूर अली राशिदा को अपने साथ ही रखेंगे। जहां तक हो सका आठ कारतूसों से फसादियों का मुकाबला करेंगे और नवां कारतूस राशिदा की इज्जत बचाने के लिए काफी होगा लेकिन आज उन्हें राशिदा की कम और अपनी छोटी बेटी सुगरा की ज्यादा फिक्र थी। सुग़रा सात-आठ साल की थी और अपनी तोतली जबान में इतनी प्यारी बातें करती थी कि सभी उसके गरवीदा थे। पिछले तीन दिन से वो बुखार में मुब्तला थी। दवाई तो दरकिनार, खाने के लिए एक दाना भी बाकी न था।
मशकूर अली हमेशा ज़ख़ीरा अंदोजी के ख़िलाफ़ थे और कभी उन्होंने मुस्तक्बिल की फिक्र न की थी लेकिन अब पछता रहे थे।'' काश पहले ही एक आध बोरी आटा या चावल वैगरह जमा कर लेता तो आज ये नौबत न आती।'' उस कर्फ्यू में बिजली और पानी का निजाम दरहम-बरहम हो गया था। अब तो पीने का पानी भी बमुश्किल तमाम फराहम हो पा रहा था और फिर रह-रह कर सुग़रा का दिलदोज़ अंदाज़ के साथ खाना मांगना उन्हें बेचैन कर रहा था। आज तक उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए थे। जमींदारी खत्म हुई, जायेदाद के बंटवारे हुए। मशकूर अली के हिस्से में ये पुराना मकान और चार छोटी-छोटी दुकानें आईं, जिनका बरायेनाम किराया ही उनका जरिय-ए-गुज़र औक़ात था। उन्होंने इसी पर इक्तेफ़ा किया, लेकिन अपने भाइयों में सबसे बड़े होने के नाते उन्होंने जिद करके अपने बुजुर्गों की निशानी ये दो-नाली बंदूक अपने कब्जे में कर ली थी। कितने ही उतार-चढ़ाव आये, एक-एक करके घर की सभी क़ीमती चीजें सस्ते दामों में बिक गई। फाकों तक की नौबत आई लेकिन उन्हें अपने आबाई शानो शाकत की निशानी उस दो नाली बंदूक को बेचने का ख्याल भी नहीं, मगर आज वो अपनी सुग़रा की भूख की खातिर अपनी जान भी बेचने को तैयार थे। वो फ़कीरों की तरह भीख मांग कर भी अपनी बच्ची का पेट भरना चाहते थे लेकिन बाहर निकलना मुमकिन न था। कर्फ्यू ने सख्त शक्ल अख्तियार कर ली थी, देखते ही गोली मार देने के अहकामात जारी हो गए थे। बाहर पुलिस की जीप गुजरती और लाउडस्पीकर पर यही ऐलान करती कि कोई भी घर से बाहर न निकले।


क्या इस भीषण संकट से निकल पाए मशकूर अली? क्या सुग़रा को मिल पाया पेट भर खाना? क्या राशिदा की रक्षा कर पाए मशकूर अली अपनी दो नाली बंदूक से? जानने के लिए कहानी का अगला और आखिरी किस्त पढिए कल

Tuesday, September 16, 2008

सब कुछ माया है

मामाजी--दूसरी और आखिरी किस्त
रागिनी पुरी

कल कहानी मामाजी की पहली किस्त में आपने पढ़ा कि सुमेधा किस तरह अपने मामाजी के व्यक्तित्व से प्रभावित थी। आज पढ़िए कहानी की दूसरी और आखिरी किस्त

मन ही मन मामाजी की तारीफों के पुल बांधते बांधते सुमेधा का ध्यान अपने पापा की ओर चला गया है। बिलकुल मस्तमौला इंसान हैं उसके पापा। दिल के बिलकुल साफ, पर अपने दम पर तो वो घर को बिलकुल मैनेज नहीं कर सकते। अगर घर में वो अकेले हों और चार मेहमान आ जाएं, तो उन्हें तो कुछ सूझेगा ही नहीं...उन्हें तो हर चीज़ मम्मी से मांगने की आदत है...हां चाय शायद ज़रूर बना लेंगे। सुमेधा सोचते- सोचते हंसने लगी।राखी की रस्म हो गई है। काफी देर से हंसी ठहाकों का सिलसिला चल रहा है। पूरी तरह से फील गुड फैक्टर वाला माहौल है। नाश्ता भी लगभग हो ही चुका है। गर्मागर्म आलू के परांठे, घर का बना सफेद मक्खन और दही। अब गर्मागर्म मसालेदार चाय की चुस्कियों के साथ ठहाकों का दौर चल रहा है। बचपन की बातें, लड़ाई झगड़े, बेवकूफियां...सब याद की जा रही हैं।अब बस थोड़ी ही देर में स्वामीजी के आश्रम के लिए निकलना है। वहां से सत्संग के बाद सुमेधा मम्मी के साथ अपने घर चली जाएगी।

शंभू ने गैरेज से कार निकाल दी है और अब उसे चमका रहा है। घर के सभी लोग तैयार हो निकलने की तैयारी कर रहे हैं।सत्संग के बाद मामाजी स्वामीजी के साथ रहेंगे और मामीजी फैक्ट्री चली जाएंगी, कुछ ज़रूरी काम निपटाने। सभी सत्संग घर के लिए निकल पड़े हैं। कार मामाजी ही ड्राइव कर रहे हैं। सुमेधा पीछे मम्मी के साथ बैठी है। मामीजी आगे हैं। सीडी प्लेयर पर स्वामीजी का सत्संग चल रहा है। सभी उसमें खोए हैं...."मनुष्य अपने कर्मों से जाना जाता है। वो खाली हाथ आया है, खाली हाथ जाएगा। सारी माया यहीं रह जाएगी...इसलिए ऐ परमात्मा के बन्दे, पाप ना कर, कल किसने देखा है...मोहमाया त्याग दे।" सत्संग चल रहा है, सभी चुप हैं।

ट्रैफिक सिग्नल पर गाड़ी रुकी है। एक मैली कुचैली सी लड़की कार की ओर बढ़ रही है। बाल बुरी तरह उलझे हुए...छोटी सी फ्रॉक कई जगह से फटी हुई...हाथ में एक गंदा सा कपड़ा है, जिसे वो कार पर फेरने लगी है।

"साले बहन..., सुबह सुबह आ जाते हैं।" मामाजी ज़ोर से बड़बड़ाने लगे हैं। लड़की उनके शीशे के बिलकुल पास आ गई है...हाथ फैलाए हुए...कुछ बोल भी रही है, पर कार के अंदर उसकी कमज़ोर आवाज़ सुनाई नहीं दे रही।

"साले हराम के पैदा करके छोड़ देते हैं सड़क पर....हमने क्या टकसाल लगाई हुई है...चल भाग यहां से...!" मामाजी बोलते जा रहे हैं...पर लड़की वहीं खड़ी हुई है....हाथ फैलाए...सुमेधा का दिल कर रहा है उस बच्ची को कुछ देने का...पर मामाजी का गुस्सा देख हिम्मत नहीं हो रही। शरीर ही मानो जड़ हो गया है। ना मुंह से आवाज़ निकल रही है और ना शरीर हिल रहा है। अभी अगर पापा होते यहां तो मामाजी को ज़रूर टोकते और बेचारी सी बच्ची को ज़रूर कुछ देते। पर ज्यादा धक्का तो इस बात है कि मामाजी बोल रहे हैं ये सब..! उसके सोफिस्टिकेटेड मामाजी...!सिग्नल अभी तक लाल ही है। अब तो लड़की हाथ फैलाए गिड़गिड़ा रही है। कार के शीशे से हाथ नहीं हटाया है अभी तक।

"सालों हरामज़ादों...! समझ नहीं आ रही क्या..." मामाजी ने कार का शीशा नीचे किया है।"ओए तुझे समझ नहीं आ रही क्या...नहीं देना कुछ भी हमने...भाग जा...पता नहीं कहां से आ जाते हैं साले...कार का शीशा खराब कर के रख दिया !" मामाजी ने लड़की को ज़ोर से धक्का दिया है। वो बीच सड़क पर गिरते गिरते संभल गई है और दूसरी कार की ओर बढ़ने लगी है।सिग्नल हरा हो गया है।

"बेवकूफ ने सारा शीशा खराब कर दिया...हाथ के निशान पड़ गए हैं...बेवकूफ लड़की..." मामाजी कार आगे बढ़ाते हुए गुस्से में बड़बड़ाते जा रहे हैं। मामीजी चुप हैं। शायद अपने पति की बातों को मौन सहमति दे रही हैं। मम्मी भी चुप हैं। पता नहीं उनके मन में क्या चल रहा है। सुमेधा भी चुप है। पर उसकी तो मानो ज़ुबान ही बेजुबान हो गई है। हर बात पर बढ़ चढ़कर बोलने वाली सुमेधा भी आज चुप है। सीडी प्लेयर पर स्वामीजी कहते जा रहे हैं,"बंदे, ये दुनिया तो बस एक छलावा है....तू ध्यान कर...इस मोहमाया की दुनिया से बाहर निकल....तू खाली हाथ आया है, खाली हाथ ही जाएगा..."

Monday, September 15, 2008

मामाजी

रागिनी पुरी
युवा पत्रकार रागिनी पुरी की संवेदना हर उस चीज को पकड़ती है, जो झकझोरती है। अंदर से हिला देती है। मामाजी कहानी में भी उन्होंने बहुत ही छोटी सी बात के इर्द गिर्द कहानी के ताने-बाने को जिस तरह बुना है, उससे उनकी संवेदनात्मक पकड़ को समझा जा सकता है। लगातार लिखती हैं और उनके तीन ब्लॉग हैं, जहां जाकर आप अलग-अलग किस्म की रचनाओं का स्वाद ले सकते हैं। ये ब्लॉग्स हैं--किस्से कहने हैं, THE WRITTEN WORD, THE SOLITARY REAPER

मामाजी--भाग एक

करीब छह बज रहे हैं। पूरा घर सुबह की पहली अंगड़ाई ले रहा है। सुमेधा के कानों में हल्की हल्की आवाज़ें छन कर आ रही हैं। कभी बाथरूम की हल्की फुल्की उथल पुथल, तो कभी रसोई में बर्तनों के खड़कने की आवाज़ें...इसका मतलब मामीजी जाग गई हैं। लॉबी से किसी के चलने की आवाज़ें आ रही हैं। भारी चप्पलें मार्बल के फर्श पर आवाज़ करती हुईं....मामाजी हैं....मामाजी तो काफी पहले ही उठ गए होंगे।

सुमेधा ने हल्के से चादर से सिर बाहर निकाला है। बेडरूम के दरवाजे से उसकी नज़र मामाजी पर पड़ी है। सफेद रंग का धुला हुआ कुर्ता पायजामा पहनकर तैयार मामाजी...बाल करीने से संवरे हुए...कितनी एनर्जी है इनमें...नहा भी लिया...! कितने बज़े उठे होंगे...सुमेधा अलसाई हुई करवट बदलने की कोशिश करती है। पर फिर झिझक के कारण कुछ देर और बिस्तर पर पड़े रहने का इरादा छोड़ना पड़ता है।

अपना घर और अपना बेडरूम होता तो फिर तो आठ बजे तक सोई रहती...कोई नहीं टोकता..पर ये तो मामाजी का घर है। इसलिए थोड़ा लिहाज तो करना पड़ेगा। सुमेधा पिछली रात ही आई है यहां...अपनी मम्मी के साथ। आज राखी जो है। मम्मी मामाजी को राखी बांधेगीं, फिर सभी सत्संग सुनने स्वामीजी के आश्रम जाएंगे। सुमेधा के घर में सभी बड़े भक्त हैं स्वामीजी के। बहुत भक्ति भाव है सब में। और मामाजी और मामीजी में तो कुछ ज्यादा ही भक्ति भाव भरा है।मामाजी कहते हैं कि उन पर स्वामीजी कि बहुत कृपा है। सब कुछ उनका दिया हुआ ही तो है। आलीशान बंगला, दो दो लंबी कारें, फैक्ट्री, शानदार ऑफिस, नौकर चाकर....बेटी की शादी हो चुकी है, और बेटा विदेश में है। किसी तरह कि कोई कमी नहीं...सच में बड़ी कृपा है स्वामीजी की। अब मामाजी में भी तो भक्ति भाव बहुत है, कृपा तो होगी ही। स्वामीजी का आश्रम वैसे तो राजस्थान में है, पर आए दिन दिल्ली आते रहते हैं। विदेशों के दौरे पर भी जाते हैं तो दिल्ली से होकर ही जाते हैं। और उनके दिल्ली आने पर मामाजी उनके साथ ही रहते हैं, साए की तरह।

बहरहाल सुमेधा बिस्तर से उठ बैठी है। लॉबी में बैठे अखबार पढ़ रहे मामाजी की नज़र उस पर पड़ गई है।

"गुड मार्निंग बेटा," वो वहीं से बोल रहे हैं।

"गुड मार्निंग मामाजी," कहती हुई सुमेधा लॉबी की तरफ बढ़ने लगी है।

"और गर्मी तो नहीं लगी रात को? मैंने ए-सी बंद कर दिया था।"

"नहीं मामाजी, बल्कि सुबह को तो ठंड होने लगी थी। अच्छा किया ए-सी बंद कर दिया।"

"तो हां बेटाजी...पहले तो ये बताओ की नाश्ते में क्या लोगे? वैसे तुम्हारी मामी ने आलू उबाल लिए हैं। अब बताओ, सैंडविच खाओगे या फिर आलू के परांठे ? "

"मामाजी, दोनों चीज़े परफेक्ट हैं, जो सभी खाएंगे, मैं भी वही खाऊंगी," कहती हुई सुमेधा रसोई की ओर बढ़ने लगती है। मामाजी भी अखबार समेटते उसके पीछे आने लगते हैं।रसोई में मामीजी चुपचाप काम में लगी हैं। वो ज़्यादा बोलती नहीं। बस काम की ही बात करती हैं। शंभु घर की सफाई कर रहा है। वो बीच बीच में उसे ठीक ढंग से काम करने की हिदायत देती हुईं आलू छीलने में लगी हैं।मामाजी रसोई में आ मामीजी को नाश्ते में आलू के परांठे तैयार करने को कहते हुए खुद चाय बनाने की तैयारियों में जुट जाते हैं।

अब तो सुमेधा की मम्मी भी तैयार होकर आ गई हैं। रसोईघर में खड़े खड़े सभी इधर उधर की बातें करने में मशगूल हो जाते हैं।सुमेधा की इन बातों में को दिलचस्पी नहीं। वो टीवी ऑन करती है। कहीं कुछ खास नहीं आ रहा। खबरें भी कुछ खास नहीं। एक लोकल चैनल पर पुराने गाने आ रहे हैं। हल्की आवाज़ में वो चैनल लगा सुमेधा नहाने की तैयारियों में जुट जाती है।बैग से ब्रश, कपड़े और तौलिया निकाल वो बाथरूम की ओर बढ़ रही है।

"बेटा, आपने चाय नहीं पीनी पहले ?" मामाजी पूछ रहे हैं।

"नहीं मामाजी, एक ही बार पीऊंगी...नाश्ते के साथ..."

"ठीक है, फिर आओ बता दूं बाथरूम में शैंपू वगैरह कहां रखा है।'' मामाजी उसके साथ बाथरूम में आएं हैं। ये गीज़र का प्लग, इस नल में गर्म पानी, इसमें ठंडा, यहां से शावर...सबकुछ समझा रहे हैं। अब मामाजी ने कपबोर्ड खोल दिया है...माइल्ड शैम्पू, क्लीनिक प्लस, साबुन, तेल, बॉडी ऑयल...सब समझा रहे हैं।

" अच्छा बेटा, और किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो आवाज़ दे देना," मामाजी कहते हुए वापस रसोई में चले गए हैं।सुमेधा बाथरूम का दरवाजा बंद कर बैठी सोच रही है। कितने कैयरिंग हैं ना मामाजी। कितना ख्याल रखते हैं सब का....और घर की हर चीज का पता है उनको। उस पर से क्या पर्सनैलिटी है...हर दम एकदम फिट।

मामा की दीवानी सुमेधा लेकिन आखिर ऐसा क्या होता है कि सुमेधा के मन में मामा के प्रति भर जाती है वितृष्णा। जानने के लिए कल पढ़िए कहानी की अगली और आखिरी किस्त

Saturday, September 13, 2008

मार्जिन पर कोई सड़ता नहीं

हाशिए पर--आखिरी किस्त
उदयराज
हाशिए पर कहानी पिछली दो किस्तों 'मुख्यधारा' से भटका एक कॉमरेड और दो कॉमरेड्स, एक असफल प्रेम कहानी में आपने पड़ा श्यामल और दीपक के वैचारिक मतभेद। आज पढ़िए कहानी की तीसरी और आखिरी किस्त

''दीपक, तुमसे हम मित्र की तरह मिलने आया और तुम हमको ये सब शिक्षा देने लगा। हमको तुम नया आदमी समझता है क्या? हम भी तुम्हारा माफिक पार्टी किया। बड़ा बड़ा बोई (किताब) पढ़ा। जिस गरीब का तुम पक्ष लेता है, वो अपना भूख मिटाने का वास्ते, अपना हवस का वास्ते तुमको-हमको सबको बेच खाएगा। तुम तो खाली बोई में पड़ा रहता है। वास्तविक दुनिया का कोई चाल तुमको कैसे समझ में आएगा? मिल का यूनियन देखो। एक दो दिन हड़ताल हुआ नहीं कि सब गरीब लोग भागने लगा। कुत्ता माफिक उस मिल को छोड़ दूसरा मिल में जाकर रिरियाने लगा। नहीं तो ठेकेदार के पास में जाकर काम करने लगा। अइसा लोग से क्या होगा?''
''दादा, गरीब तो गरीब इसीलिए है कि उसके पास न तो सोच की धारा है न ही सोच की धारा बनाने की स्थिति। इस स्थिति को बनाने और उन्हें मुहैया कराने की लड़ाई हमारी लड़ाई है। किसी चीनी या रूसी रास्ते से नहीं। अपने रास्ते से बिल्कुल देसी रास्ते से। जिस आस्था और विश्वास के लोग कायल हैं--उसी आस्था और विश्वास को रखते हुए दृष्टि में परिवर्तन लाना है।''
''दीपक, इसीलिए हम तुम्हारा पास आया है। देखो, तुम विचार करता है--हमको बढ़िया-बढ़िया स्लोगन दे सकता है। तुम्हारे जैसा लोगों का हमारा पास एक पूरा टीम है। पर तुम्हारा माफिक वो सब भी कुछ कुछ टेढ़ा ही है। तुम हमारा मित्र है। हम उस सबका साथ तुमको भी सह लेगा...। तुम पाजी मार्जिन पर क्यों सड़ना चाहता है?''
'' मार्जिन पर कोई सड़ता नहीं दादा। बल्कि तुमलोगों की मुख्य प्रवाह का आधार बनता है। मैथ तो बनाया ही होगा तुमने स्कूल डेज में। मार्जिन पर ही मौलिक क्रियाएं गुणा, भाग, जोड़, घटाव की जाती है। बाकी पेज तो रिजल्ट ही रिजल्ट का मकड़जाल होता है।''
''लेकिन तुम्हारा वैचारिक क्रांति मार्जिन पर नहीं आ सकता। प्याले में तूफान कहां से आएगा?''
''मार्जिन तूफ़ान के लिए नहीं होता। तूफान आने पर लोग बचने के लिए किनारे चले जाते हैं। सुरक्षा के लिए ताकि असमय और अनीतिवश आए तूफ़ान से बचाकर अपने को नए संघर्ष में लगा सकें।''
''तो यही तुम्हारा फैसला है?''
''क्या?''
''कि तुम हमारा साथ नहीं आएगा?''
''यदि तुम आज की मुख्यधारा के साथ हो तो....।''
''तुम्हारा मार्जिन पर हमारा वास्ते जगह रहेगा?''
''दुर्भाग्य को निमंत्रण ने दें आप।''
''उसी दुर्भाग्य से तुमको बचाना चाहता है हम।''
''मगर, यह तो हमारा सौभाग्य है।''
''क्या?''
''बने रहना--वहीं हाशिए पर।''