Tuesday, November 30, 2010

पासवर्ड के बिना जिंदगी

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

हवा का एक ऐसा झोंका जो पूरे शरीर में सिहरन पैदा कर देता है। लेकिन ये सिहरन मन को नहीं छू पाई। ठंडी हवा का झोंका शरीर को छूकर निकल गई। मन तक वो पहुंच ही नहीं पाई। शायद इसमें हवा का दोष नहीं। मन ने ही सारे दरवाजे बंद कर दिये हैं। उन दरवाजों को खोलने का पासवर्ड हवा के पास नहीं है।

एक ऐसी दुनिया में हम जी रहे हैं, जहां हर चीज के लिए पासवर्ड चाहिए। जिसके पास पासवर्ड नहीं, वो इस दुनिया में मिसफिट है। शायद वो भी मिसफिट है। उसके पास उसका अपना पासवर्ड भी नहीं है। वो ऊपर से जैसा है, अन्दर से भी वैसा ही है। सब कुछ पारदर्शी. पासवर्ड की कोई जरूरत नहीं लेकिन वक्त के साथ उसे बदलना पड़ा। उसके मन तक पहुंचने के लिए अब एक पासवर्ड चाहिए था। पासवर्ड वो भी नहीं जानता। पासवर्ड है। जब मन लॉक है तो पासवर्ड जरूर है, होना भी चाहिए लेकिन जिसके पास ये पासवर्ड है, वो न जाने कहां है। पासवर्ड सेट किया और गायब। उसने खोजने की कोशिश भी तो नहीं की। तब से लॉक है मन का दरवाजा।

उसे पासवर्ड की ये दुनिया अच्छी नहीं लगती। बचपन में लौट जाना चाहता है। जहां सिर्फ और सिर्फ बचपना था। सब कुछ सीधा सरल। कोई सीक्रेट नहीं, इसलिए कोई पासवर्ड नहीं। पासवर्ड तो तब चाहिए होता है, जब कुछ छिपाना होता है लेकिन बचपन में छिपाने लायक क्या था। शायद बचपन अब इसलिए भी ज्यादा अहम हो गया था, उसके लिए क्योंकि बचपन में उसके पास कोई सीक्रेट नहीं था। ऐसा कुछ नहीं था, जिसे किसी को बताने में शर्म महसूस हो। इसलिए सबकुछ खुला हुआ था। उन्मुक्त था। उन्मुक्त था, इसलिए उसमें ताज़गी थी। कही कुछ सड़ा हुआ नहीं था। जिंदगी का कोई भी पहलू किसी बटर की तरह बदबू नहीं मार रहा था। इसलिए वो लौट जाना चाहता है पीछे की ओर लेकिन उसके लिए भी अब चाहिए पासवर्ड।

कैसे जिये वो इस ज़माने में, जहां कदम-कदम पर चाहिए पासवर्ड। इसलिए वो फेल है। यहां से वहां भागता रहता है लेकिन नहीं मिलती शांति, नहीं मिलता सकून। घऱ आता है, टेलीविजन के सामने बैठता है। वहां भी हंगामा। बिग बॉस में झगड़ते लोग। सामने प्यार में जान कुर्बान करने की बात, पीछे पीठे जड़ से काटने की बात। बिग बॉस दुनिया का असली चरित्र दिखाता है। एक छोटे से घर में चंद लोगों को बंद कर दुनिया को बताया जा रहा कि देखो तुम ऐसे ही हो। गंदे, अश्लील, चरित्रहीन, चुगलखोर, दूसरों के सुख से जलने वाले, भोग विलास में मतवाले, भोजन के लिए जानवरों की तरह लड़ने वाले। दूसरे को गिराकर उसकी कीमत पर आगे निकल जाने वाले। दुनिया का असली चरित्रा।

सोचता है, हंस ले। कॉमेडी देखना चाहता है लेकिन वहां हंसाने के लिए ताजा कुछ नहीं है। सबकुछ अश्लील। दूसरों का मजाक उड़ाकर उन्हें नीचा दिखाकर दुनिया को हंसाने की कोशिश। दूसरों को नीचा दिखाने में हंसी आती है, अच्छी हंसी आती है। खबर देखना चाहता, सर्कस दिखने लगता है। भागना चाहता है, भाग जाता है वो। उसके लिविंग रूम में दम तोड़ देता है टेलीविजन। वो भी लिविंग रूम में दम तोड़ रहा है। पता नहीं आधुनिक जमाने ने लिविंग रूम नामकरण क्या सोच कर किया है। वो तो लिविंग रूम में भी खुद को लिविंग महसूस नहीं करता। उसके लिए सब रूम एक जैसा है। जहरीला, घुटन भरा।

लेकिन क्या जिंदगी इतनी बुरी, इतनी घुटन भरी, इतनी घटिया है? शायद नहीं। वो जानता है कि जिंदगी ऐसी नहीं है। फिर वो क्यों हार गया है। क्या एक पासवर्ड गुम हो जाने से जिंदगी ऐसे बदल जाती है। पासवर्ड रिसेट भी तो किया जा सकता है। वो भूल जाएगा पासवर्ड चुराकर ले जाने वाली को। जिंदगी को वो अपना नया अर्थ देगा। कुछ भी बंद नहीं रहेगा। सब कुछ खुला रहेगा, बचपन की तरह। उसकी जिंदगी में कोई पासवर्ड नहीं होगा। हर पासवर्ड का ताला वो तोड़ देगा। वो इस जमाने में भी बिना पासवर्ड के जियेगा। उसने तय कर लिया, वो अपनी जिंदगी को फॉर्मेट करेगा। उन सारे वायरस को खत्म कर देगा, जिन्होंने उसे तबाह कर रखा है।

तय हो गया और उसके साथ ही उसके मन ने महसूस की ठंडी हवा की सिहरन। अब उसे सब कुछ ताजा लग रहा था।

Wednesday, April 15, 2009

चटकल

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव
नरेश झुंझला गया। उसे लगा चटकल में बदली मजदूर का काम करना और भीख मांगना बराबर है। पिछले तीन दिनों से लेबर ऑफिस का चक्कर लगा-लगा कर वह हलकान था लेकिन बाबू थे कि काम देने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बस एक ही ज़वाब--आज लोक नहीं लागेगा।(आज आदमी की ज़रूरत नहीं है)। जी में तो आया कि बोल दे कि लोक कब लगेगा, जब हम भूख से दम तोड़ देंगे? लेकिन कुछ नहीं बोल पाया। बदली मजदूर की इतनी हैसियत कहां होती है कि बाबू के आगे मुंह खोल पाये।

वह खड़ा रहा। उम्मीद थी कि शायद कोई नागा(अनुपस्थित) हो जाय, और उसे बुलावा आ जाय।बाबू ने चश्मे के बाहर से उसकी ओर देखा--अब इहां का करता है। जाओ काल आना।नरेश ने विनती के स्वर में पूछा--कुछ देर और देख लें साहब? शायद कोई नागा हो।बाबू हंसा। पान की पिक उसके होठ के दाहिने किनारे से निकल पड़ी। उसने टेबल से एक कागज उठाया और उससे अपना मुंह पोंछ कर डस्टबिन में फेंक दिया। तभी महेशनाथ दिखे। चेलों की पूरी टोली के साथ। वे सीधे लेबर बाबू के पास पहुंचे। कांग्रेस यूनियन के नेता। इस कारखाने के मामले में सबसे बड़े और दबंग नेता।बाबू ने इस बार चश्मे के अंदर से महेशबाबू की ओर देखा--नमोस्कार महेश दा। का खबोर?.महेश बाबू ने तल्ख स्वर में कहा--क्या बात है? तुम आजकल बहुत बड़े बाबू बन गये हो। हमलोगों की बात भी नहीं सुनते। सब बाबूगिरी भूला देंगे।
बाबू की सिट्टीपिट्टी गुम। हें-हें करता हुआ बोला-इ का बोल रहा है महेश दा? आपलोगों के लिए ही तो इहां पर बैठे हैं। का बात है?
-लल्लन तीन-तीन बार आया लेकिन तुमने उसे काम नहीं दिया।
बाबू ने कहा--अइसा बात नहीं महेश दा। आपका किसी भी लोक को हम कभी मना नाहीं किया लेकिन वो दिन सचमुच लोक का ज़रूरत नेहीं था। आज ज़रूरत है तो लल्लन का पता नहीं। हम बोला था कि एक बार चक्कर ज़रूर मार जाना।
महेश बाबू का पारा गरम हो गया--कहां है ललनवां? लल्लन झट सामने आ गया।महेश बाबू चिल्लाये--का रे, बड़का लाट साहब हो गया है ? बाबू तुम्हारे घर जाकर काम देंगे क्या? बाप का नौकर समझ रखा है
सबको लल्लन को मानो सांप सूंघ गया। सीधे जाकर बाबू के टेबल के सामने खड़ा हो गया. बाबू ने उसके नाम की पर्ची काटते हुए कहा-रोज काहें नहीं आता? छोटा छोटा बात के लिए महेश दा को परेशान करता है।लल्लन चुप। बाबू पर खून खौल रहा था। अभी इसे बकवास करने की क्या ज़रूरत है? चुपचाप जल्दी से पर्ची देता क्यों नहीं? पर्ची हाथ में मिलते ही मानो लल्लन की जान में जान आई. सीधे फैक्टरी की ओर भागा। पता नहीं उसे काम मिलने की खुशी थी या महेश बाबू से दूर भागने की। महेश बाबू का गुस्सा बहुत खतरनाक होता था।
नरेश दंग रह गया। बाबू ने उसे काम देने से मना कर दिया लेकिन महेश बाबू के आते ही लल्लन को काम मिल गया। लेकिन क्या वह इस मामले में बाबू से बहस कर सकता था। नहीं...नहीं कर सकता बहस। गाहे-बगाहे बाबू काम देता भी तो था। बहस कर लिया तो वह भी बंद हो जायेगा। क्या करे वह? क्या बिना यूनियन पकड़े उसे काम नहीं मिलेगा? कैसे पकड़े किसी यूनियन का दामन। दो ही यूनियन प्रभावी थी। एक लाल, दूसरा पंजा। सीपीएम और कांग्रेस लेकिन लाल और पंजा के नाम से मशहूर। लाल झंडा वालों के पास जाये या पंजा वालों के पास। जान पहचान तो किसी से नहीं थी लेकिन उसके कुछ ऐसे साथी थे , जो यूनियन में थे। जुलूस निकलता तो कंधे पर झंडा लेकर नारे लगाते हुए चलते थे. उस वक्त उनकी छाती गर्व से फैली होती थी। नरेश का भी जी करता कि वह भी नारे लगाये, झंडे ढोये। मजदूरों के बीच रूतबा बढ़ता है लेकिन क्या कोई यूनियन उसे इस लायक समझेगी?
सुना था लाल झंडे वालों की सरकार है, इसलिए उनकी खूब चलती है लेकिन साथ ही यह भी सुना था कि इसमें बंगालियों का वर्चस्व है और वे बिहारी मजदूरों की मदद नहीं करते। मेड़ो (पश्चिम बंगाल में यही कहकर हिंदीभाषियों को चिढ़ाया जाता है) कहकर भगा देते हैं। लेकिन पता नहीं क्यों उसे इस बात पर विश्वास नहीं होता था। वह बिहार के कितने ही मजदूरों को जानता था जो लाल झंडा वाली यूनियन में जाते थे। घंटों बैठे रहते थे। बाबू लोगों के लिए दुकान से चाय लाते थे, कुल्हड़ों में सबको चाय बांटते थे, खुद भी शान से बैठकर पीते थे। और जवाहर? उसका तो रूतबा देखने लायक है। जब भी चटकल मैदान में मीटिंग होती है, रिक्शा पर माइक लेकर वही चिल्लाता है--भाइयो और बहनो, आज शाम चार बजे, चटकल मैदान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया है. इस जनसभा में मजदूरों की समस्याओं पर विचार होगा। सभा को पार्टी के लड़ाकू नेता कॉमरेड जतीन चटर्जी सम्बोधित करेंगे। घंटों वह रिक्शा में घूमता और अपनी बुलंद आवाज में मुनादी करता रहता था। उसके पीछे-पीछे कुछ मजदूर-कुछ बच्चे भागते रहते । वह भी तो मेड़ो ही है। अगर बात मेड़ो की ही होती तो उसे ये काम क्यों मिलता? सब लोग उसकी कितनी इज्जत करते हैं।
जवाहर से उसकी थोड़ी जान पहचान थी। उसने तय कर लिया वह आज ही जवाहर से मिलेगा और लाल झंडा का सदस्य बन जायेगा। सारे दुख दूर हो जायेंगे। रोज काम मिलेगा। रोज काम अर्थात हर पंद्रह दिन बाद ठीक-ठाक तंख्वाह। फिर मुन्ना को बनर्जी बाबू के घर की सूखी रोटी नहीं खानी पड़ेगी। सुरसती को मन मार कर लोगों के सामने उधार के लिए हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। मुन्ना के लिए एक पैंट और सुरसती के लिए एक साड़ी जरूर ले लेगा। चप्पल भी। सुरसती के पास चप्पल तक नहीं है। नंगे पांव दौड़ती रहती है। थोड़ी सी उम्मीद और नरेश के सपनों की फ़सल लहलहाने लगी थी उसने बाबू की ओर देखा। वह चश्मे के बाहर से नरेश की ओर ही देख रहा था। नरेश की आंखों में नफ़रत झलकी तो उसने झट अपनी आंखें फेर ली। शायद झेंप गया था।

लेबर ऑफिस से वह सीधे जवाहर के घर ही गया था लेकिन जवाहर घर पर नहीं था। पता चला दो तीन घंटे बाद आयेगा। पार्टी के काम से कहीं गया हुआ है । मन ही मन जवाहर से ईष्या हुई। कितना व्यस्त रहता है जवाहर। बाबू लोगों में कितनी इज्जत है उसकी। सब उसकी बात सुनते हैं। काम को लेकर भी कोई समस्या नहीं। जब चाहा काम कर लिया, जब चाहा पार्टी के काम से निकल पड़ा। उसने व्यर्थ ही अपना समय गंवा दिया। और पहले ही यूनियन में आ जाना चाहिए था लेकिन अब वह इस गलती को नहीं दोहरायेगा। जवाहर से मिलकर ही जायेगा।वह जवाहर के घर के बाहर ही घूमने लगा। कुछ देर बाद वहीं बगल की चाय की दुकान पर जाकर बैठ गया। घर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। ज़रूरतें मुंह बाये खड़ी थीं और आज तो घर में राशन भी नहीं थी। किस मुंह से पत्नी और बच्चों के पास जाकर अपनी हताशा की बात कहेगा? घर जाने में देर होता देख कम से कम कुछ देर तक तो वे इस उम्मीद में रहेंगे कि उसे काम मिल गया है। अभाव में ऐसी उम्मीदें भूख पर भी भारी पड़ती हैं। बहुत बल मिलता है। उसने तय किया कि वह कुछ देर तक उन्हें इस उम्मीद का आनन्द उठाने देगा।

जवाहर उसे जतीन दा से मिलाने पर राजी हो गया था। उसने उम्मीद दिलाई थी कि यूनियन का सदस्य बनने के बाद काम मिलने में कोई दिक्कत नहीं होगी। नाम नंबर भी बन जायेगा। पीएफ कटने लगा। ईएसआई कार्ड बन जायेगा। हजारों सपने। छोटा सा मन। उछलता हुआ घर लौटा था नरेश।वक्त से पहले उसे देखकर सुरसती की उम्मीदों को झटका लगा था--का हुआ जी? आज भी काम नहीं मिला?
--नहीं, काम तो नहीं मिला लेकिन अब काम मिलेगा?
--कैसे?
और नरेश ने सारा किस्सा उत्साह के साथ बांच दिया था। उम्मीद का दीया और तेज जलने लगा था। लेकिन बिना भात के दोपहर कैसे कटेगी? कम से कम बच्चों के लिए कोई व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी। हमेशा की तरह सुरसती ने ही की थी व्यवस्था। पड़ोस से चावल उधार मांग कर लाई थी। जल्द ही वापस लौटाने के करार पर। दोपहर ठीक-ठाक गुजर गई। अब सारी उम्मीदें शाम पर टिकी थीं।

लाल झंडा का ऑफिस कारखाने के उत्तरी गेट के ठीक सामने था। अगल-बगल चाय की दो दुकानें। दिन भर चलने वाली दुकानें। कार्यकर्ताओं-मजदूरों-नेताओं की भीड़ लगी रहती थी। यहां एक घंटे बैठ जाओ तो कारखाने के बारे में, नेताओं के बारे में इतनी ज्यादा जानकारी मिल जाती थी कि बस पूछिए मत। कुछ जानकारी सही होती थी तो कुछ अटकलें। सिर्फ कारख़ाना ही क्यों राज्य और देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितयों का आकलन, अखबार की एक-एक ख़बर की समीक्षा। अगर पढ़ना नहीं आता है तो भी कोई बात नहीं। एक अखबार पर जब दस दस लोग हों तो उनमें से एक वाचक की भूमिका में आ जाता था। बाकी नौ गोलबंद होकर ख़बर का मजा लेते थे। टिप्पणियां करते थे। बहस होती थी। बड़े-बड़े बुध्दिजीवी इन बहसों के आगे नहीं टिक सकते थे। सही मायने में अख़बार कैसे जनमत बनाता-बिगाड़ता है, इसका जीता-जागता प्रमाण इस चाय की दुकान पर मिल जाता था। कभी-कभी बहस हंगामे और मारपीट तक में तब्दील हो जाती थी।

नरेश जवाहर के बताये समय पर चाय की दुकान पर पहुंच गया था। लाल झंडा के ऑफिस में लोगों का आना जाना शुरू हो गया था। लगभग दस पंद्रह लोग भीतर बैठे भी थे। नरेश को बाहर ही इंतजार करना था। जवाहर के आने पर उसके साथ ही अंदर जाने की बात थी। उसके अन्दर का शर्मीला आदमी अब धीरे-धीरे जगने लगा था। इतने लोगों के बीच अपनी बात जतीन दा के सामने कैसे रख पायेगा?वह चाय की दुकान पर बैठ गया। डरते-डरते। सुना था दुकान वाला चाय का ऑर्डर नहीं देने वाले को नहीं बैठने देता । आप एक चाय पी लीजिये और घंटों बैठ कर राजनीति पर भाषण झाड़ते रहिए , उसे कोई समस्या नहीं थी लेकिन बिना ऑर्डर के बैठने पर किचकिच होने की आशंका थी लेकिन नरेश ने रिस्क उठाया और एक बेंच पर बैठ गया। चाय वाले ने ध्यान नहीं दिया। दुकान पर भीड़ थी और वह काफी व्यस्त था। अखबार के भीतर का एक पन्ना बेंच पर पड़ा हुआ था। उसने उठा लिया और पढ़ने की कोशिश करने लगा लेकिन पढ़ नहीं पाया। वह अखबार पर नज़र गड़ा ही नहीं पा रहा था। उसकी नज़रें बार-बार सड़क की ओर उठ जाती थी। जवाहर अभी तक आया क्यों नहीं? तय समय के हिसाब से तो उसे अब तक आ जाना चाहिए था। अखबार पर नज़र पड़ते ही मन में आशंका घुमड़ने लगती कि कहीं उसकी नज़र चूक गई और जवाहर यूनियन में घुस गया तो? वह अखबार का पन्ना हाथ में लेकर जवाहर के लिए टकटकी लगाये रहा।

एक घंटे बीत चुके थे। चाय की दुकान पर कितने ग्राहक आये और चले गये लेकिन नरेश उसी बेंच पर बैठा जवाहर की बाट जोहता रहा। यूनियन ऑफिस में और भीड़ हो गई थी। लगभग ठसाठस भर गया था। हंसी-मजाक -शोरगुल लेकिन उसके लिए सब जैसे बाहरी दुनिया की बात थी। उसकी दुनिया तो बस जवाहर के कदमों की आहट तक सिमट गई थी। कहीं ऑफिस में आ तो नहीं गया। हो सकता है उसकी नज़रें चूक गईं हो और जवाहर ऑफिस के अन्दर चला गया हो। लेकिन उसने तो चाय की दुकान पर ही इंतजार करने को कहा था।मन नहीं माना। वह बेंच से उठकर ऑफिस के सामने गया। ऑफिस खचाखच भरा हुआ था। अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई उसकी। उसके अन्दर का मेड़ो उसे ऑफिस से दूर धकेलने लगा। अगर ऑफिस के अन्दर गया और किसी ने मेड़ो कहकर भगा दिया तो? वह खिड़की के पास तक आया। भीतर झांक कर जवाहर को ढूंढने की कोशिश की लेकिन जवाहर नहीं दिखा।

भीतर मनमोहन सरकार की कोई बात चल रही थी। सोनिया और ज्योति बसु की मुलाकात की बात चल रही थी। कोई जोर-जोर से हंस रहा था। तरह-तरह की बातों का मिश्रण और कुल मिलाकर मछली बाज़ार का माहौल । मार्क्सवाद का मछली बाज़ार या मछली बाज़ार में मार्क्सवाद--समझ में नहीं आया। हताश कदमों से फिर चाय की दुकान पर वापस लौट आया

तीन घंटे बीत गये थे। रात के नौ बज रहे थे। जवाहर नहीं आया। अब आने की संभावना भी नहीं थी। यूनियन ऑफिस लगभग खाली हो चुका था। चार पांच लोग थे और लग रहा था कि वे ही यूनियन ऑफिस बंद कर चले जायेंगे। चाय की दुकान भी खाली हो गई थी। चाय वाले की नज़र अब उस पर पड़ी।--क्या भाई? क्या बात है? शायद तुम शाम से ही यहां बैठे हो? कोई काम-धाम नहीं है क्या?

नरेश लगभग घबड़ा गया। याद आ गई चाय वाले बिना ऑर्डर के बैठने वालों को भगा देता है। उसे लगा अब बेइज्जत भी होना पड़ेगा। उसने लगभग डरते-डरते कहा--माफ करना भाई, तुम्हारी दुकान पर बहुत देर बैठ गया। एक आदमी का इंतजार कर रहा था लेकिन वह आया नहीं।
--कोई बात नहीं। यहां बैठने की मनाही नहीं है। ग्यारह बजे तक दुकान खुली रहती है तुम और दो घंटे बैठ सकते हो लेकिन बात क्या है? बहुत परेशान हो।
नरेश को राहत मिली। उसने अपना पूरा दिल उघाड़ कर रख दिया। इस ज़माने में ऐसा आदमी कहां मिलता है, जो दूसरों का दर्द सुनने के लिए वक्त निकाल सके।
--तो अभी तुम्हें दौड़ायेंगे सब। नेता लोग इतना जल्दी काम थोड़े ही करते हैं? मैं तो बरसों से यही देख रहा हूं? चाय वाले ने कहा और साथ ही पूछा---चाय पियोगे?
नरेश चुप रहा।
--पैसे की चिंता न करो। जब काम मिलेगा तो दे देना। शाम से बैठे हो। अरे छोटू, बाबू को चाय देना।
छोटू चाय दे गया।नरेश ने पूछा--दौड़ाते हैं लेकिन काम तो कर देते हैं न?नरेश दौड़ने के लिए तैयार था।
--देखो भाई, काम होता भी और नहीं भी होता है। सब इस बात पर है कि तुम्हारा सोर्स कैसा है।
सोर्स तो उसका जवाहर था। कायदे से मजबूत सोर्स था। काम हो जाना चाहिए था लेकिन वह चुप ही रहा।
--जाओ, अब कल एक बार फिर चक्कर लगाना। अब तो इतनी रात को यहां कोई आयेगा भी नहीं और अब ऑफिस तो बंद भी होगा।
कुछ देर बाद ऑफिस बंद भी हो गया. नरेश टूट गया। जब तक ऑफिस खुली थी उम्मीद की एक किरण बाकी थी कि शायद जवाहर आ जाय। भले ही जतीन दा से भेंट नहीं हो लेकिन जवाहर से भेंट होने पर भी उसे थोड़ी तसल्ली, थोड़ा दिलासा मिल जाता। वह बुरी तरह थक गया था। मानसिक रूप से भी और शारीरिक रूप से भी। किस मुंह से घर जाय। पता नहीं क्यों घर शब्द से ही अब उसे चिढ़ होने लगी थी। अभाव और घर दोनों एक साथ नहीं हो सकते। आदमी की ज़िन्दगी में इनमें से कोई एक ही होना चाहिए। घर जाते ही सुरसती का सवाल--क्या हुआ जी और जवाब सुनने के बाद उससे भी कठिन सवाल--अब क्या होगा जी?
दूसरे दिन भी वह तय समय पर यूनियन ऑफिस पहुंच गया था। चाय वाले से जान-पहचान हो गई थी। बैठते ही चाय आ गई। वह चकित रह गया। चाय वाले ने कहा--चिंता न करो। दो चाय का पैसा हो गया। काम मिलते ही दे देना।
चाय वाले ने उधारी शुरू कर दी थी। उधार लेते उसका दिल कांप उठा लेकिन निराला काका की बात याद आ गई--चटकल में काम करोगे और उधार नहीं लोगे-- यह कैसे हो सकता है। और उसके बाद खुला ठहाका। ऊपर से नीचे तक कर्ज में डूबे निराला काका कैसे ठहाके लगा लेते थे, यह बात आज तक नरेश नहीं समझ पाया। कर्जदारों के तकादे आते, गालियां सुनते लेकिन फिर अपने रंग में। जोरदार ठहाके। ठहाकों पर ठहाका। घर में चूल्हा नहीं जला तो ठहाका, पत्नी से झगड़ा हुआ तो ठहाका, मिल में किसी बाबू से झगड़ा हुआ तो ठहाका। केवल ठहाका। निराला काका को देख उसे आश्चर्य भी होता और बल भी मिलता। दुखों से दो दो हाथ करने की ताकत मिलती। ज्ञान भी अच्छा था निराला काका का। पुराने जमाने के मैट्रिक पास थे। बहुत कुछ बताते थे नरेश को। नरेश ने उनसे बहुत कुछ सीखा था, समझा था लेकिन यूनियन वाली बात उसने अभी तक निराला काका को नहीं बताया था। बताते तो फिर लगता जोरदार ठहाका और फिर ऐसी बातें कि उसका दिल बैठ जाता। उसने सिर झटक दिया।

चाय ठंडी हो रही थी। वह चाय सुड़कने लगा।यूनियन ऑफिस अभी खुला नहीं था। चार बजे के आसपास खुलता था। उस दिन जवाहर आया था। जतीन दा से मुलाकात भी हुई। जतीन दा ने ढेर सारे सवाल दागे--कब से इहां हो, अब तक यूनियन में काहे नहीं आया। फिर जवाहर से पूछा था-चंदा दे पाएगा ये? जवाहर ने नरेश से पूछा--चंदा कहां से दोगे? मेम्बर बनने के लिए चंदा देना पड़ता है।
नरेश चुप। इस बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था। जवाहर ने सुझाया-काम मिलने के बाद दे देना?कितना अच्छा सुझाव था। नरेश तत्काल राजी हो गया। जवाहर को उसने ऐसे देखा मानो वो भगवान हो। बाद में जवाहर ने बताया था कि बाद में चंदा देने पर थोड़े ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। कोई बात नहीं, थोड़ा ज्यादा पैसा दे देगा। पहले काम तो मिले। आखिरकार जवाहर की मदद से वो लाल हो गया। लाल झंडा का आदमी। अपने आप उसकी अक़ड़ थोड़ी बढ़ गई। शायद अब रोटी के लाले नहीं पड़े। सिर उठाकर घर पहुंचा था।

15 दिन बीत गए। काम मिलना बिल्कुल बंद हो गया था। पहले तो बाबू के पास चक्कर लगाने पर एकाध रोज काम मिल भी जाता था लेकिन अब तो वो भी बंद हो गया था। उसने बाबू के यहां जाना छोड़ दिया था। अब सारी उम्मीद जतीन दा से थी। जवाहर ने कहा भी था कि जतीन दा ये बिल्कुल पसंद नहीं करते कि उनकी यूनियन का कोई आदमी काम के लिए जाकर बाबू के पास गिड़गिड़ाए। तुम निश्चिंत रहो, बाबू साला बुलाकर काम देगा। नरेश को काफी अच्छा लगा था। तो अब वो बेसहारा साधारण आदमी नहीं है।लेकिन 15 दिन बीतते-बीतते उसे अपनी बेचारगी का एहसास होने लगा था। लाल का आदमी होने की हेकड़ी गुम होने लगी थी। सुबह-शाम नियम से यूनियन ऑफिस जाता। पटला दा आफिस खोलता और उसके बाद पूरे आफिस की साफ सफाई। बड़े से लेकर छुटभैये नेताओं तक की सेवा। सबको लाकर चाय पिलाना। चाय का बर्तन धोकर रखना। जतीन दा रोज आता। सफेद कुर्ता, सफेद पाजामा। बगल में खादी का बैग लटकाए। रोज पूछते कैसे हो और वो रोज बताता अच्छा है लेकिन अभी तक हिम्मत नहीं हो पाई थी कि काम के लिए सीधे जतीन दा से बोले। जवाहर से कई बार बोल चुका था लेकिन उसका जवाब भविष्य के सपने दिखाता था। वर्तमान के बारे में उसके पास कहने को कुछ भी नहीं था। क्या जतीन दा जैसे नेता को ये भी नहीं पता कि परदेस में काम के बिना किसी आदमी का क्या हाल हो सकता है? क्या उन्हें ये भी नहीं दिखता की पार्टी आफिस में एक आदमी सुबह-शाम नौकर की तरह क्यों खट रहा है?
जवाहर कहता-देखो अभी तुम्हें आए दस-पंद्रह दिन ही हुए हैं। आते ही काम के लिए कैसे कह सकते हो? यहां लोगों ने सालों संघर्ष किया है। पार्टी के लिए काम किया है। तब जाकर ये मुकाम मिला है। और तुम चाहते हो कि तुम्हें आते ही काम मिल जाय। पार्टी को इस्तेमाल की चीज मत समझो।सुरसती को वो ये बात कैसे समझाएं। अब तो बच्चों की बदहाली उससे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। अपनी भूख मार भी ले लेकिन बच्चे तो उसे ही तंग करते हैं। बच्चों की भूख की तड़प अब सुरसती के मुंह से व्यंग्य बन कर निकल रही थी। घर पहुंचते ही पूछती-क्यों नेताजी, आज भी कुछ नहीं हुआ और नरेश टूट कर रह जाता।
और आज तो हद हो गई। घर पहुंचा तो सुरसती घर पर नहीं थी। दोनों बच्चे गला फाड़-फाड़ कर रो रहे थे। पूछने पर पता चला कि सुरसती सुबह से ही गायब है। बच्चों ने सुबह से कुछ नहीं खाया था। मां के लिए तो वो रो ही रहे थे, भूख उन्हें और तड़पा रही थी।नरेश की समझ में नहीं आया कि क्या करे? पहले सुरसती को ढूंढे या बच्चों की भूख मिटाए। घर में आस-पड़ोस की औरतों की भीड़ जमी हुई थी। सब बच्चों को चुप कराने की कोशिश में जुटी थीं। ऊपर से हर तरह की बातें, तरह-तरह के कयास। नरेश के पहुंचते ही वो शुरू हो गईं।
'कहां चले जाते हैं आप लोग?'
'अरे बच्चों का तो ध्यान रखा कीजिए।'
'सुबह से इनकी मां भी गायब है।'
'अरे मां के लिए रो रो कर बुरा हाल है। बाप तो बेचारा काम के जुगाड़ में भटक रहा था।'
'अरे भूख भी लगी है इन्हें।'
'अरे कोई रोटी वगैरह लाकर दो'
और पंडिताइन रोटी लाने चली गईं। जाकर झट से चार रोटी लाईं। दोनों बच्चे खाने लगे। आंसू थम गए थे।इस मकान की यही खासियत थी। लोग एक दूसरे से झगड़ा भी करते थे लेकिन दुख के वक्त एक दूसरे के साथ खड़े भी नज़र आते थे। लेकिन जो भी हो आज उसका घर पहली बार तमाशा बन गया था। तमाशा बन गया था वो खुद, भिखारी बन गए थे उसके बच्चे और तमाशा बन गई थी सुरसती।
अब घर से भीड़ छंट गई थी। बच्चे भी चुप हो गए थे। सिर झुकाए नरेश बैठा था। कहां गई होगी सुरसती? गरीबी और अभाव से तंग आकर कहीं जान तो नहीं दे दी उसने? अक्सर वो इस तरह की बातें किया करती थीं। कहती थी-गंगा मैया ही अब सहारा है। जब बर्दाश्त नहीं होगा, जाकर उन्हीं की गोद में समा जाऊंगी। कभी कहती-रेल के आगे कूदकर जान दे दूंगी। मन बुरी तरह घबड़ा रहा था। तरह-तरह की अनिष्ट आशंकाएं मन में हावी हो रही थी। अगर ऐसा होता है तो इसका जिम्मेदार केवल और केवल वो है। वो बीवी और बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नहीं मुहैया करा सकता।किस तरह का बाप है वो? कैसा पति है वो? अगर सुरसती ने कुछ कर लिया तो वो खुद को कभी भी माफ नहीं कर सकता। वो हत्यारा है। जीते जी वो अपने बीवी और बच्चों को मार रहा है। क्या मतलब है उसकी जिंदगी का?अब वक्त बर्बाद करना ठीक नहीं था। सुरसती को खोजने जाना जरूरी था। बच्चे घर में अकेले नहीं रहना चाहते थे। छोटे-छोटे बच्चों के मासूम मन में भी शायद अनिष्ट आशंकाएं बलवती हो रही थीं। इसलिए वो पापा के साथ मां को खोजने जाने की जिद कर बैठे। नरेश उन्हें साथ लेकर निकल पड़ा।
गंगा घाट की आखिरी सीढ़ी पर सुरसती बैठी मिल गई।राहत की सांस ली थी नरेश ने। गंगा शान्त थी लेकिन सुरसती उफ़ान पर थी। नरेश के हर सवाल का जवाब चुप्पी। और फिर सवाल-'हम क्या गांव वापस नहीं लौट सकते?'
हिल उठा था नरेश। कितनी उम्मीदों से गांव से शहर आया था। अभाव और दर्द के गांव को ठेंगा दिखाते हुए। मानो ये कहते हुए-देखो, हम जा रहे हैं। हमारे लिए तुम्हारे पास रोटी और छत नहीं है तो हम भी तुम्हारी गोद में रहने को बेकरार नहीं। रहो अकेले। हम तो चलें।लेकिन शहर तो गांव से भी ज्यादा बेदर्द निकला था। शायद इसीलिए उचट गया था सुरसती का मन। दोबारा पूछा-'तुमने जवाब नहीं दिया? क्या हम गांव नहीं जा सकते?'
'कहां जाएंगे गांव में? किसके यहां जाएंगे? कौन है जो नज़रें बिछाएं हमारे लिए बैठा है? क्या करेंगे गांव में?'
'तो शहर में ही हम क्या कर रहे हैं। गांव में तो कम से कम मैं भी खेतों में मजूरी कर लूंगी। यहां दूसरों के घर जाकर चौका बर्तन करने से तो बेहतर है अपनी जमीन की सेवा करना।'
'नहीं सुरसती। हम इतनी जल्दी नहीं हारेंगे। हम लड़ेंगे?'
' कब तक , जब बच्चे भूख से दम तोड़ देंगे। '
'समझने की कोशिश करो सुरसती।हम गांव से उजड़े हुए लोग। गांव ने हमें त्याग दिया है?'
'तो शहर ने कौन सा अपना लिया है?'
इस सवाल का कोई जवाब उसके पास नहीं था। वो भी चुप बैठा रहा। बच्चे खेल रहे थे। गंगा धीर गंभीर बहती जा रही थी। मानो उनके दुख के बोझ से वो भी बुरी तरह दब गई हो।

Thursday, September 25, 2008

समीर लाल की कहानी--आखिर बेटा हूं तेरा

समीर लाल का नाम किसी परिचय का मुहताज नहीं। ब्लॉगिंग करने वाला कोई भी शख्स इनके नाम से अनजान नहीं। एक बेहतरीन लेखक होने के साथ-साथ समीर जी एक अच्छे इंसान भी हैं। वो न केवल अच्छा लिखते हैं बल्कि दूसरों को लिखने के लिए लगातार प्रोत्साहित करते रहते हैं। उनकी ये कहानी वैसे तो उनके ब्लॉग www.udantashtari.blogspot.com में काफी पहले छप चुकी है लेकिन इतनी अच्छी और संवेदनाओं से लबरेज कहानी है कि इसे दोबारा यहां प्रकाशित किया जा रहा है। उम्मीद है आपको पसंद आएगी।

सरौता बाई नाम था उसका. सुबह सुबह ६ बजे आकर कुंडी खटखटाती थी. तब से उसका जो दिन शुरु होता कि ६ घर निपटाते शाम के ६ बजते. कपड़ा, भाडू, पौंछा, बरतन और कभी कभी मालकिनों की मालिश. बात कम ही करती थी.पता चला कि उसका पति शराब पी पी कर मर गया कुछ साल पहले.


पास ही के एक टोला में छोटी सी कोठरिया लेकर रहती थी १० रुपया किराये पर.एक बेटा था बसुआ. उसे पढ़ा रही थी. उसका पूरा जीवन बसुआ के इर्द गिर्द ही घूमता. वो उसे बड़ा आदमी बनाना चाहती थी.हमें ७.३० बजे दफ्तर के निकलना होता था. कई बार उससे कहा कि ५.३० बजे आ जाया कर तो हमारे निकलते तक सब काम निपट जायेंगे मगर वो ६ बजे के पहले कभी न आ पाती. उसे ५ बजे बसुआ को उठाकर चाय नाश्ता देना होता था. फिर उसके लिये दोपहर का भोजन बनाकर घर से निकलती ताकि जब वो १२ बजे स्कूल से लौटे तो खाना खा ले.फिर रात में तो गरम गरम सामने बिठाकर ही खाना खिलाती थी. बरसात को छोड़ हर मौसम में कोशिश करके कोठरी के बाहर ही परछी में सोती थी ताकि बसुआ को देर तक पढ़ने और सोने में परेशानी न हो.


समय बीतता गया. बसुआ पढ़ता गया. सरौता बाई घूम घूम कर काम करती रही. एक दिन गुजिया लेकर आई कि बसुआ का कालिज में दाखिला हो गया है. बसुआ को स्कॉलरशिप भी मिल गई है. कालिज तो दूर था ही, तो स्कॉलरशिप के पैसे से फीस , किताब के इन्तजाम के बाद जो बच रहा, उसमें कुछ घरों से एडवान्स बटोरकर उसके लिये साईकिल लेकर दे दी. पहले दिन बसुआ अपनी माँ को छोड़ने आया था साईकिल पर बैठा कर. सरौता बाई कैरियर पर ऐसे बैठकर आई मानों कोई राजरानी मर्सडीज कार से आ रही हो. उसके चेहरे के भाव देखते ही बनते थे. बहुत खुश थी उस दिन वो.


बसुआ की प्रतिभा से वो फूली न समाती. बसुआ ने कालिज पूरा किया. एक प्राईवेट स्कूल से एम बी ए किया. फिर वो एक प्राईवेट कम्पनी में अच्छी पोजीशन पर लग गया. हर मौकों पर सरौता बाई खुश होती रही. उसकी तपस्या का फल उसे मिल रहा था. उसने अभी अपने काम नहीं छोड़े थे. एम बी ए की पढ़ाई के दौरान लिया कर्जा अभी बसुआ चुका रहा था शायद. सो सरौता बाई काम करती रही. उम्र के साथ साथ उसे खाँसी की बीमारी भी लग गई. रात रात भर खाँसती रहती.


बसुआ का साथ ही काम कर रही एक लड़की पर दिल आ गया और दोनों ने जल्द ही शादी करने का फैसला भी कर लिया, सरौता बाई भी बहुरिया आने की तैयारी में लग गई. एक दिन सरौता बाई ५.३० बजे ही आ गई. आज वो उदास दिख रही थी. आज पहली बार उसकी आँखों में आसूं थे. बहुत पूछने पर बताने लगी कि कल जब घर पर चूना गेरु करने का इन्तजाम कर रही थी बहुरिया के स्वागत के लिये, तब बसुआ ने बताया कि बहुरिया यहाँ नहीं रह पायेगी. वो बहुत पढ़ी लिखी और अच्छे घर से ताल्लुक रखती है और वो शादी के लिये इसी शर्त पर राजी हुई है कि मैं उसके साथ उनके पिता जी के घर पर ही रहूँ. वैसे, तू चिन्ता मत कर, मैं बीच बीच में आता रहूँगा मिलने.कोई भी काम हो तो फोन नम्बर भी दिया है कि इस पर फोन लगवा लेना. उसे चिन्ता लगी रहेगी. बहुत ख्याल रखता है बेचारा बसुआ. जाते जाते कह रहा था कि अब तो मेरा खर्च भी तुझको नहीं उठाना है. बसुआ पढ़ लिख गया है तो तू एकाध घर कम कर ले और हफ्ते में एक टाईम की छुट्टी भी लिया कर. अकेले के लिये कितना दौड़ेगी भागेगी आखिर तू. और अब इस उम्र भी तू पहले की तरह काम करेगी तो सोच, मुझे कितनी तकलीफ होगी. आखिर बेटा हूँ तेरा.
तब से सरौता बाई रोज ५.३० बजे आने लगी.

Sunday, September 21, 2008

जंगल जिंदगी

कहानी
नूर मुहम्मद नूर
नूर मुहम्मद नूर समकालीन हिंदी ग़ज़ल में एक चर्चित नाम है। हिंदी के अलावा उर्दू, अरबी, फ़ारसी, बांग्ला और भोजपुरी में साहित्य की हर विधाओं में पिछले तीन दशकों से सक्रिय लेखन। दो दर्जन कहानियां, विभिन्न विधाओं की पचास पुस्तकों की समीक्षा, ढेरों व्यंग्य रचनाएं, ग़ज़लें, कविताएं हिंदी की विभिन्न लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित। कविताओं की पहली किताब ताकि खिलखिलाती रहे पृथ्वी, कहानी संग्रह आवाज़ का चेहरा, ग़ज़ल संग्रह दूर तक सहराओं में प्रकाशित। दस पुस्तकें प्रकाशनाधीन।


पिछले पांच दिनों के भयावह अंतर्द्वन्द्व से आज कहीं जाकर नसीम को मुक्ति मिली। सोमवार की दोपहर अपने दो साल के मटमैले चिथड़े पहने, बेटे को अपनी गोद में सुला रही, उस पागल जैसी औरत को देखने के बाद से, निरंतर पांच दिनों की लंबी मानसिक उथल-पुथल ने अंदर से पूरी तरह तहस-नहस कर रखा था। वह औरत बार-बार उसके जेहन में अपने बच्चे समेत आ धमकती। उसका बार-बार चारों ओर, आते जाते लोगों को देख कर हाथ फैलाना, रिरियाना...मुंह और बच्चे की ओर इशारा करना, खाते-पीते, सोते-जागते उसके जेहन में कौंधती रही वो। नसीम उसके बच्चे के बारे में सोचता। पता नहीं कौन है पिता उसका? अगर बच्चे को बुखार हो गया तो? अगर वो औरत ही किसी बड़ी बीमारी की गिरफ़्त में अचानक आ जाये तो...अच्छा बच्चे को बुखार है, यह औरत क्या जान पाएगी? बच्चा उस दिन औरत की गोद में बेसुध पड़ा सो रहा था...क्या उसे बुखार था? सोमवार की उस दोपहर जब वो घाट से पुस्तकालय के लिए पत्रिकाएं लेकर लौटा तब भी, उसने देखा बच्चा उसकी गोद में बेसुध पड़ा हुआ है...पास ही बैठे खीरे वाले से उसने दो छिले हुए खीरे कऱीद कर उस औरत को देते हुए कहा-- ''एकटा बाच्चा के देबै'' (एक बच्चे को दे देना)
''ओ घुमोच्चे।'' (वो सो रहा है)
''ठीक आछे। वो उठले ओके दिए देबे।'' (ठीक है, जब वो उठेगा तो उसे दे देना)
''हां, रेखे दिच्छी'।'' (अच्छा, मैं रख देती हूं)
उस औरत ने खीरे को कटोरे में डाल लिया था। वो फिर अपने दफ्तर चला आया था। पर एक नामालूम सी बेचैनी थी कि उसे मथे दे रही थी और उसकी जड़ में वो पागल सी औरत और उसका दो साल का बेटा...उसी दिन बाद में, कोई चार बजे के आसपास उसे हठात ख्याल आया अरे! उस बच्चे को बुखार है या नहीं यह तो, उस औरत को खीरे देते वक्त पूछना ही भूल गया था। नसीम अपने अंदर की पागल बेचैनियों पर सवार फिर भागा घाट की ओर। पर यह क्या? औरत वहां नहीं थी। वह अपने बच्चे के लेकर कहां चली गई? उसने दोनों तरफ के फुटपाथों पर दूर तक...घाट पर...फेयरली से लेकर आर्मेनियम घाट तक चारों ओर उस औरत को तलाशा पर वह कहीं नहीं थी। इसके साथ ही नसीम ने भी जैसे महसूस किया कि वह भी कहीं नहीं है। आखिर खुदा ने उसे इस बेदिल दुनिया में भी ऐसा कमबख्त दिल क्यों अता फरमाया? इतनी भावुकता, ऐसी छल-छल संवेदना कोई अच्छी बात नहीं मानी जाती इस दुनिया में। आलोचना भी अति भावुक एवं सघन संवेदनशील रचनाओं को अच्छी निगाह से नहीं देखती। इसे वह लेखक की कमज़ोरी और नासमझी कहकर ख़ारिज कर देती है।
फिर नसीम ने खुद को दिलासा दिया...अरे ठीक है, कहीं और चली गई होगी...हो सकता है बच्चे को सचमुम बुखार हो और उसे पता चल गया हो और वह बच्चे के लिए कहीं दवा मांगने चली गई हो। उसने कई तरह से खुद को तसल्ली दी...बड़े बेवकूफ हो यार। अरे इतना भी क्या परेशान होना? दुनिया में हज़ारों-लाखों ऐसे हैं, जिनका घर नहीं है, दर नहीं, ज़र-ज़मीन नहीं। खाने-पहनने को नहीं...ऊपर से दर-दर की ठोकरें, फिर तुम तो यूं परेशान हो रहे हो मानो वो कोई तुम्हारी रिश्तेदार हो...छोड़ो यार...कहीं होगी वह..फिर किसी दिन नज़र आ जाएगी अपने बच्चे के साथ..इस बार खीरा नहीं...पावरोटी बिस्कुट खिला देना। नसीम फिर अपने दफ्तर के 'कहीं' में लौट आया था, जैसे वह दुनिया के किसी और कहीं में हठात समा गई थी।
सोमवार, मंगलवार, वह अंदर ही अंदर टूटता-बिखरता रहा, पिघलता रहा...एक अजीब किस्म की उदासी-बेचैनी व्याकुलता में लिपटा, सोचता ...बसों में, दफ्तर और घर में...पत्नी ने कई बार उसको इस कैफियत के साथ पकड़ा भी...''का हुआ है जी? कई दिन से बड़ा खोए लग रहे हैं। ऑफिस में किसी से झगड़ा-वगड़ा हुआ है का? कौनो अफसर कुछ बोल दिया है...कितनी बार समझाया कि अफसर लोग से दूर रहिए...ऊ लोग आपका क़दर नहीं करेगा...पर आप?'' ''अरे, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। ...दौरा पड़ा है...देख नहीं रही हो, सुबह उठकर...फिर दफ्तर से आकर क्या करता हूं।''
फिर बुध से शुक्रवार तक यही कैफ़ियत बनी रही...पहले कुछ शेर सूझे...नसीम ने सोचा एक ग़ज़ल ही हो जाय...पर बात नहीं बनीं...फिर एक नज़्म...उसे लगा यही ठीक रहेगी। पर ग़ज़ल की तरह वो भी चार-पांच पंक्तियों के बाद बिला गई...तमाम मशक्कतों पर पानी फिर गया। न ग़ज़ल पूरी हुई, न नज़्म अपने अंज़ाम को पहुंची...बेचैनी थी कि उसने ग़ज़्लोनज़्म के अश्आर में दाखिल होने से इंकार कर दिया था...बहुत कोशिश की,...फिक्र और ख्याल के घोड़े दौड़ाए...पर हासिलअदूरी नज़्में-ग़ज़लें...फटे हुए दिल की बेचैन आवाज़ें अल्फाज़ में पनाह नहीं पा सकीं। उन ग़ज़लों के अलफाज़ में, जिनमें ग़ालिब ने दर्दे ग़म की कितनी ही कायनात निचोड़ डाली थीं। लेकिन उनसे भी तो वो सबकुछ, जो आदमी को आदमी के अंदर के आदमी और उसकी दुनिया को यकायक तबाहो बर्बाद कर दी जाती है, लफड़ों में उसी तरह नहीं निचोड़ा गया था। तब उन्हें भी अपने दुखों को बयान करने के लिए डायरी 'दस्तम्बू' लिखनी पड़ी थी...और ख़ुतूत भी।
पर आज उसने अपनी इन बेचैनियों से छुटाकारा पा ही लिया...पांच दिनों से अंदर ही अंदर घुमड़ रही बेचौनियों का लावा अन्तत: पूरी तरह पिघल कर बाहर निकल ही गया। उसने चार-पांच पन्ने घसीटे और पूरा का पूरा लावा एक कहानी के हज़ार शब्दों में... नसीम को तभी से कुछ राहत सी महसूस हो रही है...पर राहत से उसे अपनी अंदरूनी हलचलों-बेचैनियों से मिली है। पर वो औरत और उसका नंगधड़ंग मटमैला भूखा बच्चा...उस औरत और बच्चे को उसने अपनी कहानी में नहलाया और अच्छे कपड़े पहनाकर अच्छे भोजन भी दिया है...अपने मन की तसल्ली उसने कहानी लिख कर कर ली है...अपना सारा बेचैन गुबार भी उसने निकाल लिया है...पर सचमुच वह औरत क्या अब तक कहीं नहा चुकी होगी और उसने अपने बच्चे को भी नहला दिया होगा? क्या उन दोनों ने इस समय साफ़ कपड़े पहन लिये होंगे...बढ़िया भरपेट भोजन क्या उन्हें मिल गया होगा? क्या वह औरत इस समय किसी सुरक्षित स्थान पर अपने बच्चे को अपनी छाती से चिमटाए सुख की नींद सो रही होगी?
नसीम को लगा उसकी राहत बाढ़ज़दा लोगों को मिली रही राहत से ज़्यादा नहीं है। उन्हें आसमान से गिराए गए चिउड़ा-गुड़-बिस्कुट के पैकेट बड़ी मुश्किल से मिल पाते हैं, और उसे एक कहानी मिल गई है...लेखक का ज़मीर भी लेखक ही होता है...नसीम को लगा मगर उसके लेखक का ज़मीर मगर लेखक नहीं है...वह लेखक की तरह नहीं सोचता...शाइरों की तरह फिक्रमंद और फनपरस्त नहीं है...
उसका ज़मीर उसके अंदर से बल खाकर बाहर निकल आया और बोंसाई आदमी की शक्ल में उसके राइटिंग टेबल पर खड़ा हो गया... ''क्यों मिल गई तुझे राहत? पांच दिन से इसी के लिए तड़प रहा था न तू? ग़ज़ल, नज़्म और आखिर में कहानी... वाह क्या कहानी है? एक औरत जिसका कोई नहीं...पर उसका एक बच्चा है...वह भीख मांग कर अपना और अपने बच्चे का गुजारा करती है...फुटपाथों पर रहती है...अरे! वह भी पैदा हुई होगी...होंगे उसके भी मां-बाप...भाई-बहन...रिश्तेदार कहां मर गए सब? उस बच्चे का बाप कौन है? कहां है वो... किसने उस औरत को इस दशा में पहुंचाया...देखा है तुमने...किसी मर्द को एक बच्चे के साथ रहते हुए इस हालत में...फुटपाथ पर भीख मांग कर खाते हुए...चीरहरण द्रोपदी का, युधिष्ठिर का क्यों नहीं? क्या है औरत में जो सिर्फ और सिर्फ उसी की बेहुरमती, उसी का अनादर..हर काल खंड में...और आज भी स्त्री विमर्श...काहे का विमर्श...विमर्श के लिए विमर्श...दलित विमर्श...दलित को और...और...रोज...रोज पददलित करो और फिर उस पर दलित विमर्श... कहानी लिखकर राहत महसूस कर रहे हैं...अरे कैसी और कहां की राहत...क्या राहत पाने के लिए ही लिखा जाय केवल? और चीजें-सूरते बनी रहें...प्रेमचंद ने सैकड़ों कहानियां लिखीं, उपन्यास लिखे, भाषण दिए...कथा और उपन्यास सम्राट माने गए...सारा जीवन उन्होंने किसानों-मजूरों और गरीबों की कहानियों की खेती की। आज उनके नाम पर लाखों-करोड़ों के वारे न्यारे हो रहे हैं लेकिन आज स्थिति क्या है? उनके हलकू-होरी मुल्क में चारों ओर आत्महत्याएं कर रहे हैं...जगह-जगह उनके हलकू-होरी की ज़मीनें जबरन उनसे छीन कर उन्हें मारा पीटा और उनकी ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है, उनके घीसू-माधव की संततियों की संख्या देश भर में दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रही है...कालिदास की शकुंतला ही उनकी निर्मला है...और तुम्हारी निर्मला औरत...यह औरत जो अनाम है...और निश्चित रूप से वह लड़का इस औरत का भरत नहीं है...कौन है यह लड़का....कहानी लिख कर राहत महसूस कर रहे हो...पूछो...पूछो...अपनी बीवी से पूछो...सारा सारा दिन गृहस्थी के हिमालय वो लांघती है....पार करती है रोज रोज अभावों के भयावह जंगल...। वसंत जले हुए वनों की तरह उसके होठों पर फड़फड़ाता रहता है...सारा...सारा दिन...झाड़ू-बुहरू, धोना-पोंछना, सीना-पीरोना, रसोई और...रात फिर तोड़ती है सितम...सितम उसकी देह पर...और वह पसर जाती है पृथ्वी की तरह बेजुबान....पूछो...पूछो...कितना राहत महसूस करती है वह यह सब करते हुए...एक कहानी लिखकर राहत महसूस कर रहे हो....और बस सारी जिम्मेदारी खत्म....लानत है...हज़ार लानत है तुम पर....तुम्हारे लेखक पर...आख थूsss....
इतना लंबा डायलॉग झाड़ कर नसीम का ज़मीर तो गायब हो गया पर उसने सिर पकड़ लिया। लगा किसी ने उसके सिर पर हथौड़ों से प्रहार किया हो। उसने एक सिगरेट सुलगा ली मानो ऐसा करते ही उसे इस भयानक मानसिक स्थिति से मुक्ति मिल जाएगी। थोड़ा स्थिर होने पर फिर वह कहानी के नेकपल ठीक करने लगा...तभी उसने देखा...पत्नी जो रसोई में थी...हठात् बरामदे में आकर फर्श पर धम्म से बैठ गई 'या अल्लाह! रहम कर मालिक।' उसकी आवाज़ में एक अजीब तरह की वेदना और खीझ भरी हुई थी और उसके भाव भी जैसे उसके चेहरे पर उभर आए थे. उसने देखा गमले में आटा सानने के लिए अभी वैसा ही पड़ा हुआ था। सामने जग में पानी भी पड़ा था। उसने इस बार गौर से देखा, गर्मी और घमौरियों की मार से पत्नी की गर्दन और निचले हिस्से स्याह धब्बों से हो रहे थे।
''क्या हुआ? बहुत थक गई लगती हो, तबीयत तो ठीक है ना...दो... मैं आटा सान दूं....''
पत्नी ने उसे घायल सिंहनी की तरह घूर कर देखा मानो नसीम ने कोई बहुत गलत बात कह दी हो। ''हम आपको बोले हैं आटा सानने के लिए?''
''नहीं लेकिन सान दूंगा तो क्या हो जाएगा? सारा दिन ही तो खटती हो...अगर मैं इसमें थोड़ा हाथ बंटा दूं तो इसमें गलत क्या है? आखिर मैं कर ही क्या रहा हूं? कहानी ही तो लिख रहा हूं...कहानी-कविता लिख सकता हूं तो आटा भी सान सकता हूं। मैं क्या कोई लाट-गवर्नर हूं?''
''नहीं...नहीं...आप अपना ही काम कीजिए। जिसका जो काम, उसको वही करे तो अच्छा।''
''क्यों? तुम तो आजकल देख रहा हूं कविताएं भी लिख रही हो। एक पूरी नई डायरी तुमने लगभग भर दिया है। यह क्या तुम्हारा काम है?''
''वो तो मैं ऐसे ही , जब कुछ फुरसत होती है, नींद नहीं आती है तो लिख लेती हूं...पर आप तो कवि हैं....आपका इतना नाम..मान-सम्मान है...इतना छपता है....किताबें हैं....आपका तो काम ही लिखना-पढ़ना है...आटा सोनेगो--अचानक आकर कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा? कहेगा कि देखो मरद से घर का काम करवा रही है।''
''क्यों यह घर मेरा नहीं है क्या? मैं घर का काम क्यों नहीं कर सकता? वैसे भी सारा काम बाहर का करता ही हूं। राशनपानी, दवा-दारू, सब्जी, कपड़ा-लत्ता कौन लाता है? मैं ही ना...लाओ...इधर दो...सान देता हूं आटा...जाओ तुम थोड़ा आराम कर लो।''
नसीम ने उठकर आटा का गमला ले लिया। अभी उसमें वो वहीं बैठकर इसके पहले कि पानी डालता...मोबाइल घनघनाने लगा। विद्युत गति से उठकर नसीन ने मोबाइल कान से चिपका लिया। ''हलो,'' उधर से आवाज़ आ रही थी।
''नानू, सलामालेकुम,...क्या करते हैं? मैं साहिल बोलता...नानी कहां है...खाला..अम्मी...मामा...'' नाती का फोन था। उसकी मां ने फोन लगाकर उसे थमा दिया होगा। चार-साढ़े चार साल का साहिल। उसका नाती। अचानक वो जैसे तनाव मुक्त हो गया था। एक अनजानी खुशी जाने कहां से आकर उसके दिल में समा गई थी। उसने पत्नी को आवाज़ दी ''ए जी, सुनती हो...नाती को फोन है...लो बात कर लो।'' उसने पत्नी को फोन थमा दिया था।
पर तभी उसके जेहन में वह औरत अपने बेटे के साथ कौंध गई...लगा यह वही लड़का है...जो नानू कहकर फोन कर रहा है...और उसकी मां वही पगली सी औरत...उसकी बेटी ही जैसे...उसकी अपनी बेटी...अपना नाती...।

Thursday, September 18, 2008

मन में खड़ी थी दीवार

उर्दू कहानी

बीच की दीवार--भाग 2

गियासुर्रहमान
अनुवाद : नसीम अजीजी


कल कहानी के पहले भाग दंगा और एक बाप की बेबसी में आपने पढ़ा मशकूर अली का संकट। आज पढ़िए कहानी की दूसरी और आखिरी किस्त

आस-पड़ोस में सभी हिंदुओं के मकान थे। यों तो उनके ताल्लुकात सभी से अच्छे थे लेकिन इस फ़साद ने तो दिलों में दरारें पैदा कर दी थीं, किस पर एतबार किया जाय? उनके घर की दीवार के उस तरफ पंडित रतनलाल रहते थे। उनकी बच्ची भी सुग़रा के साथ एक ही स्कूल में पढ़ती थी। दोनों में इस क़दर दोस्ती थी कि एक दूसरे के बगैर एक पल भी रहना गंवारा न था। ऊषा की गुड़िया और सुग़रा का गुड्डा, जिनकी कई बार शादी रचाई गई थी, आज अलग-अलग थे। ऊषा उधर रो-रो कर सुग़रा के घर जाने की जिद कर रही थी लेकिन पंडित रतनलाल खतरा महसूस कर रहे थे। ''मशकूर अली मुसलमान है, वैसे तो वो भला आदमी है लेकिन दंगे में तो सारे मुसल्ले एक जैसे हो जाते हैं। नारा-ए-तकबीर की आवाज़ कान में पड़ते ही आपे से बाहर हो जाते हैं। मैं अपनी बेटी को उसके घर भेजूं और वो उसका गला दबा दे तो क्या होगा?''
वो अपनी बेटी को बहुत समझाते लेकिन उसकी जिद बढ़ती ही जा रही थी। उधर सुग़रा की हालत ग़ैर हो रही थी। मशकूर अली की बेगम और राशिदा रोने लगीं। मशकूर अली उन्हें दिलासा तो दे रहे थे लेकिन खुद उनकी आवाज़ भी भर आई थी और आंखें डबडबाने लगीं। वो कुछ कहना ही चाहते थे कि अचानक उनकी दीवार पर आहट हुई। रात काफी हो चुकी थी। कोई उनके घर की दीवार तोड़ रहा था। दीवार के उस तरफ पंडित रतनलाल का मकान था। मशकूर अली ने अपनी बंदूक कस के पक़ड़ ली। उसमें कारतूस भर दिए और खतरे से निपटने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने बेगम से कहा कि वो सुग़रा को लेकर दूसरे कमरे में चली जायं और राशिदा को अपने साथ रहने का हुक्म दिया। वो दिल ही दिल में बड़बड़ाए, '' मुझे रतनलाल से ऐसी उम्मीद न थी कि वो फसादियों को अपने घर से मेरे घर में दाखिल करेगा। वैसे तो बड़ा प्यार जताता था लेकिन आज उसने अपना कमीनापन दिखा ही दिया।''
मशकूर अली ने मुस्तहकम इरादा कर दिया कि फ़सादियों के अंदर घुसते ही वो गोली चला देंगे चाहे उनमें रतनलाल ही क्यों नो हो, जब उसको दोस्ती का एहसास नहीं है तो मैं क्यों हिचकिचाऊं।
दीवार के पीछे से कुदाल की ज़र्बें लग रही थीं और हर ज़र्ब के साथ मशकूर अली के दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी, राशिदा उनके पीछे सहमी हुई, ज़ख्मी फ़ाख़्ता की तरह कांप रही थी--''पुराने ज़माने की दीवार इतनी आसानी से नहीं गिरेगी''---एक जगह से चूना उखड़ना शुरू हुआ। मशकूर अली दीवार के बिल्कुल करीब आ गए। बहुत देर के बाद दीवार की एक ईंट घऱ में गिरी और आर-पार एक सुराख हो गया। मशकूर अली ने ललकार कर कहा--''खबरदार! अगर किसी ने अंदर घुसने की कोशिश की तो गोली चला दूंगा।'' और उन्होंने बंदूक की नाल ईंट से निकले हुए सूराख पर लगा दी लेकिन दूसरे ही लम्हे ऊषा की आवाज़ ने चौंका दिया।
''मशकूर चाचा, मैं सुग़रा के लिए खाना लाई हूं।'' और उसने सूराख से एक छोटा सा टिफिन अंदर की तरफ बढ़ा दिया।

Wednesday, September 17, 2008

दंगा और एक बाप की बेबसी

उर्दू कहानी

बीच की दीवार


गियासुर्रहमान
अनुवाद : नसीम अजीजी

पूरे दस दिन हो गए थे। फ़साद की आग जो भड़की तो बुझने का नाम नहीं लेती थी। सारे शहर में सख्त कर्प्यू के बावजूद वारदातें हो रही थीं। पूरी दस रातें आंखों में गुजर गईं। इस क़दर शोर-शराबे में नींद किसको आती है? फिर हर वक्त ये डर कि कहीं फ़सादी हमला न कर दें। यों तो पहले ही सब कुछ लुट चुका है लेकिन जान सबको प्यारी होती है और उससे भी प्यारी औलाद।
मशकूर अली और उनकी बेगम, अपनी दो बेटियों को गले लगाए बारगाहे-इलाही में दुआएं करते रहते थे कि ''खुदाया इन मासूम बच्चियों पर कोई आंच न आये, चाहे हमारी चिक्का बोटी कर दी जाये।''
बड़ी लड़की राशिदा हाई स्कूल पास करके इंटर में दाख़िल हुई तो अचानक ही उस पर ऐसा निखार आया कि पूरे मुहल्ले की नज़रों में समा गई। कॉलेज के मनचले हसरत भरी निगाहों से देखने लगे। आस-पास क्या, दूरदराज़ से भी कई पैग़ाम आने लगे लेकिन मशकूर अली ये कहकर इंकार कर देते कि ''अभी बच्ची पढ़ रही है और मैं इसको आला तालीम दिलवाना चाहता हूं। खुदा ने बेटा नहीं दिया तो क्या, ये मेरी बेटियां ही बेटों से बेहतर हैं।''
लेकिन राशिदा की जवानी ने मां-बाप की आंखों से नींद छीन ली थी और दिन-ब-दिन एक अजीब सा इज़्तेराब बढ़ता जा रहा था और पिछले दस रोज़ से तो वो सिर्फ राशिदा की फिक्र में इतने परेशान थे कि कोई मौत से भी इतना परेशान न होगा। वैसे कई बार मशकूर अली ने अपनी दो नाली बंदूक निकाल कर उसकी सफाई की थी और पुराने करातूस को धूप दिखाई थी। वो रोजाना कारतूस गिन-गिन कर रखते थे। कुल नौ कारतूस थे।

उन्होंने अच्छी तरह सोच रखा था कि अगर फ़सादी आते हैं, पहले तो सद्र दरवाज़ा ही आसानी से नहीं टूट सकेगा। अगर दरवाज़ा टूट भी जाता है और वो अंदर घुसने की कोशिश करते हैं तो मशकूर अली राशिदा को अपने साथ ही रखेंगे। जहां तक हो सका आठ कारतूसों से फसादियों का मुकाबला करेंगे और नवां कारतूस राशिदा की इज्जत बचाने के लिए काफी होगा लेकिन आज उन्हें राशिदा की कम और अपनी छोटी बेटी सुगरा की ज्यादा फिक्र थी। सुग़रा सात-आठ साल की थी और अपनी तोतली जबान में इतनी प्यारी बातें करती थी कि सभी उसके गरवीदा थे। पिछले तीन दिन से वो बुखार में मुब्तला थी। दवाई तो दरकिनार, खाने के लिए एक दाना भी बाकी न था।
मशकूर अली हमेशा ज़ख़ीरा अंदोजी के ख़िलाफ़ थे और कभी उन्होंने मुस्तक्बिल की फिक्र न की थी लेकिन अब पछता रहे थे।'' काश पहले ही एक आध बोरी आटा या चावल वैगरह जमा कर लेता तो आज ये नौबत न आती।'' उस कर्फ्यू में बिजली और पानी का निजाम दरहम-बरहम हो गया था। अब तो पीने का पानी भी बमुश्किल तमाम फराहम हो पा रहा था और फिर रह-रह कर सुग़रा का दिलदोज़ अंदाज़ के साथ खाना मांगना उन्हें बेचैन कर रहा था। आज तक उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए थे। जमींदारी खत्म हुई, जायेदाद के बंटवारे हुए। मशकूर अली के हिस्से में ये पुराना मकान और चार छोटी-छोटी दुकानें आईं, जिनका बरायेनाम किराया ही उनका जरिय-ए-गुज़र औक़ात था। उन्होंने इसी पर इक्तेफ़ा किया, लेकिन अपने भाइयों में सबसे बड़े होने के नाते उन्होंने जिद करके अपने बुजुर्गों की निशानी ये दो-नाली बंदूक अपने कब्जे में कर ली थी। कितने ही उतार-चढ़ाव आये, एक-एक करके घर की सभी क़ीमती चीजें सस्ते दामों में बिक गई। फाकों तक की नौबत आई लेकिन उन्हें अपने आबाई शानो शाकत की निशानी उस दो नाली बंदूक को बेचने का ख्याल भी नहीं, मगर आज वो अपनी सुग़रा की भूख की खातिर अपनी जान भी बेचने को तैयार थे। वो फ़कीरों की तरह भीख मांग कर भी अपनी बच्ची का पेट भरना चाहते थे लेकिन बाहर निकलना मुमकिन न था। कर्फ्यू ने सख्त शक्ल अख्तियार कर ली थी, देखते ही गोली मार देने के अहकामात जारी हो गए थे। बाहर पुलिस की जीप गुजरती और लाउडस्पीकर पर यही ऐलान करती कि कोई भी घर से बाहर न निकले।


क्या इस भीषण संकट से निकल पाए मशकूर अली? क्या सुग़रा को मिल पाया पेट भर खाना? क्या राशिदा की रक्षा कर पाए मशकूर अली अपनी दो नाली बंदूक से? जानने के लिए कहानी का अगला और आखिरी किस्त पढिए कल

Tuesday, September 16, 2008

सब कुछ माया है

मामाजी--दूसरी और आखिरी किस्त
रागिनी पुरी

कल कहानी मामाजी की पहली किस्त में आपने पढ़ा कि सुमेधा किस तरह अपने मामाजी के व्यक्तित्व से प्रभावित थी। आज पढ़िए कहानी की दूसरी और आखिरी किस्त

मन ही मन मामाजी की तारीफों के पुल बांधते बांधते सुमेधा का ध्यान अपने पापा की ओर चला गया है। बिलकुल मस्तमौला इंसान हैं उसके पापा। दिल के बिलकुल साफ, पर अपने दम पर तो वो घर को बिलकुल मैनेज नहीं कर सकते। अगर घर में वो अकेले हों और चार मेहमान आ जाएं, तो उन्हें तो कुछ सूझेगा ही नहीं...उन्हें तो हर चीज़ मम्मी से मांगने की आदत है...हां चाय शायद ज़रूर बना लेंगे। सुमेधा सोचते- सोचते हंसने लगी।राखी की रस्म हो गई है। काफी देर से हंसी ठहाकों का सिलसिला चल रहा है। पूरी तरह से फील गुड फैक्टर वाला माहौल है। नाश्ता भी लगभग हो ही चुका है। गर्मागर्म आलू के परांठे, घर का बना सफेद मक्खन और दही। अब गर्मागर्म मसालेदार चाय की चुस्कियों के साथ ठहाकों का दौर चल रहा है। बचपन की बातें, लड़ाई झगड़े, बेवकूफियां...सब याद की जा रही हैं।अब बस थोड़ी ही देर में स्वामीजी के आश्रम के लिए निकलना है। वहां से सत्संग के बाद सुमेधा मम्मी के साथ अपने घर चली जाएगी।

शंभू ने गैरेज से कार निकाल दी है और अब उसे चमका रहा है। घर के सभी लोग तैयार हो निकलने की तैयारी कर रहे हैं।सत्संग के बाद मामाजी स्वामीजी के साथ रहेंगे और मामीजी फैक्ट्री चली जाएंगी, कुछ ज़रूरी काम निपटाने। सभी सत्संग घर के लिए निकल पड़े हैं। कार मामाजी ही ड्राइव कर रहे हैं। सुमेधा पीछे मम्मी के साथ बैठी है। मामीजी आगे हैं। सीडी प्लेयर पर स्वामीजी का सत्संग चल रहा है। सभी उसमें खोए हैं...."मनुष्य अपने कर्मों से जाना जाता है। वो खाली हाथ आया है, खाली हाथ जाएगा। सारी माया यहीं रह जाएगी...इसलिए ऐ परमात्मा के बन्दे, पाप ना कर, कल किसने देखा है...मोहमाया त्याग दे।" सत्संग चल रहा है, सभी चुप हैं।

ट्रैफिक सिग्नल पर गाड़ी रुकी है। एक मैली कुचैली सी लड़की कार की ओर बढ़ रही है। बाल बुरी तरह उलझे हुए...छोटी सी फ्रॉक कई जगह से फटी हुई...हाथ में एक गंदा सा कपड़ा है, जिसे वो कार पर फेरने लगी है।

"साले बहन..., सुबह सुबह आ जाते हैं।" मामाजी ज़ोर से बड़बड़ाने लगे हैं। लड़की उनके शीशे के बिलकुल पास आ गई है...हाथ फैलाए हुए...कुछ बोल भी रही है, पर कार के अंदर उसकी कमज़ोर आवाज़ सुनाई नहीं दे रही।

"साले हराम के पैदा करके छोड़ देते हैं सड़क पर....हमने क्या टकसाल लगाई हुई है...चल भाग यहां से...!" मामाजी बोलते जा रहे हैं...पर लड़की वहीं खड़ी हुई है....हाथ फैलाए...सुमेधा का दिल कर रहा है उस बच्ची को कुछ देने का...पर मामाजी का गुस्सा देख हिम्मत नहीं हो रही। शरीर ही मानो जड़ हो गया है। ना मुंह से आवाज़ निकल रही है और ना शरीर हिल रहा है। अभी अगर पापा होते यहां तो मामाजी को ज़रूर टोकते और बेचारी सी बच्ची को ज़रूर कुछ देते। पर ज्यादा धक्का तो इस बात है कि मामाजी बोल रहे हैं ये सब..! उसके सोफिस्टिकेटेड मामाजी...!सिग्नल अभी तक लाल ही है। अब तो लड़की हाथ फैलाए गिड़गिड़ा रही है। कार के शीशे से हाथ नहीं हटाया है अभी तक।

"सालों हरामज़ादों...! समझ नहीं आ रही क्या..." मामाजी ने कार का शीशा नीचे किया है।"ओए तुझे समझ नहीं आ रही क्या...नहीं देना कुछ भी हमने...भाग जा...पता नहीं कहां से आ जाते हैं साले...कार का शीशा खराब कर के रख दिया !" मामाजी ने लड़की को ज़ोर से धक्का दिया है। वो बीच सड़क पर गिरते गिरते संभल गई है और दूसरी कार की ओर बढ़ने लगी है।सिग्नल हरा हो गया है।

"बेवकूफ ने सारा शीशा खराब कर दिया...हाथ के निशान पड़ गए हैं...बेवकूफ लड़की..." मामाजी कार आगे बढ़ाते हुए गुस्से में बड़बड़ाते जा रहे हैं। मामीजी चुप हैं। शायद अपने पति की बातों को मौन सहमति दे रही हैं। मम्मी भी चुप हैं। पता नहीं उनके मन में क्या चल रहा है। सुमेधा भी चुप है। पर उसकी तो मानो ज़ुबान ही बेजुबान हो गई है। हर बात पर बढ़ चढ़कर बोलने वाली सुमेधा भी आज चुप है। सीडी प्लेयर पर स्वामीजी कहते जा रहे हैं,"बंदे, ये दुनिया तो बस एक छलावा है....तू ध्यान कर...इस मोहमाया की दुनिया से बाहर निकल....तू खाली हाथ आया है, खाली हाथ ही जाएगा..."