Thursday, January 8, 2015

एक था पीके

व्यंग्य
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

एक था पीके। ये अलग बात है कि वो पीता नहीं था। वो इस गोले यानि ग्रह का नहीं था। बचपन से ही वो पढ़ने लिखने में काफी तेज़ था। बहुत ही मेधावी। गणित और विज्ञान के सवाल तो चुटकियों में हल कर देता था। उसके मां-बाप का भी सपना था कि बड़ा होकर वो डॉक्टर-इंजीनियर बने। हर गोले पर मां-बाप बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने का ही सपना देखते हैं लेकिन वो इस गोले के इडियट बच्चों जैसा नहीं था। वो अपने मां-बाप के सपनों पर खरा उतरा और बन गया एस्ट्रोनॉट।
वो कितना तेज़ था, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जब उसके गोले के इसरो या नासा ने मिशन अर्थ शुरू किया तो उसे इसका लीडर बना दिया। वो बड़ी ही कामयाबी से धरती पर लैंड भी कर गया लेकिन ये क्या वो तो नंगा उतरा था। मेरी समझ ये बात नहीं आई कि जिस गोले का इसरो या नासा धरती के इसरो या नासा से इतना तेज़ था, उस गोले पर कपड़े का ही आविष्कार नहीं हुआ था। वो नंगे रहते थे। यही नहीं उसे बोलना भी नहीं आता था। कोई जुबान नहीं। कोई भाषा नहीं। बिल्कुल अपनी धरती का आदि मानव। अब दूसरे गोले का आदि मानव स्पेसक्राफ्ट लेकर धऱती पर आ जाता है तो मंजूर लेकिन जब अपने यहां के पढ़े लिखे लोग ये दावा करते हैं कि सारे बड़े-बड़े आविष्कार प्राचीन भारत में हो गया था तो हंगामा  मच जाता है। हद है भाई।
धरती पर उतरते ही उसे पता चल गया कि बीजेपी के राज में भी राजस्थान में कानून-व्यवस्था कितनी खराब है। अभी ठीक से धरती को समझा भी नहीं था कि एक उचक्का उसके गले से उसका रिमोट लेकर भाग गया। बस पीके यहीं से भटक गया। रिसर्च की बात भूल गया। इसके बाद तो वो रिसर्च के अलावा उसने  वो सबकुछ किया, जिसके लिए उसके गोले ने उसे यहां नहीं भेजा था। दिल्ली की हवा तो उसको ऐसी लगी कि वो कानून का मजाक भी उड़ाने लग गया। धर्म और राजनीति के चक्कर में फंस गया। बस बेचारा नहीं समझ पाया तो मीडिया को। मीडिया ने तत्काल कुत्ते को गोद से उतार कर उसे अपनी गोद में बिठा लिया। लाइव-लाइव का खेल होने लगा। झूठ बोलना भी सीख गया। मतलब पीके नाम का वह आदि मानव इस गोले से पूरी तरह आदमी बनकर लौटा। कपड़ा भी पहने हुए था।
बिना रिसर्च किए लौट गया लेकिन एक साल बात उसके गोले ने उसे फिर वापस भेज दिया यानि नॉन परफॉर्मर का प्रमोशन। जाहिर है अपने गोले पर भी उसने करप्शन फैला दिया होगा।
और हां, पता नहीं उसे हर जगह डांसिंग कारें कैसे मिल जाती थी? डांसिंग कारों से कपड़ा चुराना इतना आसान है क्या? एक गाने में दिल्ली में तो एक पार्किंग में सारी कारें  डांस कर रही थीं। अब ये पार्किंग कहा हैं, मुझे तो पता नहीं लेकिन अगर आपको पता चल जाए तो दिल्ली पुलिस को जरूर सूचित कर दीजिएगा। ये डांसिंग कारें तो दूसरे गोले पर भी भारत का नाम खराब कर रही हैं।


Saturday, November 23, 2013

लोकतंत्र का राजा


सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

पूरे राजमहल में दहशत और बेचैनी का माहौल था। हर शख्स परेशान। किसी अनहोनी की आशंका से खौफ़जदा। ऐसा पहली बार हुआ था। राजा लापता था। पिछले तीन दिनों से उसका कोई सुराग नहीं था। हर जगह ढूंढ लिया गया था लेकिन राजा की कोई ख़बर न थी। मजबूरी ये थी कि इस ख़बर को लीक भी नहीं किया जा सकता था। लोकतंत्र में राजा का इस तरह लापता होना शुभ संकेत नहीं था। विरोधी दलों को बैठे बिठाए एक मुद्दा मिल जाता। और केवल विरोधी दल ही क्यों कुर्सी पर नज़र गड़ाए अपने ही दल के लोग हंगामा बरपा देते।राजा राघवनाथ के तीन भाई ही सबसे पहले गेम शुरू कर देते। इसलिए पूरी गोपनीयता बरती जा रही थी। सबसे बड़ा डर इस बात का था कि अगर टेलीविजन चैनल वालों को पता चल गया तो फिर राजा का तमाशा बन जाएगा। लोकतंत्र गहरे संकट में था।
राजमाता के चेहरे पर शिकन साफ़ देखा जा सकता था। अपने चार बेटों में से उन्होंने राघवनाथ को केवल इसलिए राजा की कुर्सी दी थी क्योंकि उसका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं था। सीधा-सादा-गौ आदमी। डरने वाला। राघवनाथ के जरिए राजमाता अपना राज चलाती थी। राघवनाथ पूरी तरह राजमाता के शिकंजे में था। कठपुतली राजा। राजमाता के बाकी तीन बेटे उससे बिल्कुल अलग थे। इसलिए राजमाता को उन पर भरोसा नहीं था। हो सकता था कुर्सी मिलते ही वो राजमाता को ही किक मार कर सत्ता से अलग कर देते। राजमाता को पक्का विश्वास था कि राघव राजमहल से बाहर नहीं जा सकता। उसके अंदर इतनी हिम्मत नहीं थी। मंत्रीसभा में भी कोई ऐसा नहीं था जो राजा को महल से बाहर ले जाने की हिमाकत करता। राजमाता ने अपने ख़ास लोगों को बुलाकर एक बार फिर राजमहल की गहन तलाशी का फ़रमान जारी किया। उनका निर्देश था कि महल का चप्पा-चप्पा छान मारा जाय। एक बार फिर महल में राजा की तलाश शुरू हो गई।
राजा अपने शयन कक्ष में ही मिल गया था। अपने पलंग के नीचे छिपा हुआ। पकड़े जाने पर राजा पलंग के नीचे से निकल कर शयन कक्ष के एक कोने में जाकर दुबक गया। बिल्कुल साधारण कपड़ों में। ऐसे बकरे की तरह वो कोने में दुबका हुआ था, मानो उसे अभी काटा जाएगा। उसने राजसी वस्त्र उतार फेंके थे। राजमुकुट भी शयन कक्ष में एक ओर लुढ़का हुआ था। अपने कमरे में सैनिकों को देखते ही वो रिरियाने लगा--''मुझे छोड़ दो। मैं राजा नहीं हूं। मैं राजा नहीं हूं।''
सभी घबड़ा गए। एक सैनिक हिम्मत कर उनके पास गया और समझाने की कोशिश की-''महाराज, आपको क्या हो गया है? आप ही राजा हैं। हमारे भाग्य विधाता हैं।''
''
नहीं, नहीं'' राघवनाथ चिल्ला उठा, '' मैं राजा नहीं हूं। मैंने कुछ नहीं किया। मैं राजा नहीं हूं।''
पूर राजमहल में आग की तरह ख़बर फैल गई कि राजा पागल हो गए हैं। वो खुद को राजा मानने को तैयार नहीं। कुर्सी से दीमक की तरह चिपके रहने वाले राघवनाथ का ये कहना कि वो राजा नहीं हैं--किसी अजूबे से कम नहीं था। जब राजमाता की पार्टी ने चुनाव जीता था और उनके चार बेटों में से किसी एक को राजा चुना जाना था तब कितनी उठापटक हुई थी, ये आज तक सबको याद है। डरपोक राघवनाथ रात के अंधेरे में राजसभा में जाकर राजा की कुर्सी पर बैठकर राजा का स्वांग रचता। कुर्सी को चूमता, सहलाता। जब एक ख़ास चाटूकार ने पूछा था कि वो ऐसा क्यों करता हैं तो उसने बिना किसी लागलपेट के कहा था कि वो राजमाता के सामने अपनी मांग नहीं रख सकता लेकिन राजा बनने की इच्छा तो रखता ही हैं। इसलिए रात को चुपचाप राजा की कुर्सी पर बैठकर अपनी ये इच्छा पूरी कर रहा हैं। अगर कुर्सी नहीं मिली तो कम से कम मलाल नहीं रहेगा। अब वही राघवनाथ लोगों को ये बता रहा हैं कि वो राजा नहीं हैं।
ख़बर मिलते ही राजमाता लगभग दौड़ते हुए राघवनाथ के कमरे में पहुंची थीं। उन्हें इस बात से राहत मिली थी कि राघवनाथ मिल गया लेकिन उसकी दिमागी हालत की ख़बर से वो चिंतित भी हुईं। अगर राघवनाथ पागल हो गया तो उसे राजा की कुर्सी पर बिठाए नहीं रखा जा सकता और अगर ऐसा हुआ तो सत्ता राजमाता के हाथों से निकल जाएगी। राजमाता को पागल नहीं कमजोर राघवनाथ चाहिए था।
राजमाता को देखते ही राघव और जोर-जोर से चीखने लगा, '' मैं राजा नहीं हूं। मुझे छोड़ दो। मैं राजा नहीं हूं।''
राजमाता जैसे-जैसे उसके करीब पहुंच रही थीं, वो और सिकुड़ता जा रहा था। मानो राजमाता उसे कच्चा निगल जाएंगी। राजमाता जब उसके करीब पहुंची, वो आदमी से सिकुड़ कर लगभग गेंद बन गया था। राजमाता ने जैसे ही उसके सिर पर हाथ रखा, वो फफक-फफक कर रो पड़ा, ''मुझे छोड़ दो, मुझे छोड़ दो, मैं राजा नहीं हूं।'
''
राघव ये क्या हो गया है तुम्हें? तुम्हीं राजा हो। इस देश के भाग्यविधाता हो।'
''
नहीं, नहीं, मैंने कुछ नहीं किया। मैं राजा नहीं हूं।मैं निर्दोष हूं। मुझे छोड़ दो, मुझे मुक्ति दो। मैं राजा नहीं हूं।''
राजमाता वहीं जमीन पर धम्म से बैठ गईं। वहां मौजूद लोगों का दिल भी बैठ गया। राजमाता को इतना टूटते शायद ही कभी किसी ने देखा था। आखिर क्या हो गया राघव को? किस बात से इतना खौफ़जता है राघव? आखिर वो कौन सा डर है, जिसकी वजह से वो राजा होने की बात से ही इनकार कर रहा है? किस बात ने उसे इतना डरा दिया है? किसने उसे इतना डरा दिया है? एक बार पता चल जाय, राजमाता उसे नहीं बख्शेगी। राजमाता के दिल में तरह-तरह की आशंकाओं के बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। किस साज़िश का शिकार हो गया राघव? कहीं ये राजमाता को सत्ता से बेदखल करने का कोई खेल तो नहीं है? कहीं अपने ही बेटे तो उनके दुश्मन नहीं बन गए? उनके दिमाग में विरोधी दल की साज़िश की बात बहुत बाद में आई थी, पहले संदेह अपनों की ओर ही गया था। कहीं राघव के भोजन में कुछ ऐसा मिला कर तो नहीं दे दिया गया, जिससे उसकी दिमागी हालत बिगड़ गई है? क्या होगा अब? कैसे निपटेगी अब वो इस समस्या से? राजमाता का दिल बैठा जा रहा था। उन्होंने इशारे से कमरा खाली करने को कहा। सारे सैनिक बाहर चले गए।कमरे में रह गए राघवनाथ और राजमाता। दरवाजा भी बंद कर दिया गया।
राजमाता ने राघव का सिर अपनी गोद में रख लिया, ' राघव डरो नहीं। मैं तुम्हारी मां हूं। बताओ क्या हुआ है? किसने डराया है तुम्हें?'
लेकिन राघव पर अभी भी डर हावी था। वो रिरियाने लगा, ''मैं राजा नहीं हूं। मैं राजा नहीं हूं।'
अब राजमाता को गुस्सा आ गया। वो चीख पड़ीं, ' राघव बंद करो ये नाटक। मुझे ये रोना-धोना बिल्कुल पसंद नहीं है। बताओ क्या हुआ है?'
राघव की सिट्टीपिट्टी गुम। राजमाता का गुस्सा प्रलयंकारी होता है। उनका गुस्सा बेटे और दुश्मन में फर्क नहीं समझता। राघव ने अपना सिर झट उनकी गोद से हटा लिया। क्या पता गोद में ही सिर कलम हो जाय। अब वो पहले से ज्यादा डरा हुआ था। थर-थर कांप रहा था।
राजमाता फिर चीख पड़ी, ' बताओ क्या बात है? इतने बड़े लोकतंत्र का राजा इतना ज्यादा क्यों डरा हुआ है, जबकि मेरा वरदहस्त तुम्हारे सिर पर है?'
राजा राघवनाथ की बोलती बंद हो गई थी। उसके गले से आवाज् भी नहीं फूट रही थी। उसने अपने बिस्तर की ओर इशारा किया। बिस्तर पर देश का सबसे बड़ा अखबार पड़ा हुआ था। पहले पेज पर मोटे-मोटे अक्षरों में हेडलाइन थी, 'भ्रष्टाचारियों को लैंपपोस्ट पर लटका दिया जाना चाहिए'
राजमाता की आंखें फटी की फटी रह गईं। पिछले तीन सालों से उन्होंने अखबार नहीं पढ़ा था। जबसे उनकी पार्टी सत्ता में आई थी, तब से उन्होंने अखबार पढ़ना छोड़ दिया था। उन्हें पता था कि अखबार वाले सरकार को ही गाली देते हैं, तरह-तरह की समस्याएं छापते हैं और सरकार की आलोचना करते हैं। राजमाता को ऐसी ख़बरें परेशान करती थीं , इसलिए उन्होंने अखबार पढ़ना ही छोड़ दिया था। लेकिन आज उन्हें लपककर अखबार उठाना पड़ा था। पूरी ख़बर पढ़ गई वों--''देश की सर्र्वोच्च अदालत ने एक अपराधी की ज़मानत पर सुनवाई करते हुए कहा कि जिसे देखो, वह देश को लूट लेना चाहता है। ऐसे हालात में भ्रष्टाचारियों को सरेआम लैंपपोस्ट पर लटका दिया जाना चाहिए लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा हमारे अख्तियार में नहीं है।'
राजमाता कुछ देर स्तब्ध खड़ी रहीं। फिर जोर-जोर से हंसने लगीं। उनके ठहाकों से पूरा कमरा हिल उठा।
'
इतने बड़े लोकतंत्र का इतना बड़ा राजा बस इतनी छोटी सी ख़बर से इतना डर गया कि राजा होने से ही मना करने लगा' राजमाता फिर ठहाके लगाने लगीं।
राघवनाथ की आंखों में हैरानी थी, 'आप इसे छोटी ख़बर कह रही हैं?'
'
और नहीं तो क्या? ये एक जज की निजी भड़ास है। लेकिन इसमें उसकी लाचारगी भी तो झलक रही है कि ये उसके अख्तियार में नहीं है'
राघवनाथ अभी भी खौफ़ में थे। उन्हें अपने गले में फांसी के फंदे की सरसराहट महसूस हो रही थी, ''राजमाता, आज अदालत ने राय जाहिर की है, कल किसी धारा के तहत फ़रमान भी जारी कर सकती है। क्या हम हाल के दिनों में कई बार अदालती आदेशों के कारणों असुविधाजनक स्थिति में नहीं फंसे हैं?'
'
लेकिन तुम निश्चिंत रहो।' राजमाता ने राजा राघवनाथ को भरोसा दिया, ' कोई भी अदालत इस तरह सरेआम लैंपपोस्ट पर लटकाने का आदेश जारी नहीं कर सकती। हमारे देश की संविधान इस बात की इजाजत नहीं देती।'
''
राजमाता आप जरा भविष्य की सोचिए। एक जज का ये गुस्सा किसी दिन जनता के गुस्से में भी तब्दील हो सकता है। अदालत हमारी नहीं, जनता की बोली बोल रही है। संविधान, सरकार, राजा-सब कुछ तो जनता से ही है। अगर जनता ने ही भ्रष्टाचारियों को लैंपपोस्ट पर लटकाना शुरू कर दिया तो?'
अब राजमाता की आंखें खुली। उनका सिर चकरा गया। उन्होंने सपने भी नहीं सोचा था कि राघवनाथ भी इतने दूर की सोच सकता है। सचमुच अब ये गंभीर समस्या लग रही थी। इस तरह की भाषा से तो जनता भड़क सकती है। कुछ करना होगा। करना ही होगा। उन्होंने राघवनाथ को भरोसा दिया कि वो डरे नहीं। इसी बहाने उन्होंने खुद को भी तसल्ली दी कि सत्ता की बागडोर उनके ही हाथों में रहेगी। उन्होंने राघवनाथ को राजा की कुर्सी पर बैठने की नसीहत दी और कहा कि वो इस समस्या का समाधान जरूर निकालेंगी। उन्होंने राघव को निर्देश दिया कि आज ही नवरत्नों की बैठक बुलाई जाय।

राजमाता,राजा राघवनाथ और नवरत्नों की बैठक चल रही थी। पूरा माहौल गंभीर था। बैठक कक्ष में मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था। राजमाता और राघवनाथ ने समस्या और भविष्य में पड़ने वाले दूरगामी प्रभाव से नवरत्नों को अवगत करा दिया था। अब नवरत्नों को सुझाने थे उपायों। पूरे राजमहल में मौत का सन्नाटा था। जैसे ही महल के निवासियों को पता चला कि नवरत्नों की बैठक हो रही है, उन्हें मानो लकवा मार गया। नवरत्नों की बैठक तभी बुलाई जाती थी, जब देश किसी गंभीर संकट से गुजर रहा होता है। इस बात से भी हैरानी थी कि नवरत्नों की बैठक में भी राघवनाथ साधारण कपड़ों में ही गए थे। राजा के कपड़े पहनने में उन्हें अभी भी डर लग रहा था। ये सारे नवरत्न कबीना स्तर के मंत्री थे और सबके पास बड़े-बड़े मलाईदार विभाग थे। इसलिए ये समस्या उन सब की थी।
एक ने सुझाया-''हमें कुछ ऐसा करना चाहिए कि सर्वोच्च अदालत की नज़र ही हम पर न पड़े। न हम पर नज़र पड़ेगी, न ही वो हमारे बारे में ऐसी बातें कहेगी, जिससे लोगों के भड़कने का खतरा हो।''
राजमाता ने पूछा-''इससे बात बनेगी?''
दूसरे नवरत्न ने तत्काल कहा-'' जरूर, जब सर्वोच्च अदालत की नज़र ही नहीं पड़ेगी तो कोई समस्या ही नहीं होगी। और किसी की तो हिम्मत है नहीं कि सरकार के खिलाफ कुछ बोल सके।''
''
लेकिन ये होगा कैसे?'' राघवनाथ की चिन्ता जायज थी।
''
अनुसंधान करना पड़ेगा। वैज्ञानिकों को इस काम में लगाना पड़ेगा। मैंने कल ही एक फिल्म देखी मिस्टर इंडिया? उसमें हीरो एक अंगुठी पहनता है और फिर सबकी नज़रोें से ओझल हो जाता है। वो सबको देख सकता है लेकिन उसे कोई नहीं देख पाता''
''
अगर ऐसा हो गया तो न केवल हम कानून की निगाह से बच जाएंगे बल्कि हमारा काम भी और आसान हो जाएगा। तब तो शायद कैमरे भी हमें पैसे लेते हुए नहीं पक़ड़ पाएंगे'' एक नवरत्न की ऐसी राय से सबको और ताकत मिली।
तत्काल राजा के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार को तलब किया गया। मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार को देश की जरूरत से अवगत कराया गया। बताया गया कि देश को किस तरह अपने वैज्ञानिकों की इस महान सेवा की ज़रूरत है लेकिन मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार का जवाब निराश करने वाला था। जान बख्शने की अपील करते हुए उसने बताया था कि फिल्म में जो कुछ भी दिखाया गया है, सचमुच की जिंदगी में ऐसा करना संभव नहीं है। ऐसा नहीं कि वैज्ञानिक ऐसी कोशिश नहीं कर रहे हैं लेकिन अभी तक कामयाबी नहीं मिली है।
राजमाता का गुस्सा सातवें आसमान पर था।वैज्ञानिक अनुसंधान पर सरकार इतना पैसा खर्च करती है लेकिन ये एक छोटा सा काम भी नहीं कर सकते राष्ट के लिए। मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार को तो तत्काल बर्खास्त करने का फरमान जारी कर दिया गया। ये भी पता चला कि वो पिछली सरकार में भी इसी पद पर था। राघवनाथ नवरत्नों पर बरस पड़े। दूसरी पार्टी की सरकार का आदमी अभी तक इतने बड़े पद पर कैसे आसीन था? अगर कोई अपना आदमी होता तो कम से कम कोशिश तो करता।
जो भी हो समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई थी। राघवनाथ ने नवरत्नों से कहा-''ये हमारी-आपकी और पूरे देश के अस्तित्व का सवाल है। आपलोग कुछ सोचिए। जल्दी सोचिए।''
नवरत्न फिर मगजमारी करने लगे। एक नवरत्न ने मन ही मन सोचा-''सत्ता में आकर भी सोचना पड़ा रहा है। दिमाग का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। कितने अभागे हैं हम''
तभी एक आइडिया और कौंधा-''क्यों न हम सर्वोच्च अदालत की आंखें ही निकाल लें?''
जबर्दस्त आइडिया लेकिन एक नवरत्न ने कहा -''मुझे जहां तक याद आ रहा है, सर्वोच्च अदालत के बाहर कानून की जो मूर्ति लगी हुई है , उसकी आंखों पर तो पट्टी बंधी हुई है। यानी अदालत तो पहले से ही नहीं देख पाती''
''
नहीं ये बात नहीं है, ये पट्टी इस बात का प्रतीक है कि कानून केवल इंसाफ करेगी। इस पट्टी के जरिए वो इस बात का संकेत देती है कि उसके सामने सभी बराबर है।''
''
ये तो और खतरनाक बात है। फिर तो कानून की नज़र मेें हमारी कोई हैसियत ही नहीं है। हमें संविधान में संशोधन करना चाहिए''
राजमाता ने कहा-''कैसे निकालेंगे कानून की आंख? आप क्या सोच रहे हैं इस पर हंगामा नहीं होगा। विपक्ष चुपचाप बैठा रहेगा''
देश के स्वास्थ्य मंत्री भी नवरत्नों में शामिल थे। उन्होंने सलाह दी-''क्यों न हम इलाज के बहाने उसे ऐसी दवाएं दें, जिससे उसकी आंखों की रोशनी धीरे-धीरे चली जाय''
राघवनाथ ने कहा-''आइडिया बुरा नहीं है लेकिन कानून तो बीमार नहीं है। आखिर क्या कह कर हम कानून का इलाज शुरू करेंगे''
फिर वही तनाव। कानून की आंख फोड़ने का आइडिया जबर्दस्त था लेकिन इसे लागू करने में काफी दिक्कतें थीं। लोकतंत्र में कानून को अंधा करना इतना आसान भी नहीं था। अब राजा को ही नहीं, नवरत्नों को भी लगने लगा था कि सबसे बड़ी बीमारी लोकतंत्र ही है। तो क्या आखिर एक दिन सबको लैंपपोस्ट पर लटका दिया जाएगा? क्या देश की सेवा करने के लिए कोई नहीं बचेगा? ये सवाल अब नवरत्नों को सालने लगा था।राजमाता परेशान थीं तो राघवनाथ अभी तक डरा हुआ था। लेकिन राजमाता तो राजमाता थी।उन्होंने इसका हल ढूंढ ही निकाला। उन्होंने कहा-''मैंने इस समस्या का समाधान ढूंढ लिया है।''

सब खुशी से उछल पड़े। बाकी किसी की हिम्मत तो नहीं पड़ी लेकिन राघवनाथ ने पूछ ही लिया कि क्या समाधान ढूंढा है उन्होंने। राजमाता ने कहा-अभी वो इसका खुलासा नहीं करेंगी। सर्वदलीय बैठक बुलाओ। सर्वदलीय बैठक में सब मिलकर इसे अपनी मंजूरी देंगे। सभी चकरा गए लेकिन राजमाता के आदेश पर सवाल नहीं किया जा सकता था। दूसरे दिन सर्वदलीय बैठक बुलाई गई। अचानक बैठक बुलाए जाने से विरोधी दल भी हैरान थे। राजमाता और राजा तो किसी भी मामले में कभी उन्हें इतनी अहमियत नहीं देते थे। देश के किसी भी फ़ैसले में उन्हें विश्वास में नहीं लिया जाता था लेकिन आज अचानक क्या हो गया। हैरान परेशान सभी विरोधी नेता बैठक में पहुंच गए थे। मीडिया को भी भनक लग गई थी। टेलीविजन वाले कैमरा लिए बैठक कक्ष के बाहर मौजूद थे लेकिन किसी को भी बैठक का एजेंडा मालूम ही नहीं था तो फिर कोई कहता क्या? अटकलों का बाज़ार गर्म था।
बैठक तय समय पर ही शुरू हुई थी। राजमाता ने खुद अखबार पढ़ कर सुनाया और विरोधी दलों को सर्वोच्च अदालत की राय से वाकिफ़ कराया। ख़बर तो सबने पढ़ी थी लेकिन इतनी गहराई से इस पर विचार नहीं किया था, जितना राजमाता और राजा राघवनाथ ने किया था। जब राजमाता ने सबको उनका भविष्य बताया तो सबको सांप सूंघ गया। राजमाता ने कहा-ये हमारी या आपकी समस्या नहीं है। ये पूरे देश की समस्या है और इसलिए हम चाहते हैं कि फैसला भी मिल बैठकर एक साथ किया जाय।
राजमाता की इस राय से सभी ने इत्तफाक जताई। राजमाता ने कहा-हमने कई हल ढूंढे लेकिन कुछ भी समझ में नहीं आया। आखिरकार हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि देश में कोई लैंपपोस्ट रहने ही नहीं दिया जाय। सारे लैंप पोस्ट तुड़वा दिए जायं। बस मुझे तो यही एक हल दिख रहा है, आप लोगों का क्या कहना है?
विरोधियों को भी समाधान भा गया लेकिन आशंका भी थी। इससे तो पूरा देश अंधेरे में डूब जाएगा।क्या जनता मानेगी?
राजमाता ने समझाया-इसीलिए तो आपलोगों को बुलाया है। अगर हम सब मिलकर जनता को समझाएं कि रोशनी से ज्यादा अहम राजा है तो जनता मान जाएगी। जनता को बरगलाना तो हमारे-आपके बाएं हाथ का काम है।बस अगर ये काम हम मिलकर करें तो किसी को संदेह नहीं होगा।
बैठक में राजमाता की जय-जयकार होने लगी।


Tuesday, November 30, 2010

पासवर्ड के बिना जिंदगी

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

हवा का एक ऐसा झोंका जो पूरे शरीर में सिहरन पैदा कर देता है। लेकिन ये सिहरन मन को नहीं छू पाई। ठंडी हवा का झोंका शरीर को छूकर निकल गई। मन तक वो पहुंच ही नहीं पाई। शायद इसमें हवा का दोष नहीं। मन ने ही सारे दरवाजे बंद कर दिये हैं। उन दरवाजों को खोलने का पासवर्ड हवा के पास नहीं है।

एक ऐसी दुनिया में हम जी रहे हैं, जहां हर चीज के लिए पासवर्ड चाहिए। जिसके पास पासवर्ड नहीं, वो इस दुनिया में मिसफिट है। शायद वो भी मिसफिट है। उसके पास उसका अपना पासवर्ड भी नहीं है। वो ऊपर से जैसा है, अन्दर से भी वैसा ही है। सब कुछ पारदर्शी. पासवर्ड की कोई जरूरत नहीं लेकिन वक्त के साथ उसे बदलना पड़ा। उसके मन तक पहुंचने के लिए अब एक पासवर्ड चाहिए था। पासवर्ड वो भी नहीं जानता। पासवर्ड है। जब मन लॉक है तो पासवर्ड जरूर है, होना भी चाहिए लेकिन जिसके पास ये पासवर्ड है, वो न जाने कहां है। पासवर्ड सेट किया और गायब। उसने खोजने की कोशिश भी तो नहीं की। तब से लॉक है मन का दरवाजा।

उसे पासवर्ड की ये दुनिया अच्छी नहीं लगती। बचपन में लौट जाना चाहता है। जहां सिर्फ और सिर्फ बचपना था। सब कुछ सीधा सरल। कोई सीक्रेट नहीं, इसलिए कोई पासवर्ड नहीं। पासवर्ड तो तब चाहिए होता है, जब कुछ छिपाना होता है लेकिन बचपन में छिपाने लायक क्या था। शायद बचपन अब इसलिए भी ज्यादा अहम हो गया था, उसके लिए क्योंकि बचपन में उसके पास कोई सीक्रेट नहीं था। ऐसा कुछ नहीं था, जिसे किसी को बताने में शर्म महसूस हो। इसलिए सबकुछ खुला हुआ था। उन्मुक्त था। उन्मुक्त था, इसलिए उसमें ताज़गी थी। कही कुछ सड़ा हुआ नहीं था। जिंदगी का कोई भी पहलू किसी बटर की तरह बदबू नहीं मार रहा था। इसलिए वो लौट जाना चाहता है पीछे की ओर लेकिन उसके लिए भी अब चाहिए पासवर्ड।

कैसे जिये वो इस ज़माने में, जहां कदम-कदम पर चाहिए पासवर्ड। इसलिए वो फेल है। यहां से वहां भागता रहता है लेकिन नहीं मिलती शांति, नहीं मिलता सकून। घऱ आता है, टेलीविजन के सामने बैठता है। वहां भी हंगामा। बिग बॉस में झगड़ते लोग। सामने प्यार में जान कुर्बान करने की बात, पीछे पीठे जड़ से काटने की बात। बिग बॉस दुनिया का असली चरित्र दिखाता है। एक छोटे से घर में चंद लोगों को बंद कर दुनिया को बताया जा रहा कि देखो तुम ऐसे ही हो। गंदे, अश्लील, चरित्रहीन, चुगलखोर, दूसरों के सुख से जलने वाले, भोग विलास में मतवाले, भोजन के लिए जानवरों की तरह लड़ने वाले। दूसरे को गिराकर उसकी कीमत पर आगे निकल जाने वाले। दुनिया का असली चरित्रा।

सोचता है, हंस ले। कॉमेडी देखना चाहता है लेकिन वहां हंसाने के लिए ताजा कुछ नहीं है। सबकुछ अश्लील। दूसरों का मजाक उड़ाकर उन्हें नीचा दिखाकर दुनिया को हंसाने की कोशिश। दूसरों को नीचा दिखाने में हंसी आती है, अच्छी हंसी आती है। खबर देखना चाहता, सर्कस दिखने लगता है। भागना चाहता है, भाग जाता है वो। उसके लिविंग रूम में दम तोड़ देता है टेलीविजन। वो भी लिविंग रूम में दम तोड़ रहा है। पता नहीं आधुनिक जमाने ने लिविंग रूम नामकरण क्या सोच कर किया है। वो तो लिविंग रूम में भी खुद को लिविंग महसूस नहीं करता। उसके लिए सब रूम एक जैसा है। जहरीला, घुटन भरा।

लेकिन क्या जिंदगी इतनी बुरी, इतनी घुटन भरी, इतनी घटिया है? शायद नहीं। वो जानता है कि जिंदगी ऐसी नहीं है। फिर वो क्यों हार गया है। क्या एक पासवर्ड गुम हो जाने से जिंदगी ऐसे बदल जाती है। पासवर्ड रिसेट भी तो किया जा सकता है। वो भूल जाएगा पासवर्ड चुराकर ले जाने वाली को। जिंदगी को वो अपना नया अर्थ देगा। कुछ भी बंद नहीं रहेगा। सब कुछ खुला रहेगा, बचपन की तरह। उसकी जिंदगी में कोई पासवर्ड नहीं होगा। हर पासवर्ड का ताला वो तोड़ देगा। वो इस जमाने में भी बिना पासवर्ड के जियेगा। उसने तय कर लिया, वो अपनी जिंदगी को फॉर्मेट करेगा। उन सारे वायरस को खत्म कर देगा, जिन्होंने उसे तबाह कर रखा है।

तय हो गया और उसके साथ ही उसके मन ने महसूस की ठंडी हवा की सिहरन। अब उसे सब कुछ ताजा लग रहा था।

Wednesday, April 15, 2009

चटकल

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव
नरेश झुंझला गया। उसे लगा चटकल में बदली मजदूर का काम करना और भीख मांगना बराबर है। पिछले तीन दिनों से लेबर ऑफिस का चक्कर लगा-लगा कर वह हलकान था लेकिन बाबू थे कि काम देने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बस एक ही ज़वाब--आज लोक नहीं लागेगा।(आज आदमी की ज़रूरत नहीं है)। जी में तो आया कि बोल दे कि लोक कब लगेगा, जब हम भूख से दम तोड़ देंगे? लेकिन कुछ नहीं बोल पाया। बदली मजदूर की इतनी हैसियत कहां होती है कि बाबू के आगे मुंह खोल पाये।

वह खड़ा रहा। उम्मीद थी कि शायद कोई नागा(अनुपस्थित) हो जाय, और उसे बुलावा आ जाय।बाबू ने चश्मे के बाहर से उसकी ओर देखा--अब इहां का करता है। जाओ काल आना।नरेश ने विनती के स्वर में पूछा--कुछ देर और देख लें साहब? शायद कोई नागा हो।बाबू हंसा। पान की पिक उसके होठ के दाहिने किनारे से निकल पड़ी। उसने टेबल से एक कागज उठाया और उससे अपना मुंह पोंछ कर डस्टबिन में फेंक दिया। तभी महेशनाथ दिखे। चेलों की पूरी टोली के साथ। वे सीधे लेबर बाबू के पास पहुंचे। कांग्रेस यूनियन के नेता। इस कारखाने के मामले में सबसे बड़े और दबंग नेता।बाबू ने इस बार चश्मे के अंदर से महेशबाबू की ओर देखा--नमोस्कार महेश दा। का खबोर?.महेश बाबू ने तल्ख स्वर में कहा--क्या बात है? तुम आजकल बहुत बड़े बाबू बन गये हो। हमलोगों की बात भी नहीं सुनते। सब बाबूगिरी भूला देंगे।
बाबू की सिट्टीपिट्टी गुम। हें-हें करता हुआ बोला-इ का बोल रहा है महेश दा? आपलोगों के लिए ही तो इहां पर बैठे हैं। का बात है?
-लल्लन तीन-तीन बार आया लेकिन तुमने उसे काम नहीं दिया।
बाबू ने कहा--अइसा बात नहीं महेश दा। आपका किसी भी लोक को हम कभी मना नाहीं किया लेकिन वो दिन सचमुच लोक का ज़रूरत नेहीं था। आज ज़रूरत है तो लल्लन का पता नहीं। हम बोला था कि एक बार चक्कर ज़रूर मार जाना।
महेश बाबू का पारा गरम हो गया--कहां है ललनवां? लल्लन झट सामने आ गया।महेश बाबू चिल्लाये--का रे, बड़का लाट साहब हो गया है ? बाबू तुम्हारे घर जाकर काम देंगे क्या? बाप का नौकर समझ रखा है
सबको लल्लन को मानो सांप सूंघ गया। सीधे जाकर बाबू के टेबल के सामने खड़ा हो गया. बाबू ने उसके नाम की पर्ची काटते हुए कहा-रोज काहें नहीं आता? छोटा छोटा बात के लिए महेश दा को परेशान करता है।लल्लन चुप। बाबू पर खून खौल रहा था। अभी इसे बकवास करने की क्या ज़रूरत है? चुपचाप जल्दी से पर्ची देता क्यों नहीं? पर्ची हाथ में मिलते ही मानो लल्लन की जान में जान आई. सीधे फैक्टरी की ओर भागा। पता नहीं उसे काम मिलने की खुशी थी या महेश बाबू से दूर भागने की। महेश बाबू का गुस्सा बहुत खतरनाक होता था।
नरेश दंग रह गया। बाबू ने उसे काम देने से मना कर दिया लेकिन महेश बाबू के आते ही लल्लन को काम मिल गया। लेकिन क्या वह इस मामले में बाबू से बहस कर सकता था। नहीं...नहीं कर सकता बहस। गाहे-बगाहे बाबू काम देता भी तो था। बहस कर लिया तो वह भी बंद हो जायेगा। क्या करे वह? क्या बिना यूनियन पकड़े उसे काम नहीं मिलेगा? कैसे पकड़े किसी यूनियन का दामन। दो ही यूनियन प्रभावी थी। एक लाल, दूसरा पंजा। सीपीएम और कांग्रेस लेकिन लाल और पंजा के नाम से मशहूर। लाल झंडा वालों के पास जाये या पंजा वालों के पास। जान पहचान तो किसी से नहीं थी लेकिन उसके कुछ ऐसे साथी थे , जो यूनियन में थे। जुलूस निकलता तो कंधे पर झंडा लेकर नारे लगाते हुए चलते थे. उस वक्त उनकी छाती गर्व से फैली होती थी। नरेश का भी जी करता कि वह भी नारे लगाये, झंडे ढोये। मजदूरों के बीच रूतबा बढ़ता है लेकिन क्या कोई यूनियन उसे इस लायक समझेगी?
सुना था लाल झंडे वालों की सरकार है, इसलिए उनकी खूब चलती है लेकिन साथ ही यह भी सुना था कि इसमें बंगालियों का वर्चस्व है और वे बिहारी मजदूरों की मदद नहीं करते। मेड़ो (पश्चिम बंगाल में यही कहकर हिंदीभाषियों को चिढ़ाया जाता है) कहकर भगा देते हैं। लेकिन पता नहीं क्यों उसे इस बात पर विश्वास नहीं होता था। वह बिहार के कितने ही मजदूरों को जानता था जो लाल झंडा वाली यूनियन में जाते थे। घंटों बैठे रहते थे। बाबू लोगों के लिए दुकान से चाय लाते थे, कुल्हड़ों में सबको चाय बांटते थे, खुद भी शान से बैठकर पीते थे। और जवाहर? उसका तो रूतबा देखने लायक है। जब भी चटकल मैदान में मीटिंग होती है, रिक्शा पर माइक लेकर वही चिल्लाता है--भाइयो और बहनो, आज शाम चार बजे, चटकल मैदान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया है. इस जनसभा में मजदूरों की समस्याओं पर विचार होगा। सभा को पार्टी के लड़ाकू नेता कॉमरेड जतीन चटर्जी सम्बोधित करेंगे। घंटों वह रिक्शा में घूमता और अपनी बुलंद आवाज में मुनादी करता रहता था। उसके पीछे-पीछे कुछ मजदूर-कुछ बच्चे भागते रहते । वह भी तो मेड़ो ही है। अगर बात मेड़ो की ही होती तो उसे ये काम क्यों मिलता? सब लोग उसकी कितनी इज्जत करते हैं।
जवाहर से उसकी थोड़ी जान पहचान थी। उसने तय कर लिया वह आज ही जवाहर से मिलेगा और लाल झंडा का सदस्य बन जायेगा। सारे दुख दूर हो जायेंगे। रोज काम मिलेगा। रोज काम अर्थात हर पंद्रह दिन बाद ठीक-ठाक तंख्वाह। फिर मुन्ना को बनर्जी बाबू के घर की सूखी रोटी नहीं खानी पड़ेगी। सुरसती को मन मार कर लोगों के सामने उधार के लिए हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। मुन्ना के लिए एक पैंट और सुरसती के लिए एक साड़ी जरूर ले लेगा। चप्पल भी। सुरसती के पास चप्पल तक नहीं है। नंगे पांव दौड़ती रहती है। थोड़ी सी उम्मीद और नरेश के सपनों की फ़सल लहलहाने लगी थी उसने बाबू की ओर देखा। वह चश्मे के बाहर से नरेश की ओर ही देख रहा था। नरेश की आंखों में नफ़रत झलकी तो उसने झट अपनी आंखें फेर ली। शायद झेंप गया था।

लेबर ऑफिस से वह सीधे जवाहर के घर ही गया था लेकिन जवाहर घर पर नहीं था। पता चला दो तीन घंटे बाद आयेगा। पार्टी के काम से कहीं गया हुआ है । मन ही मन जवाहर से ईष्या हुई। कितना व्यस्त रहता है जवाहर। बाबू लोगों में कितनी इज्जत है उसकी। सब उसकी बात सुनते हैं। काम को लेकर भी कोई समस्या नहीं। जब चाहा काम कर लिया, जब चाहा पार्टी के काम से निकल पड़ा। उसने व्यर्थ ही अपना समय गंवा दिया। और पहले ही यूनियन में आ जाना चाहिए था लेकिन अब वह इस गलती को नहीं दोहरायेगा। जवाहर से मिलकर ही जायेगा।वह जवाहर के घर के बाहर ही घूमने लगा। कुछ देर बाद वहीं बगल की चाय की दुकान पर जाकर बैठ गया। घर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। ज़रूरतें मुंह बाये खड़ी थीं और आज तो घर में राशन भी नहीं थी। किस मुंह से पत्नी और बच्चों के पास जाकर अपनी हताशा की बात कहेगा? घर जाने में देर होता देख कम से कम कुछ देर तक तो वे इस उम्मीद में रहेंगे कि उसे काम मिल गया है। अभाव में ऐसी उम्मीदें भूख पर भी भारी पड़ती हैं। बहुत बल मिलता है। उसने तय किया कि वह कुछ देर तक उन्हें इस उम्मीद का आनन्द उठाने देगा।

जवाहर उसे जतीन दा से मिलाने पर राजी हो गया था। उसने उम्मीद दिलाई थी कि यूनियन का सदस्य बनने के बाद काम मिलने में कोई दिक्कत नहीं होगी। नाम नंबर भी बन जायेगा। पीएफ कटने लगा। ईएसआई कार्ड बन जायेगा। हजारों सपने। छोटा सा मन। उछलता हुआ घर लौटा था नरेश।वक्त से पहले उसे देखकर सुरसती की उम्मीदों को झटका लगा था--का हुआ जी? आज भी काम नहीं मिला?
--नहीं, काम तो नहीं मिला लेकिन अब काम मिलेगा?
--कैसे?
और नरेश ने सारा किस्सा उत्साह के साथ बांच दिया था। उम्मीद का दीया और तेज जलने लगा था। लेकिन बिना भात के दोपहर कैसे कटेगी? कम से कम बच्चों के लिए कोई व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी। हमेशा की तरह सुरसती ने ही की थी व्यवस्था। पड़ोस से चावल उधार मांग कर लाई थी। जल्द ही वापस लौटाने के करार पर। दोपहर ठीक-ठाक गुजर गई। अब सारी उम्मीदें शाम पर टिकी थीं।

लाल झंडा का ऑफिस कारखाने के उत्तरी गेट के ठीक सामने था। अगल-बगल चाय की दो दुकानें। दिन भर चलने वाली दुकानें। कार्यकर्ताओं-मजदूरों-नेताओं की भीड़ लगी रहती थी। यहां एक घंटे बैठ जाओ तो कारखाने के बारे में, नेताओं के बारे में इतनी ज्यादा जानकारी मिल जाती थी कि बस पूछिए मत। कुछ जानकारी सही होती थी तो कुछ अटकलें। सिर्फ कारख़ाना ही क्यों राज्य और देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितयों का आकलन, अखबार की एक-एक ख़बर की समीक्षा। अगर पढ़ना नहीं आता है तो भी कोई बात नहीं। एक अखबार पर जब दस दस लोग हों तो उनमें से एक वाचक की भूमिका में आ जाता था। बाकी नौ गोलबंद होकर ख़बर का मजा लेते थे। टिप्पणियां करते थे। बहस होती थी। बड़े-बड़े बुध्दिजीवी इन बहसों के आगे नहीं टिक सकते थे। सही मायने में अख़बार कैसे जनमत बनाता-बिगाड़ता है, इसका जीता-जागता प्रमाण इस चाय की दुकान पर मिल जाता था। कभी-कभी बहस हंगामे और मारपीट तक में तब्दील हो जाती थी।

नरेश जवाहर के बताये समय पर चाय की दुकान पर पहुंच गया था। लाल झंडा के ऑफिस में लोगों का आना जाना शुरू हो गया था। लगभग दस पंद्रह लोग भीतर बैठे भी थे। नरेश को बाहर ही इंतजार करना था। जवाहर के आने पर उसके साथ ही अंदर जाने की बात थी। उसके अन्दर का शर्मीला आदमी अब धीरे-धीरे जगने लगा था। इतने लोगों के बीच अपनी बात जतीन दा के सामने कैसे रख पायेगा?वह चाय की दुकान पर बैठ गया। डरते-डरते। सुना था दुकान वाला चाय का ऑर्डर नहीं देने वाले को नहीं बैठने देता । आप एक चाय पी लीजिये और घंटों बैठ कर राजनीति पर भाषण झाड़ते रहिए , उसे कोई समस्या नहीं थी लेकिन बिना ऑर्डर के बैठने पर किचकिच होने की आशंका थी लेकिन नरेश ने रिस्क उठाया और एक बेंच पर बैठ गया। चाय वाले ने ध्यान नहीं दिया। दुकान पर भीड़ थी और वह काफी व्यस्त था। अखबार के भीतर का एक पन्ना बेंच पर पड़ा हुआ था। उसने उठा लिया और पढ़ने की कोशिश करने लगा लेकिन पढ़ नहीं पाया। वह अखबार पर नज़र गड़ा ही नहीं पा रहा था। उसकी नज़रें बार-बार सड़क की ओर उठ जाती थी। जवाहर अभी तक आया क्यों नहीं? तय समय के हिसाब से तो उसे अब तक आ जाना चाहिए था। अखबार पर नज़र पड़ते ही मन में आशंका घुमड़ने लगती कि कहीं उसकी नज़र चूक गई और जवाहर यूनियन में घुस गया तो? वह अखबार का पन्ना हाथ में लेकर जवाहर के लिए टकटकी लगाये रहा।

एक घंटे बीत चुके थे। चाय की दुकान पर कितने ग्राहक आये और चले गये लेकिन नरेश उसी बेंच पर बैठा जवाहर की बाट जोहता रहा। यूनियन ऑफिस में और भीड़ हो गई थी। लगभग ठसाठस भर गया था। हंसी-मजाक -शोरगुल लेकिन उसके लिए सब जैसे बाहरी दुनिया की बात थी। उसकी दुनिया तो बस जवाहर के कदमों की आहट तक सिमट गई थी। कहीं ऑफिस में आ तो नहीं गया। हो सकता है उसकी नज़रें चूक गईं हो और जवाहर ऑफिस के अन्दर चला गया हो। लेकिन उसने तो चाय की दुकान पर ही इंतजार करने को कहा था।मन नहीं माना। वह बेंच से उठकर ऑफिस के सामने गया। ऑफिस खचाखच भरा हुआ था। अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई उसकी। उसके अन्दर का मेड़ो उसे ऑफिस से दूर धकेलने लगा। अगर ऑफिस के अन्दर गया और किसी ने मेड़ो कहकर भगा दिया तो? वह खिड़की के पास तक आया। भीतर झांक कर जवाहर को ढूंढने की कोशिश की लेकिन जवाहर नहीं दिखा।

भीतर मनमोहन सरकार की कोई बात चल रही थी। सोनिया और ज्योति बसु की मुलाकात की बात चल रही थी। कोई जोर-जोर से हंस रहा था। तरह-तरह की बातों का मिश्रण और कुल मिलाकर मछली बाज़ार का माहौल । मार्क्सवाद का मछली बाज़ार या मछली बाज़ार में मार्क्सवाद--समझ में नहीं आया। हताश कदमों से फिर चाय की दुकान पर वापस लौट आया

तीन घंटे बीत गये थे। रात के नौ बज रहे थे। जवाहर नहीं आया। अब आने की संभावना भी नहीं थी। यूनियन ऑफिस लगभग खाली हो चुका था। चार पांच लोग थे और लग रहा था कि वे ही यूनियन ऑफिस बंद कर चले जायेंगे। चाय की दुकान भी खाली हो गई थी। चाय वाले की नज़र अब उस पर पड़ी।--क्या भाई? क्या बात है? शायद तुम शाम से ही यहां बैठे हो? कोई काम-धाम नहीं है क्या?

नरेश लगभग घबड़ा गया। याद आ गई चाय वाले बिना ऑर्डर के बैठने वालों को भगा देता है। उसे लगा अब बेइज्जत भी होना पड़ेगा। उसने लगभग डरते-डरते कहा--माफ करना भाई, तुम्हारी दुकान पर बहुत देर बैठ गया। एक आदमी का इंतजार कर रहा था लेकिन वह आया नहीं।
--कोई बात नहीं। यहां बैठने की मनाही नहीं है। ग्यारह बजे तक दुकान खुली रहती है तुम और दो घंटे बैठ सकते हो लेकिन बात क्या है? बहुत परेशान हो।
नरेश को राहत मिली। उसने अपना पूरा दिल उघाड़ कर रख दिया। इस ज़माने में ऐसा आदमी कहां मिलता है, जो दूसरों का दर्द सुनने के लिए वक्त निकाल सके।
--तो अभी तुम्हें दौड़ायेंगे सब। नेता लोग इतना जल्दी काम थोड़े ही करते हैं? मैं तो बरसों से यही देख रहा हूं? चाय वाले ने कहा और साथ ही पूछा---चाय पियोगे?
नरेश चुप रहा।
--पैसे की चिंता न करो। जब काम मिलेगा तो दे देना। शाम से बैठे हो। अरे छोटू, बाबू को चाय देना।
छोटू चाय दे गया।नरेश ने पूछा--दौड़ाते हैं लेकिन काम तो कर देते हैं न?नरेश दौड़ने के लिए तैयार था।
--देखो भाई, काम होता भी और नहीं भी होता है। सब इस बात पर है कि तुम्हारा सोर्स कैसा है।
सोर्स तो उसका जवाहर था। कायदे से मजबूत सोर्स था। काम हो जाना चाहिए था लेकिन वह चुप ही रहा।
--जाओ, अब कल एक बार फिर चक्कर लगाना। अब तो इतनी रात को यहां कोई आयेगा भी नहीं और अब ऑफिस तो बंद भी होगा।
कुछ देर बाद ऑफिस बंद भी हो गया. नरेश टूट गया। जब तक ऑफिस खुली थी उम्मीद की एक किरण बाकी थी कि शायद जवाहर आ जाय। भले ही जतीन दा से भेंट नहीं हो लेकिन जवाहर से भेंट होने पर भी उसे थोड़ी तसल्ली, थोड़ा दिलासा मिल जाता। वह बुरी तरह थक गया था। मानसिक रूप से भी और शारीरिक रूप से भी। किस मुंह से घर जाय। पता नहीं क्यों घर शब्द से ही अब उसे चिढ़ होने लगी थी। अभाव और घर दोनों एक साथ नहीं हो सकते। आदमी की ज़िन्दगी में इनमें से कोई एक ही होना चाहिए। घर जाते ही सुरसती का सवाल--क्या हुआ जी और जवाब सुनने के बाद उससे भी कठिन सवाल--अब क्या होगा जी?
दूसरे दिन भी वह तय समय पर यूनियन ऑफिस पहुंच गया था। चाय वाले से जान-पहचान हो गई थी। बैठते ही चाय आ गई। वह चकित रह गया। चाय वाले ने कहा--चिंता न करो। दो चाय का पैसा हो गया। काम मिलते ही दे देना।
चाय वाले ने उधारी शुरू कर दी थी। उधार लेते उसका दिल कांप उठा लेकिन निराला काका की बात याद आ गई--चटकल में काम करोगे और उधार नहीं लोगे-- यह कैसे हो सकता है। और उसके बाद खुला ठहाका। ऊपर से नीचे तक कर्ज में डूबे निराला काका कैसे ठहाके लगा लेते थे, यह बात आज तक नरेश नहीं समझ पाया। कर्जदारों के तकादे आते, गालियां सुनते लेकिन फिर अपने रंग में। जोरदार ठहाके। ठहाकों पर ठहाका। घर में चूल्हा नहीं जला तो ठहाका, पत्नी से झगड़ा हुआ तो ठहाका, मिल में किसी बाबू से झगड़ा हुआ तो ठहाका। केवल ठहाका। निराला काका को देख उसे आश्चर्य भी होता और बल भी मिलता। दुखों से दो दो हाथ करने की ताकत मिलती। ज्ञान भी अच्छा था निराला काका का। पुराने जमाने के मैट्रिक पास थे। बहुत कुछ बताते थे नरेश को। नरेश ने उनसे बहुत कुछ सीखा था, समझा था लेकिन यूनियन वाली बात उसने अभी तक निराला काका को नहीं बताया था। बताते तो फिर लगता जोरदार ठहाका और फिर ऐसी बातें कि उसका दिल बैठ जाता। उसने सिर झटक दिया।

चाय ठंडी हो रही थी। वह चाय सुड़कने लगा।यूनियन ऑफिस अभी खुला नहीं था। चार बजे के आसपास खुलता था। उस दिन जवाहर आया था। जतीन दा से मुलाकात भी हुई। जतीन दा ने ढेर सारे सवाल दागे--कब से इहां हो, अब तक यूनियन में काहे नहीं आया। फिर जवाहर से पूछा था-चंदा दे पाएगा ये? जवाहर ने नरेश से पूछा--चंदा कहां से दोगे? मेम्बर बनने के लिए चंदा देना पड़ता है।
नरेश चुप। इस बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था। जवाहर ने सुझाया-काम मिलने के बाद दे देना?कितना अच्छा सुझाव था। नरेश तत्काल राजी हो गया। जवाहर को उसने ऐसे देखा मानो वो भगवान हो। बाद में जवाहर ने बताया था कि बाद में चंदा देने पर थोड़े ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। कोई बात नहीं, थोड़ा ज्यादा पैसा दे देगा। पहले काम तो मिले। आखिरकार जवाहर की मदद से वो लाल हो गया। लाल झंडा का आदमी। अपने आप उसकी अक़ड़ थोड़ी बढ़ गई। शायद अब रोटी के लाले नहीं पड़े। सिर उठाकर घर पहुंचा था।

15 दिन बीत गए। काम मिलना बिल्कुल बंद हो गया था। पहले तो बाबू के पास चक्कर लगाने पर एकाध रोज काम मिल भी जाता था लेकिन अब तो वो भी बंद हो गया था। उसने बाबू के यहां जाना छोड़ दिया था। अब सारी उम्मीद जतीन दा से थी। जवाहर ने कहा भी था कि जतीन दा ये बिल्कुल पसंद नहीं करते कि उनकी यूनियन का कोई आदमी काम के लिए जाकर बाबू के पास गिड़गिड़ाए। तुम निश्चिंत रहो, बाबू साला बुलाकर काम देगा। नरेश को काफी अच्छा लगा था। तो अब वो बेसहारा साधारण आदमी नहीं है।लेकिन 15 दिन बीतते-बीतते उसे अपनी बेचारगी का एहसास होने लगा था। लाल का आदमी होने की हेकड़ी गुम होने लगी थी। सुबह-शाम नियम से यूनियन ऑफिस जाता। पटला दा आफिस खोलता और उसके बाद पूरे आफिस की साफ सफाई। बड़े से लेकर छुटभैये नेताओं तक की सेवा। सबको लाकर चाय पिलाना। चाय का बर्तन धोकर रखना। जतीन दा रोज आता। सफेद कुर्ता, सफेद पाजामा। बगल में खादी का बैग लटकाए। रोज पूछते कैसे हो और वो रोज बताता अच्छा है लेकिन अभी तक हिम्मत नहीं हो पाई थी कि काम के लिए सीधे जतीन दा से बोले। जवाहर से कई बार बोल चुका था लेकिन उसका जवाब भविष्य के सपने दिखाता था। वर्तमान के बारे में उसके पास कहने को कुछ भी नहीं था। क्या जतीन दा जैसे नेता को ये भी नहीं पता कि परदेस में काम के बिना किसी आदमी का क्या हाल हो सकता है? क्या उन्हें ये भी नहीं दिखता की पार्टी आफिस में एक आदमी सुबह-शाम नौकर की तरह क्यों खट रहा है?
जवाहर कहता-देखो अभी तुम्हें आए दस-पंद्रह दिन ही हुए हैं। आते ही काम के लिए कैसे कह सकते हो? यहां लोगों ने सालों संघर्ष किया है। पार्टी के लिए काम किया है। तब जाकर ये मुकाम मिला है। और तुम चाहते हो कि तुम्हें आते ही काम मिल जाय। पार्टी को इस्तेमाल की चीज मत समझो।सुरसती को वो ये बात कैसे समझाएं। अब तो बच्चों की बदहाली उससे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। अपनी भूख मार भी ले लेकिन बच्चे तो उसे ही तंग करते हैं। बच्चों की भूख की तड़प अब सुरसती के मुंह से व्यंग्य बन कर निकल रही थी। घर पहुंचते ही पूछती-क्यों नेताजी, आज भी कुछ नहीं हुआ और नरेश टूट कर रह जाता।
और आज तो हद हो गई। घर पहुंचा तो सुरसती घर पर नहीं थी। दोनों बच्चे गला फाड़-फाड़ कर रो रहे थे। पूछने पर पता चला कि सुरसती सुबह से ही गायब है। बच्चों ने सुबह से कुछ नहीं खाया था। मां के लिए तो वो रो ही रहे थे, भूख उन्हें और तड़पा रही थी।नरेश की समझ में नहीं आया कि क्या करे? पहले सुरसती को ढूंढे या बच्चों की भूख मिटाए। घर में आस-पड़ोस की औरतों की भीड़ जमी हुई थी। सब बच्चों को चुप कराने की कोशिश में जुटी थीं। ऊपर से हर तरह की बातें, तरह-तरह के कयास। नरेश के पहुंचते ही वो शुरू हो गईं।
'कहां चले जाते हैं आप लोग?'
'अरे बच्चों का तो ध्यान रखा कीजिए।'
'सुबह से इनकी मां भी गायब है।'
'अरे मां के लिए रो रो कर बुरा हाल है। बाप तो बेचारा काम के जुगाड़ में भटक रहा था।'
'अरे भूख भी लगी है इन्हें।'
'अरे कोई रोटी वगैरह लाकर दो'
और पंडिताइन रोटी लाने चली गईं। जाकर झट से चार रोटी लाईं। दोनों बच्चे खाने लगे। आंसू थम गए थे।इस मकान की यही खासियत थी। लोग एक दूसरे से झगड़ा भी करते थे लेकिन दुख के वक्त एक दूसरे के साथ खड़े भी नज़र आते थे। लेकिन जो भी हो आज उसका घर पहली बार तमाशा बन गया था। तमाशा बन गया था वो खुद, भिखारी बन गए थे उसके बच्चे और तमाशा बन गई थी सुरसती।
अब घर से भीड़ छंट गई थी। बच्चे भी चुप हो गए थे। सिर झुकाए नरेश बैठा था। कहां गई होगी सुरसती? गरीबी और अभाव से तंग आकर कहीं जान तो नहीं दे दी उसने? अक्सर वो इस तरह की बातें किया करती थीं। कहती थी-गंगा मैया ही अब सहारा है। जब बर्दाश्त नहीं होगा, जाकर उन्हीं की गोद में समा जाऊंगी। कभी कहती-रेल के आगे कूदकर जान दे दूंगी। मन बुरी तरह घबड़ा रहा था। तरह-तरह की अनिष्ट आशंकाएं मन में हावी हो रही थी। अगर ऐसा होता है तो इसका जिम्मेदार केवल और केवल वो है। वो बीवी और बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नहीं मुहैया करा सकता।किस तरह का बाप है वो? कैसा पति है वो? अगर सुरसती ने कुछ कर लिया तो वो खुद को कभी भी माफ नहीं कर सकता। वो हत्यारा है। जीते जी वो अपने बीवी और बच्चों को मार रहा है। क्या मतलब है उसकी जिंदगी का?अब वक्त बर्बाद करना ठीक नहीं था। सुरसती को खोजने जाना जरूरी था। बच्चे घर में अकेले नहीं रहना चाहते थे। छोटे-छोटे बच्चों के मासूम मन में भी शायद अनिष्ट आशंकाएं बलवती हो रही थीं। इसलिए वो पापा के साथ मां को खोजने जाने की जिद कर बैठे। नरेश उन्हें साथ लेकर निकल पड़ा।
गंगा घाट की आखिरी सीढ़ी पर सुरसती बैठी मिल गई।राहत की सांस ली थी नरेश ने। गंगा शान्त थी लेकिन सुरसती उफ़ान पर थी। नरेश के हर सवाल का जवाब चुप्पी। और फिर सवाल-'हम क्या गांव वापस नहीं लौट सकते?'
हिल उठा था नरेश। कितनी उम्मीदों से गांव से शहर आया था। अभाव और दर्द के गांव को ठेंगा दिखाते हुए। मानो ये कहते हुए-देखो, हम जा रहे हैं। हमारे लिए तुम्हारे पास रोटी और छत नहीं है तो हम भी तुम्हारी गोद में रहने को बेकरार नहीं। रहो अकेले। हम तो चलें।लेकिन शहर तो गांव से भी ज्यादा बेदर्द निकला था। शायद इसीलिए उचट गया था सुरसती का मन। दोबारा पूछा-'तुमने जवाब नहीं दिया? क्या हम गांव नहीं जा सकते?'
'कहां जाएंगे गांव में? किसके यहां जाएंगे? कौन है जो नज़रें बिछाएं हमारे लिए बैठा है? क्या करेंगे गांव में?'
'तो शहर में ही हम क्या कर रहे हैं। गांव में तो कम से कम मैं भी खेतों में मजूरी कर लूंगी। यहां दूसरों के घर जाकर चौका बर्तन करने से तो बेहतर है अपनी जमीन की सेवा करना।'
'नहीं सुरसती। हम इतनी जल्दी नहीं हारेंगे। हम लड़ेंगे?'
' कब तक , जब बच्चे भूख से दम तोड़ देंगे। '
'समझने की कोशिश करो सुरसती।हम गांव से उजड़े हुए लोग। गांव ने हमें त्याग दिया है?'
'तो शहर ने कौन सा अपना लिया है?'
इस सवाल का कोई जवाब उसके पास नहीं था। वो भी चुप बैठा रहा। बच्चे खेल रहे थे। गंगा धीर गंभीर बहती जा रही थी। मानो उनके दुख के बोझ से वो भी बुरी तरह दब गई हो।