Thursday, January 8, 2015

एक था पीके

व्यंग्य
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

एक था पीके। ये अलग बात है कि वो पीता नहीं था। वो इस गोले यानि ग्रह का नहीं था। बचपन से ही वो पढ़ने लिखने में काफी तेज़ था। बहुत ही मेधावी। गणित और विज्ञान के सवाल तो चुटकियों में हल कर देता था। उसके मां-बाप का भी सपना था कि बड़ा होकर वो डॉक्टर-इंजीनियर बने। हर गोले पर मां-बाप बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने का ही सपना देखते हैं लेकिन वो इस गोले के इडियट बच्चों जैसा नहीं था। वो अपने मां-बाप के सपनों पर खरा उतरा और बन गया एस्ट्रोनॉट।
वो कितना तेज़ था, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जब उसके गोले के इसरो या नासा ने मिशन अर्थ शुरू किया तो उसे इसका लीडर बना दिया। वो बड़ी ही कामयाबी से धरती पर लैंड भी कर गया लेकिन ये क्या वो तो नंगा उतरा था। मेरी समझ ये बात नहीं आई कि जिस गोले का इसरो या नासा धरती के इसरो या नासा से इतना तेज़ था, उस गोले पर कपड़े का ही आविष्कार नहीं हुआ था। वो नंगे रहते थे। यही नहीं उसे बोलना भी नहीं आता था। कोई जुबान नहीं। कोई भाषा नहीं। बिल्कुल अपनी धरती का आदि मानव। अब दूसरे गोले का आदि मानव स्पेसक्राफ्ट लेकर धऱती पर आ जाता है तो मंजूर लेकिन जब अपने यहां के पढ़े लिखे लोग ये दावा करते हैं कि सारे बड़े-बड़े आविष्कार प्राचीन भारत में हो गया था तो हंगामा  मच जाता है। हद है भाई।
धरती पर उतरते ही उसे पता चल गया कि बीजेपी के राज में भी राजस्थान में कानून-व्यवस्था कितनी खराब है। अभी ठीक से धरती को समझा भी नहीं था कि एक उचक्का उसके गले से उसका रिमोट लेकर भाग गया। बस पीके यहीं से भटक गया। रिसर्च की बात भूल गया। इसके बाद तो वो रिसर्च के अलावा उसने  वो सबकुछ किया, जिसके लिए उसके गोले ने उसे यहां नहीं भेजा था। दिल्ली की हवा तो उसको ऐसी लगी कि वो कानून का मजाक भी उड़ाने लग गया। धर्म और राजनीति के चक्कर में फंस गया। बस बेचारा नहीं समझ पाया तो मीडिया को। मीडिया ने तत्काल कुत्ते को गोद से उतार कर उसे अपनी गोद में बिठा लिया। लाइव-लाइव का खेल होने लगा। झूठ बोलना भी सीख गया। मतलब पीके नाम का वह आदि मानव इस गोले से पूरी तरह आदमी बनकर लौटा। कपड़ा भी पहने हुए था।
बिना रिसर्च किए लौट गया लेकिन एक साल बात उसके गोले ने उसे फिर वापस भेज दिया यानि नॉन परफॉर्मर का प्रमोशन। जाहिर है अपने गोले पर भी उसने करप्शन फैला दिया होगा।
और हां, पता नहीं उसे हर जगह डांसिंग कारें कैसे मिल जाती थी? डांसिंग कारों से कपड़ा चुराना इतना आसान है क्या? एक गाने में दिल्ली में तो एक पार्किंग में सारी कारें  डांस कर रही थीं। अब ये पार्किंग कहा हैं, मुझे तो पता नहीं लेकिन अगर आपको पता चल जाए तो दिल्ली पुलिस को जरूर सूचित कर दीजिएगा। ये डांसिंग कारें तो दूसरे गोले पर भी भारत का नाम खराब कर रही हैं।


Friday, January 3, 2014

'कसक' कहानी का आखिरी भाग



मत्स्यमुखी के दिन सुबह नहीं पहुंच पाया था अनमित्र। स्कूल से इमरजेंसी बुलाया आ गया था। उसने छुट्टी ले रखी थी, फिर भी उसे बुलाया गया था। परीक्षा के बारे में मैनेजिंग कमेटी ने आपात बैठक बुलाई थी।
वो दोपहर तीन बजे अहोना के घर पहुंचा था। खाना-पीना चल रहा था।

‘अरे, कहां रह गए थे तुम? मैंने तो सोचा तुम आओगे ही नहीं।’ मानसी दी ने दरवाजे पर ही उसे पकड़ लिया। अंदर ले जाकर बिठाया। अहोना पानी  लेकर आई।
‘चाय पिओगे?’ अहोना ने पूछा था।
‘सॉरी अहोना। अचानक स्कूल जाना पड़ गया’
‘कोई बात नहीं। परेशान ना हो’ अहोना ने कहा था।

शाम को पूरा परिवार ड्राइंग रूम में बैठा था। मां, दादा,  बौदी, जामाई बाबू, मानसी दी, अहोना सभी मौजूद थे। बाहर का केवल वही था लेकिन अब वो बाहर का था कहां। घर का ही हिस्सा बन गया था। दादा स्कूल की मीटिंग के बारे में पूछ रहे थे। वो भी टीचर थे, इसलिए उनकी  दिलचस्पी  थी। मत्स्यमुखी रस्म के साथ ही अहोना के पिताजी पूरी तरह से विदा हो गए। बस फोटो और यादों में बचे रह गए। कुछ देर बाद दादा कहीं निकल गए और फालतू की बातें होने लगी। तरह-तरह की बातें।

और इसी बातचीत में जामाई बाबू के मुंह से निकला था—अपनी अहोना के लिए तो अनमित्र जैसा ही लड़का चाहिए।

सबने समर्थन किया था। अहोना ने सिर झुका लिया था। अनमित्र भी मानो शॉक्ड रह गया था। जामाई बाबू ने कहा था—अनमित्र जैसा और अनमित्र के कानों में गूंज रहा था—अनमित्र, अनमित्र, अनमित्र, अनमित्र-अहोना, अनमित्र-अहोना, अनमित्र-अहोना...

लेकिन आज वो समझ पाया था अनमित्र जैसा का मतलब अनमित्र नहीं होता। वो भास्कर होता है। वो भास्कर, जिसके साथ अहोना ने सफल दांपत्य जीवन बिताया था। वो भास्कर, जिसने अहोना को दी थी जिंदगी भर की खुशियां। वो भास्कर, जिसने अहोना को दिया था भरा-पूरा परिवार। वो भास्कर, जिसे आज भी बहुत मिस करती है अहोना।

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‘अपने बारे में कुछ नहीं बताया’ अहोना ने उसकी तंद्रा तोड़ी थी।
हंसा था अनमित्र, ‘मैं अनमित्र बनर्जी, रिटायर्ड टीचर’

अहोना ने गुस्से से उसकी तरफ देखा, ‘हर बात पर मजाक कैसे कर लेते हैं?’

‘गुस्से में तुम्हारी आंखें आज भी उतनी ही सुंदर लगती है, जैसे पहले लगती थी। कॉलेज के एनुअल फंक्शन के दौरान लिपिस्टिक वाली बात पर भी तुमने मुझे ऐसे ही देखा था।’ अनमित्र ने हंसने की असफल कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाया। अहोना  का मन घबड़ाने लगा। आखिर  क्या छिपा रहा है अनमित्र?

तभी एनाउंसमेंट हुआ था—डानकुनि जाने वाली ट्रेन फोर ए नंबर प्लेटफॉर्म से छूटेगी।

अनमित्र ने कहा, ‘तुम्हारी ट्रेन आ रही है। चलो मैं तुम्हें बिठा देता हूं।’

‘डानकुनि के लिए बहुत ट्रेनें आएंगी। आखिर तुम क्या छिपाने की कोशिश कर रहे हो?’ अहोना परेशान हो गई, ‘क्या तुम किसी तकलीफ में हो?’

अनमित्र ने कातर निगाहों से अहोना की ओर देखा था। उसकी आंखें भर आईं।
अहोना दर्द की आग में झुलस गई। ये क्या देख रही है वो? अनमित्र की आंखों में आंसू। कितना मजबूत, कितना प्रभावी व्यक्तित्व हुआ करता था उसका, वो रो रहा है। उसने ध्यान से अनमित्र की ओर देखा। दाढ़ी बेतरतीब बढ़ी हुई थी। पैंट-शर्ट भी साधारण सा। पैर में मामूली सी चप्पल। ये क्या उसका वही अनमित्र है, जिसे देख कर मन को सकून मिलता था। उसकी बातों से आत्मविश्वास बढ़ जाता है। उसने अनमित्र का एक हाथ पकड़ लिया।

‘क्या हुआ अनमित्र?’

अनमित्र झेंप गया। उसे इतना कमजोर नहीं पड़ना चाहिए था। वो इतना कमजोर नहीं है।

‘कुछ नहीं, तुम गलत समझ रही हो। आंख में ऐसे ही पानी आ गया। आज ही डॉक्टर दिखाउंगा’ जेब से रूमाल निकाल कर आंखें पोंछते हुए उसने कहा।

‘मुझसे तुम कभी झूठ नहीं बोल पाए अनमित्र। आज भी तुम्हारी झूठ मेरे सामने नहीं टिकने वाली। क्या बात है बताओ ना? क्या तुमने मुझे इतना पराया कर दिया है कि अपना दर्द भी मुझसे नहीं बांट सकते।’ अहोना की आवाज़ भर्रा गई।

अनमित्र के चेहरे पर दर्द उभर आया। उसने अहोना को भरपूर नजरों से देखा और वो सवाल पूछ ही बैठा, जिसे वो इतनी देर से अपने मन में दबा कर रखा था, ‘अहोना, क्या तुम्हें कभी मेरी याद नहीं आई, कभी मुझे मिस नहीं किया? कभी मेरा हालचाल जानने की कोशिश नहीं की।’

‘तुमने भी तो कभी मेरी ख़बर नहीं ली है।’ उसने उल्टे आरोप मढ़ दिया था।

जवाब नहीं था उसके पास। जब आदमी अपनी दुनिया, अपने संसार में मगन हो जाता है तो फिर कहां मिलता है वक्त? पति. बच्चे, ससुराल। ऐसा नहीं कि याद नहीं आई कभी लेकिन हालचाल पता करने की ताकीद कभी अंदर से महसूस नहीं  की थी उसने।

‘ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है अहोना। वैसे मैं जामाई बाबू से दो-तीन बार मिला था। तुम्हारे बारे में पता किया था। तुम अपने संसार में सुखी थी।’

अहोना चुप रह गई। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने कहा, ‘’तुम पता नहीं कहां गायब हो गए? मिलने को कितना जी करता लेकिन तुम काम में इतने बिजी हो गए कि अहोना को भूल ही गए।’

‘भूल गया?’ अनमित्र ने हैरानी से अहोना की ओर देखा था। आज भी उसकी यादों के सहारे वो जिंदा है और अहोना कह रही है कि वो उसे भूल गया।

‘और नहीं तो क्या?’ अहोना की आवाज़ में उलाहना थी, ‘पिताजी के श्राद्ध के बाद तो तुम मानो गायब ही हो गए। कितनी बार मिलने आए तुम मुझसे?’

‘गायब नहीं हुआ। कांचरापाड़ा में ही रहता था। तुमने मेरा घर भी देखा था। तुमने कभी मुझे मिस ही नहीं किया, अगर किया होता तो मेरे  घर आ सकती थी। मैं रोज सोचता तुम्हारे यहां  आऊं लेकिन चाह कर भी नहीं  जा पाता। तुम्हारे घर के आसपास  भी  टहल आता लेकिन दरवाजे पर  दस्तक नहीं दे पाया।’

अहोना ने बड़ी हैरानी से अनमित्र की ओर देखा, ‘मगर क्यों?’

‘पता नहीं क्यों। अंदर से हिम्मत ही नहीं होती थी। शायद मेरे मन में कोई चोर था। एक बार हिम्मत जुटा कर   गया भी था तो तुम मानसी दी के घर गई थी और पता चला कि कई दिनों के लिए गई हुई थी। बौदी मिली थी।’

‘एक बार नहीं मिली तो इसका मतबल ये थोड़े ही था कि तुम घर आना ही बंद कर दो। मैं तुम्हें अक्सर ही याद करती थी।’

‘और मैं हमेशा’ अनमित्र ने गहरी सांस ली, ‘और एक दिन जब देर रात घर लौटा तो मां ने तुम्हारी शादी का कार्ड थमाया था। अहोना वेड्स भास्कर’

‘हां, शादी का कार्ड देने मैं और जामाई बाबू गए थे लेकिन तुम नहीं मिले थे।
शादी में भी तो तुम नहीं आए। सबने तुम्हें बहुत मिस किया?’

‘और तुमने?’ अनमित्र ने सवालिया निगाहों से उसकी ओर देखा था।

बहुत देर चुप्पी छाई रही। फिर अहोना ने धीरे से पूछा, ‘तुम आये क्यों नहीं?’
चुप रहा अनमित्र। क्या जवाब देता कि वो।

‘छोड़ो, बहुत पुरानी बातें हो गईं। अब इन बातों में क्या रखा है? तुम्हारी शादी का गिफ्ट जरूर बाकी है। अगर कहो तो...’

‘चुप भी रहो’ अहोना झुंझला गई, ‘अब जब भास्कर ही नहीं रहे तो फिर शादी का गिफ्ट।’

अनमित्र महसूस कर रहा था कि भास्कर के बिना जिंदगी काटना किस तरह अहोना के लिए मुश्किल हो रहा था।
‘सॉरी, मेरा मतलब वो नहीं था।’

‘तुमने अपने बारे में अभी तक नहीं बताया?’ अहोना ने कहा।
‘क्या बताऊं अपने बारे में? बताने लायक कुछ भी तो नहीं है। अकेली जिंदगी। छोटा सा रूम। पेंशन का पैसा। बस यही है मेरी जिंदगी।’
‘शादी नहीं की तुमने?’
‘क्यों ऐसा क्यों लगा तुम्हें?’ अनमित्र ने शरारत भरे अंदाज़ में पूछा ’ कहीं तुमने ये तो नहीं सोच लिया था कि तुम शादी करके चली जाओगी तो मैं सारी जिंदगी कुंआरा ही बैठा रह जाऊंगा।’

अहोना ने आंखें तरेर कर उसकी ओर देखा। अनमित्र हंस पड़ा। हालांकि वो तत्काल झेंप भी गया। पहली बार उसने अहोना से इस तरह की बात की थी। झेंप मिटाने के लिए गंभीर होना पड़ा।

‘शादी करने का शायद वक्त ही नहीं मिला या सच कहो तो इस बारे में सोच ही नहीं पाया।‘

अहोना सन्न रह गई।

‘मगर क्यों?’

‘वजह तो कोई खास नहीं थी, बस ये समझ लो कि मेरी कुंडली में शादी नहीं थी। बड़दा (भैया) ने शादी नहीं की तो मैंने भी इस बारे में नहीं सोचा। स्कूल में मास्टरी के साथ-साथ समाजसेवा के कामों में जुट गया तो फिर वक्त ही नहीं मिला।’

दोनों चुप रहे।

‘पूरी जिंदगी अकेले काट दी?’ अहोना की आवाज़ में दर्द था।

‘नहीं, मेरे पास तुम्हारे साथ बिताए एक एक पल की यादें थी। खासकर उन 15 दिनों की यादें, जो बाबा की मृत्यु के बाद तुम्हारे  साथ बिता था। शादी करता तो शायद वो खूबसूरत यादें दूसरी जिम्मेदारियों की धूल तले दब जातीं। जो हुआ, ठीक ही हुआ”अनमित्र की आवाज बिल्कुल सपाट थी।

फिर कभी खत्म ना होने वाली एक चुप्पी  छा गई।

अचानक सुबक-सुबक कर रो पड़ी थी अहोना।

ये आंसू उसके अकेलेपन पर था। उसके दर्द पर था या शायद उन दोनों के दर्द पर था। शायद कोई कसक थी, जो दोनों को कचोट रही थी लेकिन आंसू अहोना की आंखों से बह निकले। अनमित्र की उंगलियां आज उसके आंसू नहीं पोंछ पाई। आज अहोना की आंखों से दर्द बह रहे थे। काफी देर दोनों चुपचाप बैठे रहे। हाथ में आधा पैकेट झालमुड़ी वैसे ही पड़ा रहा और अब तो नरम भी हो गया था। ट्रेनों के आने-जाने का ऐलान होता रहा। स्टेशन पर अचानक शोर का  सैलाब उमड़ता, फिर करीब-करीब सन्नाटा छा जाता। लेकिन उन दोनों के मन में सन्नाटा था। ऐसा सन्नाटा जो बहुत गहरे उतर गया था। इतने गहरे कि वो दोनों मानों भूल ही गए थे कि वो एक दूसरे के पास बैठे हुए हैं। दोनों मानो भूल गए थे कि उन्हें अपने अपने घर जाना है। एक को कांचरापाड़ा तो दूसरे को डानकुनी। जिंदगी की ढलान पर एक अजीब सी कसक ने उन दोनों को जड़ कर दिया था। आसमान में आज भी वो तारे टिमटिमा रहे थे, जिन्होंने कभी अनमित्र को अहोना के आंसू पोंछते देखा था।


Thursday, January 2, 2014

'कसक' कहानी की चौथी किस्त



हां, वो था। अहोना के पास। हर वक्त। दिन भर।
उसे याद है दिसंबर की वो दुपहरी, जब उसे अंकल यानि अहोने के पिता के दिल के दौरे के बारे में पता चला था। भागा-भागा पहुंचा था वो कल्याणी के गांधी अस्पताल में। अंकल सीरियस थे। अंकल के साथ कभी उसकी बातचीत नहीं हुई थी। वो जब कभी अहोना के घर गया, अंकल को बाहर के चबूतरे पर बैठे हुए पाया था। अगर कभी कभार ड्राइंग रूम में होते भी थे तो तब हट जाते थे, जब भी अहोना का कोई दोस्त या सहेली आते थे। उनका फलसफा साफ था कि बच्चों के मामले में कोई दखलंदाजी नहीं।

जिस आदमी के साथ कभी कोई बातचीत ही नहीं हुई हो, उसके लिए वो भागा-भागा सिर्फ इसलिए गया था क्योंकि वो अहोना के पिता भी थे।

कॉलेज कब के खत्म हो गए थे। अनमित्र को केंद्रीय विद्यालय में नौकरी मिल गई थी। अहोना को नौकरी वगैरह में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हां, घर पर ट्यूशन खूब पढ़ाती थी। कोर्स की कुछ किताबें भी लिख रही थीं। कॉलेज खत्म होने के बाद अहोना से मिलना जुलना कम हो गया था। कभी कभार उसके घर चला जाता। अहोना और उसकी दीदी से खूब गप्पें होतीं। चाय का दौर चलता लेकिन ये सब कुछ अहोना की बौदी (भाभी) को बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती थी। अहोना ने भी उसे ये बात बताई थी। ऐसे फिकरे कस कर चली जाती थी कि फिर वहां बैठना भारी लगता। इसलिए अहोना को देखने, उससे मिलने की इच्छा होने के बावजूद उसका अहोना के घर आना जाना धीरे-धीरे कम होता गया। शायद अब तीन चार महीने बाद कभी किसी बहाने बारी आ जाती। इसके लिए भी अनमित्र को भी कोई ना कोई बहाना ढूंढना पड़ता। आज की तरह तब मोबाइल फोन तो था नहीं कि उठाते और बात कर लेते।

उसकी बड़ी इच्छा होती कि अहोना को कहीं बाहर बुलाए। उसके साथ घंटों बातें करे, वक्त गुजारे लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाया। उसे पता था कि अहोना नहीं आएगी, इसलिए उसने कभी उसे बुलाने की कोशिश नहीं की। हालांकि उसने कभी ये जानने की भी कोशिश नहीं की कि उसके बुलाने पर अहोना आती या नहीं।

और इसी बीच अंकल के बीमार होने की खबर पहुंची थी। भागा-भागा गया था। शायद अहोना से मिलने की उम्मीद भी थी। अहोना अस्पताल में ही मिली थी। बौदी, मां, दीदी के बीच रूआंसा होकर बैठी हुई थी। उसे देख दादा को कुछ भरोसा हुआ था। दादा से उसके संबंध ठीक ठाक थे। छात्र जीवन में भी अक्सर बातचीत होती थी। खासकर पढ़ाई को लेकर। दादा ने बताया था सीरियस हैं। आईसीयू में हैं। अनमित्र का चेहरा भी उतर गया।

उसने देखा दूर बेंच पर बैठी हुई थी अहोना। एकदम उदास। जैसे उसके लिए दुनिया में कोई सुख बचा ही नहीं हो। सबकुछ मानो खत्म हो गया हो। सूजी आंखें इस बात की चुगली कर रही थी कि खूब रोई थी अहोना। पिता की चहेती थी। तीन भाई बहनों में सबसे छोटी। दादा और मानसी दीदी से काफी छोटी थी अहोना और इसलिए पिता का भरपूर प्यार उसे मिला। पिता के बिना उसका भी एक काम नहीं चलता था। सच कहा जाय तो मां से ज्यादा करीब वो पिता के थी। और वही पिता आज आईसीयू में मौत से लड़ रहे थे। अहोना के पास जाने की हिम्मत नहीं हुई उसको। वो भी दूर दादा के पास ही बैठा रहा।

अंकल चले गए। अहोना को रोता-बिलखता छोड़। अहोना तब तक रोती रही, जब तक उसके आंसू सूख नहीं गए। कलेजा पत्थर का नहीं हो गया। और जब अंकल की आखिरी यात्रा शुरू हुई तो सारा  लोकलाज भूलकर अहोना अनमित्र से चिपक कर दहाड़े मार पड़ीं। मानो कह रही हो कि बाबा तो चले गए तुम साथ छोड़ कर ना जाना। अनमित्र भी रो पड़ा। अहोना का दर्द उसकी रगों में दौड़ने लगा था।
और मानो तब से ही वो इस इस दर्द को जी रहा है। अहोना से बिछड़ने का दर्द।

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अनमित्र ने सिर झटक दिया। एक मीठी सी महिला आवाज़ में हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला में बारी बारी से उद्घोषणा हो रही थी कि बनगांव जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 5 से रवाना होने वाली है। अनमित्र ने सिर को झटक दिया।
पता नहीं डानकुनी वाली लोकल किस प्लेटफॉर्म पर आएगी?’ अहोना को घर जाने की जल्दी हो रही थी।
चली भी जाना। इतनी जल्दी क्या है?’ अनमित्र ने टोका था।
नहीं, बच्चे चिंता कर रहे होंगे?’ कभी मां-बाप-भाई के डर से घर जल्दी जाना चाहती थी, आज बच्चों की चिंता सता रही है। उसके लिए तो अहोना के पास कभी समय ही नहीं था। बेवजह वो जिंदगी पर कलपता रहा। कोफ्त हुई अनमित्र को लेकिन फिर उसे लगा कि अहोना सही है, वही गलत है। उसकी चिंता करने वाले लोग हैं तो चिंता तो करेंगे ही। सब उसकी तरह तो नहीं कि कोई ... किरण की बहुत ही धुंधली से तस्वीर उसके जेहन में आई और मानो उसे मुंह चिढ़ाती हुई विलीन हो गई। उसने सिर झटक दिया।
बच्चे क्या कर रहे हैं?—इस सवाल के जरिए शायद अनमित्र ये भी जानना चाहता था कि कितने बच्चे हैं उसके।
बेटी की शादी हो गई है। बैंगलोर में पति के साथ रहती है। यहां बेटा और बहू हैं।
बहुत अच्छा। भरा पूरा परिवार है। दादी भी बन गई होगी?’
दादी नहीं, नानी जरूर बन गई हूं। दो साल का नाती है। दादी कब बनूंगी पता नहीं। बेटा-बहू दोनों नौकरी करते हैं। अभी बच्चा नहीं चाहते। नए जमाने के बच्चे हैं, अपने हिसाब से प्लान करेंगे। गहरी सांस लेते हुए अहोना ने कहा।
देख कर लगता नहीं नानी बन गई हो। अनमित्र ने कहा। कहीं न कहीं उसके मन में कसक की एक गहरी लहर एक ओर से दूसरी ओर दौड़ गई। अच्छी ही जिंदगी कटी भास्कर बाबू के साथ। भरा पूरा परिवार। नाती-बेटा बहू। 

छी छी छी, वो अपनी अहोना से जल रहा है। कितना स्वार्थी हो गया है। भला वो ऐसा कैसे सोच सकता है। लेकिन सच भी तो यही है। उसके पास क्या है आज? कुछ भी तो नहीं। शायद अहोना ने उसे कभी प्रेम ही नहीं किया। अच्छी दोस्ती थी, जिसे वो प्यार समझकर जीता रहा लेकिन फिर वो 15 दिन? वो सच था या धोखा था। अहोना के पिता के निधन के बाद के वो 15 दिन, जब अहोना उसके दिल के बिल्कुल करीब आ गई थी। उसकी भाभी, दीदी सबने अलग-अलग तरह से इस बात की इशारा किया था। उसके पास तो बस वो ही 15 दिन बचे हैं। उन्हीं 15 दिनों की यादें।

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अहोना के पिता के गुजरे आज पांच दिन हो गए थे। घर के सभी लोग सदमे से उबरकर जिदंगी की पटरी पर लौट रहे थे। तरह-तरह के कर्मकांड चल रहे थे। घर में रिश्तेदारों की भीड़ थे और सब अनमित्र को जान गए थे। मानो घर का अहम सदस्य बन गया था अनमित्र।

कोई भी काम हो, हर ओर से एक ही आवाज आती थीअनमित्र, अनमित्र, अनमित्र।

हैरानी तो इस बात की थी कि बात-बात पर ताना मारने वाली बौदी ने भी अब अनमित्र को अपना लिया था। वो अनमित्र से बहुत प्रभावित थी।

और अहोना। उसे तो मानो सबकुछ मिल गया था। कम से कम उसके बर्ताब से अनमित्र ने यही समझा था। अनमित्र को ऐसा लगा था मानो अगर वो नहीं होता इतनी जल्दी नहीं संभल पाती अहोना।

खुद बौदी ने ही कहा था, अन्नू, तुमने संभाल लिया अहोना को। अगर तुम नहीं होते तो पता नहीं अहोना का क्या होता? बाबा की लाडली थी।

अहोना सिर झुकाए बैठी रही। दोपहर के खाने के बाद रोज ऐसी ही बैठकें होती थी। सब एक साथ बैठकर गप्पें मारतें। दुख कम होता। पिताजी के जाने का गम भूल जाते। एक कोने में मां भी गुमसुम बैठी रहती। कभी कभी वो भी कुछ बोल देतीं।

मानसी दीदी ने भी बौदी का समर्थन किया।
सिर्फ मेरी ही बात क्यों करते हो, अनमित्र ने तो पूरे घर को संभाल लिया। अगर वो नहीं होता तो...
सच कहामां ने कहा, बेटा, तुम्हारी लंबी उम्र हो।
अहोना से भी अक्सर अकेले में बात हो जाया करती। अहोना खास तौर पर उसका ख्याल रखती। खाना खाया कि नही, नाश्ता किया कि नहीं, चाय पी की नहीं। रात होते ही अहोना को ही उसकी सबसे ज्यादा चिंता होती। जल्दी निकल जाओ। देर हो रही है। देर हो रही है तो यहीं रुक जाओ। अनमित्र को बहुत अच्छा लगता था। अहोना उसके बारे में इतना सोचती है।
श्राद्ध से पहले दिन वाली रात को वो अहोना के यहां ही रूक गया था। दादा ने खास तौर पर कहा था। सारी जिम्मेदारी अनमित्र पर ही थी। टेंट वाले से लेकर हलवाई तक उसी ने ठीक किया था। आज सब्जी बाजार करते करते भी देर हो गई थी। दादा ने कहा था, अनमित्र यहीं रूक जाओगे तो अच्छा रहेगा। कल सुबह ही हलवाई-टेंट वाले सभी पहुंच जाएंगे।
ठीक है दादा अनमित्र ही जवाब दिया था।
उस रात अहोना के साथ देर तक बातें हुई थीं।
अहोना ने पिताजी, दादा, बौदी, मानसी दी, जामाई बाबू सबके बारे में बातें की थीं। पापा की बातें करते करते कई बार अहोना की आंखें भर आई थीं। अनमित्र ने अपनी अंगुलियों से उसकी आंखें पोंछ दी थी। प्रतिरोध नहीं किया था अहोना ने। अहोना को अपने दिल के इतने करीब पहली बार पाया था उसने। आसमान में उगे हजारों टिमटिमाते  तारे इसके गवाह थे।

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श्राद्ध के दिन अनमित्र सुबह से ही काम में ऐसा फंसा कि उसे खाने तक की फुरसत नहीं मिली। दोपहर को पांडाल में ही घर के सभी लोगों ने खाना खाया। अनमित्र भी परिवेशन (खाना परोसने) में जुटा हुआ था। उसके बाद अहोना ने जबरन उसे खाना खिलाने बिठा दिया था, जामाई बाबू के साथ। जामाई बाबू भी सुबह से काम में लगे हुए थे। अहोना और मानसी दी ने खुद खाना परोसा था। अहोना ने पूरी कोशिश की थी कि अनमित्र को ठूस ठूस कर खाना खिला दिया जाय। पता नहीं रात को कब खाने का वक्त मिले।
अहोना का पूरा परिवार मान गया था कि दोस्त हो तो अनमित्र जैसा।
बौदी ने कहा था, अनमित्र, तुमने जो किया, कोई अपना भी नहीं करता। बीच-बीच में आते रहना।
उस दिन देर रात जब वो अहोना  के  घर से निकला था तो सिर्फ थका ही नहीं था, बुझा हुआ भी था। अहोना की पारिवारिक त्रासदी से उसके स्वार्थ की भी सिद्धि हुई थी। ज्यादा के ज्यादा वक्त अहोना के करीब रहने के स्वार्थ की। नहीं, नहीं ये स्वार्थ नहीं, उसका प्यार है। उसने जो भी किया निस्वार्थ भाव से किया। अहोना के लिए किया, दादा के लिए किया, आंटी के लिए किया।
अहोना दरवाजे तक छोड़ने आई थी, परसों सुबह ही आ जाना। मत्स्यमुखी का आयोजन है।

उसने सिर हिलाकर सहमति दी। मत्स्यमुखी श्राद्ध के बाद होने वाली रस्म। उस दिन मछली बनती है और फिर उस दिन से लोग मछली खाना शुरू कर देते हैं। वो आएगा, जरूर आएगा।

कल पढ़ें कहानी का आखिरी भाग

Wednesday, January 1, 2014

मेरी कहानी कसक की तीसरी किस्त

कसक---भाग 3

उसे याद है उस दिन वो देर रात घर लौटा था। खाना भी नहीं खाया था। बस अहोना का रुआंसा चेहरा, उसकी लिपस्टिक, लंबी-लंबी बालियां उसकी आंखों के आगे घूमता रहा और कान पर श्रावणी के बुद्धू शब्द हथौड़े बन कर पड़ते रहे। अहोना की जिंदगी में उसकी बातों की इतनी अहमियत? इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था। तो क्या....???? कल अहोना से बात करेगा वो।

दूसरे दिन कॉलेज में अहोना बिल्कुल शांत और सामान्य दिखी। लगा ही नहीं कि कल कुछ हुआ था। लगा ही नहीं कि कल उसके मजाक की वजह से वो प्रोग्राम छोड़ कर चली गई थी। सब कुछ सामान्य। पूरे ग्रुप के साथ वही हंसी मजाक। क्लास । कैंटीन में एक दूसर का लंच छीन-झपटकर खाना। उसके साथ भी कोई नाराजगी नहीं। और ये सामान्य बर्ताव उसे खटक रहा था। वो अहोना से अकेले में बात करना चाहता था लेकिन मौका नहीं मिल पा रहा था।
जब लंच हो गया और सब कैंटीन से जाने लगे तो उसने आखिरकार कह ही दिया—अहोना, तुम रूकना, मुझे तुमसे कुछ बातें करनी है।

हां, कहो

अभी नहीं, अकेले में बात करनी है
ओय होय—अकेले में क्या बात करनी है?’ सोमा ने चुटकी ली।
हम दोस्तों के बीच ये अकेले-अकेले की बात कहां से आ गई?’ गरिमा को मानो गुस्सा आ गया इससे पहले तो अकेले-अकेले में हमने कभी कोई बात नहीं की
अभी रूक भी नहीं सकते। क्लास का टाइम भी हो रहा है झेंपती अहोना ने टालने के अंदाज में कहा।
है कुछ जरूरी बात। तुम लोग दिल पर मत लो अनमित्र ने दोस्तों को समझाने की कोशिश की, जी डी सर की क्लास की चिंता तुम्हें कब से होने लगी। समझ में आता भी है कुछ
रूक जा ना। सुन भी ले क्या बात है। क्लास में जो पढ़ाई होगी, तुम्हें हम बता देंगे अब तक चुप रही श्रावणी ने कहा था। फिर सब चले गए थे। श्रावणी की संजीदगी अनमित्र को हमेशा अच्छी लगी थी। वो चीजों को इतने अच्छे से हैंडल करती थी कि बस पूछो मत। शायद श्रावणी ने उन दोनों के बीच बढ़ रही करीबी को समझ लिया था।
दोनों अकेले रहे गए। पहली बार दोनों के बीच ये अकेलापन भारी पड़ रहा था।
कहो क्या कहना है
तुम कल प्रोग्राम देखे बिना क्यों चली गई थी?’ अनमित्र ने सीधे सवाल पूछा था।
यूं ही तबीयत ठीक नहीं लग रही थी, इसलिए चली गई थी। अहोना ने मानो कुछ छिपाने की कोशिश की।
तो मुझे बताया होता। रोज मैं तुम्हारे साथ जाता हूं तो कल जब तबीयत खराब थी तो अकेले क्यों चली गई?’
मेरी वजह से तुम प्रोग्राम देखे बिना क्यों जाते। वैसे भी तुम मेरे बॉडीगार्ड थोड़े ही हो?’ कटाक्ष करने में वो उस्ताद थी।
नहीं तुम्हारी तबीयत खराब नहीं थी। मेरा मजाक तुम्हें खराब लग गया था और इसलिए तुम चली गई थी
नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. वैसे मैंने फैसला किया है कि आज के बाद से मैं ना तो लिपस्टिक लगाउंगी, ना ही लंबी बाली पहनूंगी
ये कोई बात नहीं हुई अनमित्र ने समझाने की कोशिश की थी, लिपस्टिक और बाली तुम पर बहुत फब रहे थे, मैंने यूं ही मजाक किया था। मैं सॉरी बोलता हूं।
अब चलें?’ उसने सीधे टॉपिक बदल दिया था।  बात खत्म हो गई थी लेकिन बात क्या सचमुच खत्म हो गई थी। अनमित्र के बुद्धू दिमाग ने जितना समझा था, उसके मुताबिक तो बात उसी दिन शुरू हुई थी। हालांकि बहुत कुछ सोच कर गया था वो लेकिन कह कुछ नहीं पाया था। अहोना ने भी बोलने का मौका कहां दिया!

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आज कह रही है कि तुम नहीं समझ पाओगे। उस दिन खुद कुछ समझने को तैयार नहीं थी लेकिन उस दिन भी वही बुद्धू था और आज भी वही बुद्धू।
देखो उलजलूल की बातें कर रहे हैं, असली सवाल तो पूछा ही नहीं। कैसी हो तुम?’ अनमित्र ने टॉपिक बदलने की कोशिश की।
तुम्हें कैसी लग रही हूं?’ फिर वही कटाक्ष। शायद सवाल के जरिए ये बताने की कोशिश कि तुम्हारे बिना भी अच्छी हूं और बहुत अच्छी हूं।
चुप रहा अनमित्र। प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के आते ही स्टेशन का अचानक उठता शोर बीच बीच में उन दोनों के बीच  दीवार बन कर खड़ा हो जाता। लाउडस्पीकर पर लगातार ट्रेनों की आवाजाही के बारे में उद्घोषणा भी जारी थी।
झालमुड़ी खाओगी?’ अनमित्र ने पूछा,इंडियन रेलवे झालमुड़ी—आईआरजे—तुम्हें बहुत पसंद है ना?’
पसंद, हां लेकिन बरसों हो गया नहीं खाया। ट्रेन से अब कहां आना जाना होता है।
लगता है कार वाली बन गई हो।अनमित्र की बात पर अहोना के होंठों पर हंसी तैर गई।
उसने दो झालमुड़ी का ऑर्डर दे दिया। एक में मिर्च ज्यादा। अहोना के लिए। झालमुड़ी के बहाने एक बार फिर उन दोनों का कॉलेज लाइफ उनके बीच लौट आया।
याद है, इस आईआरजे को लेकर कितना ऊधम मचता था। पैसे नहीं होते तो एक झालमुड़ी और पांच लोग इस बार अहोना ने कहा था।
अनमित्र को अच्छा लगा। चलो अहोना को कुछ बातें तो याद है।
हां याद है। तब झालमुड़ी का हिस्सा नहीं मिलने या कम मिलने पर भी इतनी तसल्ली-इतना आनन्द मिलता था, जो आज पूरा का पूरा पॉकेट झालमुड़ी मिलने पर भी नहीं मिलेता
इसका नाम इंडियन रेलवे झालमुड़ी किसने रखा था?’ अहोना शायद भूल गई थी।
लंबू ने। सोमा ने। कहां है वो,कोई खबर है उसकी?’
नहीं, सुना था बैंगलोर चली गई थी। उसका पति वहीं काम करता था। उसके बाद किसी से संपर्क नहीं हुआ। तुम भी तो अचानक ही मिल गए आज। कभी पता करने की कोशिश ही नहीं की कि कहां हूं किस हाल में हूं—अहोना की बातों में ताना था तो शायद उस उम्मीद के टूटने का दर्द भी था, जो उसने अनमित्र से लगा रखी थी कि कम से कम वो उसका हालचाल तो लेता।
भूला नहीं कभी किसी को लेकिन हालचाल भी पता नहीं कर पाया। शादी के बाद लड़कियों का हालचाल जानने की कोशिश करना शायद ठीक नहीं था। तुम्हारे पति संदेह कर बैठते तो?’ अनमित्र ने मजाक के लहजे में ही अपने मन का डर बता दिया था.
मेरे पति वैसे इंसान नहीं थे
नहीं थे...मतलब अनमित्र ने हैरानी से अहोना की ओर देखा। अब उसने ध्यान से देखा—उसने सिंदूर नहीं पहना हुआ था।
हां, भास्कर को गए पांच साल हो गए
ओहअनमित्र के चेहरे पर दर्द उमड़ आया,पांच साल! तुम्हारी तकलीफ के वक्त भी मैं तुम्हारे पास नहीं था
हां, बच्चे तो थे लेकिन तुम्हारी कमी खली थी मुझे अहोना ने कहा
अहोना के मुंह से ये बात सुनकर अनमित्र मानो दर्द का पहाड़ बन गया। पहली बार अहोना ने माना तो सही कि उसकी कमी उसे खली थी। जिंदगी की पथरीली-उबड़खाबड़ रास्तों पर अहोना को उसकी जरूरत थी लेकिन वो साथ नहीं था। वो अपने सबसे अच्छे दोस्त का दर्द का साथी नहीं बन पाया।
दोस्त क्या केवल दोस्त कहना सही रहेगा। हां, अनमित्र ने खुद को ही जवाब दिया था—दोस्त से ज्यादा खूबसूरत शब्द शायद दूसरा कोई नहीं।

पिता जी की मौत के बाद सबसे ज्यादा भास्कर का जाना मुझे तोड़ गया अहोना ने उसे सोच की दुनिया से बाहर खींचा था, लेकिन तब तुम मेरे साथ थे, हर पल लेकिन जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा  जरूरत थी, तुम मेरे  पास नहीं थे।

जारी...

Tuesday, December 31, 2013

कसक--भाग 2

'कसक' का भाग 2--अब तक आपने पढ़ा कि अचानक सियालदह रेलवे स्टेशन पर अनमित्र और अहोना की मुलाकात वर्षों बाद होती है। अब आगे...


बंगभूमि। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की जम्म और कर्मभूमि नैहाटी। उन्हीं के नाम पर था कॉलेज। ऋषि बंकिम चंद्र कॉलेज।

इसी कॉलेज में पढ़ते थे दोनों। साथ आना, साथ जाना। हालांकि दोनों एक जगह नहीं रहते थे। अनमित्र कांचरापाड़ा में रहता था, जबकि अहोना श्यामनगर में। कांचरापाड़ा से ट्रेन चलती तो पहले आता हालीशहर स्टेशन, फिर नैहाटी जंक्शन। कॉलेज जाने के लिए यहीं उतरना पड़ता लेकिन अनमित्र कभी कांचरापाड़ा से आते वक्त नैहाटी नहीं उतरता बल्कि दो स्टेशन आगे श्यामनगर चला जाता था। और फिर प्लेटफॉर्म नंबर एक पर अहोना का इंतजार करता। जब अहोना आ जाती तो फिर दोनों साथ नैहाटी आते और साथ कॉलेज जाते। वापसी के वक्त भी अनमित्र कभी भी नैहाटी से सीधे कांचरापाड़ा के लिए ट्रेन नहीं पकड़ता था बल्कि उल्टी तरफ श्यामनगर जाता। अहोना को छोड़ने के बाद कांचरापाड़ा के लिए ट्रेन पकड़ता। अहोना अगर नहीं  रोकती तो शायद वो उसे घर तक छोड़ आता। अहोना ने कई बार समझाया लेकिन वो ये बहाना करता कि श्यामनगर से ट्रेन पकड़ने पर नैहाटी आते-आते उसे बैठने के लिए जगह मिल जाती है। अहोना उसके झूठ को जानती थी लेकिन चुप ही रहती थी। दस मिनट के सफर के लिए अनमित्र को बैठने की कितनी जरूरत पड़ती होगी, उसे पता था।

उस दिन कॉलेज का एनुअल फंक्शन था। ड्रेस और मेकअप के मामले में अहोना बहुत सेंसिटिव थी। फंक्शन के दिन वो खूब सज संवरकर आई थी। रोज सलवार-कुर्ते में आने वाली अहोना साड़ी में आई थी। अहोना ने लाल साड़ी के साथ चटक रंग का लाल लिपस्टिक होठों पर लगाया था। कान में लंबी-लंबी बालियां। सच कहूं तो गजब की सुंदर लग रही थी।
लेकिन उस दिन श्यामनगर स्टेशन पर मुलाकात होते ही अनमित्र ने चिढ़ा दिया था, अरे किसका खून पीकर आ रही हो। मुंह तो धो लो?’

अहोना ने जलती हुई नजरों से उसकी ओर देखा था लेकिन अनमित्र चुप नहीं हुआ—और ये कानों में क्या पहन रखा है?  पकड़ कर लटक जाने को जी चाहता है।

अहोना का चेहरा फक्क पड़ गया। हंसती-चहकती अहोना का चेहरा उतर गया। बात चुभ गई। तारीफ नहीं कर सकता था चुप ही रहता। उसका चेहरा रुआंसा हो गया था मानो चांदनी रात में अचानक आसमान पर काले बादल छा गए हो लेकिन उसने बादल को बरसने नहीं दिया। किसी तरह खुद को संभाल लिया। उसके बाद उसने चुप्पी की चादर ओढ़ ली। अनमित्र ने खूब कोशिश की लेकिन उसने किसी बात का जवाब नहीं दिया। ट्रेन पर भी छिटक कर थोड़ी दूर जाकर खड़ी हो गई।

नैहाटी उतरने के बाद वो अनमित्र को पीछे छोड़ते हुए तेज़ कदम से आगे बढ़ गई। अनमित्र का मन अपराध बोध से भर गया। अनमित्र  समझ गया था कि उसका मजाक अहोना को अच्छा नहीं लगा था।

थोड़ा आगे बढते ही अहोना को सोमा (जिसे हम सब प्यार से लंबू कहते थे), गरिमा, श्रावणी तीनों मिल गई थी। सभी साड़ी में आई थीं। यानि चारों सहेलियों ने पहले से ही प्लान कर रखा था कि साडी पहन कर आना है। सोमा, गरिमा और श्रावणी अनमित्र के लिए रूकना चाहती थीं लेकिन अहोना के पैर का मानो ब्रेक ही फेल हो गया था। अहोना नही रूकी तो बाकी सहेलियां भी साथ चली गईं। पीछे अकेला रह गया था अनमित्र।

एनुअल फंक्शन शुरू हो गया। खूब मस्ती हो रही थी। गाना बजाना डांस। पूरा कैंपस मानो मस्ती में डूब गया था। लेकिन पूरे प्रोग्राम के दौरान अहोना कहीं नहीं दिखी। सोमा से पूछा, गरिमा-श्रावणी से पूछा लेकिन किसी को कुछ नहीं पता था।
अरे, तुम सब तो उसके साथ ही गई थी तो तुमलोगों को पता तो होना चाहिए था। कैसी दोस्त हो तुमलोग?’—चिल्ला पड़ा था अनमित्र.

अब लंबू की बारी थी। जवाब उसने दिया—तुम कैसे दोस्त हो? इतने शौक से सज-संवर कर आई थी और तुमने आते ही उसका मूड खराब कर दिया। पक्के तौर पर वो घर लौट गई होगी।
अनमित्र का चेहरा फक पड़ गया। वो समझ गया था कि उसका मजाक अहोना को अच्छा नहीं लगा था या सीधे कहें तो बहुत बुरा लगा था लेकिन उसने इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि वो घर लौट जाएगी। जिस एनुअल फंक्शन को लेकर वो पिछले दो हफ्ते से उत्साहित थी, अपने पसंदीदा गायक के प्रोग्राम को लेकर रोमांचित थी, उसी प्रोग्राम को छोड़ कर चली गई। यानि कितनी तकलीफ हुई होगी उसे।
मेरी बात का बुरा लगा, इसलिए प्रोग्राम छोड़ कर चली गई। अरे मुंह फुला लेती, चार दिन बात नहीं करती। ऐसा तो पहले बहुत बार हो चुका है लेकिन ऐसा....

चुप रहा गया अनमित्र। समझ नहीं पाया।
तुम्हारी बात उसे बुरी लगी। इतनी बुरी कि वो प्रोग्राम छोड़ कर चली गई। इसका कुछ मतलब समझते हो। जिंदगी भर बुद्धू ही रहोगे श्रावणी ने कहा था।

अनमित्र नैहाटी रेलवे स्टेशन चला गया। प्लेटफॉर्म नंबर एक पर उसी सीट पर घंटों बैठा रहा, जहां अहोना और ग्रुप  के बाकी दोस्तों के साथ बैठकर ट्रेन का इंतजार करता था। आज वो अकेला बैठा था। कोई दोस्त नहीं थी। अहोना भी नहीं थी। पूरा एनुअल फंक्शन बर्बाद हो गया था। उसकी वजह से। उसके एक फालतू और गंदे मजाक की वजह से लेकिन उसने इतना गंभीर क्या कह दिया था। इस तरह के हंसी मजाक तो ग्रुप में चलता ही रहता था।
जिंदगी भर बुद्धू ही रहोगे?’ श्रावणी की बात उसकी कानों में गूंजने लगी।
बुद्धूबुद्धू!!  बुद्धू!!!  बुद्धू!!!!

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बुद्धू—अनमित्र के मुंह से निकल गया।
क्या कहा?’ अहोना ने पूछा।
नहीं कुछ नहीं
लगता है बुढ़ापा कुछ ज्यादा ही हावी हो गया है। बुदबुदाने की बीमारी लग गई है
नही, बूढ़ा नही कह सकती तुम मुझे। देखो मेरे एक भी बाल सफेद नहीं हुए हैं—अनमित्र ने मुस्कुराते हुए कहा था।
जब एक भी बाल सिर पर है ही नहीं तो फिर क्या काला, क्या सफेद
ठठाकर हंस पड़ा था अनमित्र। फिर  एक लंबी सांस लेते हुए कहा—हां बूढ़ा तो हो गया हूं। चेहरे पर हल्की-हल्की झुर्रियां पड़ गई हैं। पूरी तरह टकला हो गया हूं। आंख पर पॉवरफुल चश्मा चढ़ गया है। फ्रेम भी कितना गंदा सा है। बहुत भद्दा लग रहा हूं ना?
सुंदर कब थे तुमअहोना ने तिरछी नजर से देखा था उसे, बस दूसरे सुंदर लगते थे तो उनका मजाक जरूर उड़ाते थे तुम
फिर हंसा था अनमित्र—लिपस्टिक वाली बात का बदला ले रही हो ना?
नहीं, मैं लिपस्टिक लगाती ही नही। सिर्फ शादी और बहू भात के दिन लगाना पड़ा था वो भी इसलिए क्योंकि सजाने के लिए ब्यूटी पॉर्लर से ब्यूटिशियन आई थी।
अनमित्र ने एक गहरी सांस ली थी।
लेकिन क्यों अहोना? मेरा एक गंदा सा मजाक और उस पर तुम्हारी ये भीष्म प्रतिज्ञा । आखिर तुम जिंदगी भर अपने आपको ये सजा क्यों देती रही?’
ये बात तुम नहीं समझ पाओगे
हां, बुद्धू हूं मैं अनमित्र की आंखों के आगे श्रावणी का चेहरा आ गया, जो चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी—
बुद्धूबुद्धू!!  बुद्धू!!!  बुद्धू!!!!

क्या वो सचमुच बुद्धू ही है। उसने अहोना की आंखों में झांक कर देखने की कोशिश की कहीं वो भी उसे बुद्धू तो नहीं समझती लेकिन चश्मे ने साथ नहीं दिया। नजदीक का पॉवर अभी तक वो ग्लास में लगा ही नहीं पाया है। इसलिए पास होकर भी वो आंखें उससे दूर थीं। बहुत दूर। कुछ नहीं देख पाया। उसने चश्मा उतार लिया। रूमाल से पोंछने की कोशिश की तो अहोना ने उसके हाथ से चश्मा ले लिया। अपनी सफेद साड़ी से वो चश्मे को साफ करने लगी। कॉलेज के जमाने में भी उसका चश्मा अहोना ही अपने रूमाल से साफ कर दिया करती थी। हालांकि तब माइनस पॉवर था और वो भी बहुत कम। अब तो माइनस-प्लस दोनों पॉवर है। प्लस पॉवर बदल गय़ा है लेकिन अभी तक ग्लास बदलवा नहीं पाया है।

जारी...