Wednesday, April 15, 2009

चटकल

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव
नरेश झुंझला गया। उसे लगा चटकल में बदली मजदूर का काम करना और भीख मांगना बराबर है। पिछले तीन दिनों से लेबर ऑफिस का चक्कर लगा-लगा कर वह हलकान था लेकिन बाबू थे कि काम देने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बस एक ही ज़वाब--आज लोक नहीं लागेगा।(आज आदमी की ज़रूरत नहीं है)। जी में तो आया कि बोल दे कि लोक कब लगेगा, जब हम भूख से दम तोड़ देंगे? लेकिन कुछ नहीं बोल पाया। बदली मजदूर की इतनी हैसियत कहां होती है कि बाबू के आगे मुंह खोल पाये।

वह खड़ा रहा। उम्मीद थी कि शायद कोई नागा(अनुपस्थित) हो जाय, और उसे बुलावा आ जाय।बाबू ने चश्मे के बाहर से उसकी ओर देखा--अब इहां का करता है। जाओ काल आना।नरेश ने विनती के स्वर में पूछा--कुछ देर और देख लें साहब? शायद कोई नागा हो।बाबू हंसा। पान की पिक उसके होठ के दाहिने किनारे से निकल पड़ी। उसने टेबल से एक कागज उठाया और उससे अपना मुंह पोंछ कर डस्टबिन में फेंक दिया। तभी महेशनाथ दिखे। चेलों की पूरी टोली के साथ। वे सीधे लेबर बाबू के पास पहुंचे। कांग्रेस यूनियन के नेता। इस कारखाने के मामले में सबसे बड़े और दबंग नेता।बाबू ने इस बार चश्मे के अंदर से महेशबाबू की ओर देखा--नमोस्कार महेश दा। का खबोर?.महेश बाबू ने तल्ख स्वर में कहा--क्या बात है? तुम आजकल बहुत बड़े बाबू बन गये हो। हमलोगों की बात भी नहीं सुनते। सब बाबूगिरी भूला देंगे।
बाबू की सिट्टीपिट्टी गुम। हें-हें करता हुआ बोला-इ का बोल रहा है महेश दा? आपलोगों के लिए ही तो इहां पर बैठे हैं। का बात है?
-लल्लन तीन-तीन बार आया लेकिन तुमने उसे काम नहीं दिया।
बाबू ने कहा--अइसा बात नहीं महेश दा। आपका किसी भी लोक को हम कभी मना नाहीं किया लेकिन वो दिन सचमुच लोक का ज़रूरत नेहीं था। आज ज़रूरत है तो लल्लन का पता नहीं। हम बोला था कि एक बार चक्कर ज़रूर मार जाना।
महेश बाबू का पारा गरम हो गया--कहां है ललनवां? लल्लन झट सामने आ गया।महेश बाबू चिल्लाये--का रे, बड़का लाट साहब हो गया है ? बाबू तुम्हारे घर जाकर काम देंगे क्या? बाप का नौकर समझ रखा है
सबको लल्लन को मानो सांप सूंघ गया। सीधे जाकर बाबू के टेबल के सामने खड़ा हो गया. बाबू ने उसके नाम की पर्ची काटते हुए कहा-रोज काहें नहीं आता? छोटा छोटा बात के लिए महेश दा को परेशान करता है।लल्लन चुप। बाबू पर खून खौल रहा था। अभी इसे बकवास करने की क्या ज़रूरत है? चुपचाप जल्दी से पर्ची देता क्यों नहीं? पर्ची हाथ में मिलते ही मानो लल्लन की जान में जान आई. सीधे फैक्टरी की ओर भागा। पता नहीं उसे काम मिलने की खुशी थी या महेश बाबू से दूर भागने की। महेश बाबू का गुस्सा बहुत खतरनाक होता था।
नरेश दंग रह गया। बाबू ने उसे काम देने से मना कर दिया लेकिन महेश बाबू के आते ही लल्लन को काम मिल गया। लेकिन क्या वह इस मामले में बाबू से बहस कर सकता था। नहीं...नहीं कर सकता बहस। गाहे-बगाहे बाबू काम देता भी तो था। बहस कर लिया तो वह भी बंद हो जायेगा। क्या करे वह? क्या बिना यूनियन पकड़े उसे काम नहीं मिलेगा? कैसे पकड़े किसी यूनियन का दामन। दो ही यूनियन प्रभावी थी। एक लाल, दूसरा पंजा। सीपीएम और कांग्रेस लेकिन लाल और पंजा के नाम से मशहूर। लाल झंडा वालों के पास जाये या पंजा वालों के पास। जान पहचान तो किसी से नहीं थी लेकिन उसके कुछ ऐसे साथी थे , जो यूनियन में थे। जुलूस निकलता तो कंधे पर झंडा लेकर नारे लगाते हुए चलते थे. उस वक्त उनकी छाती गर्व से फैली होती थी। नरेश का भी जी करता कि वह भी नारे लगाये, झंडे ढोये। मजदूरों के बीच रूतबा बढ़ता है लेकिन क्या कोई यूनियन उसे इस लायक समझेगी?
सुना था लाल झंडे वालों की सरकार है, इसलिए उनकी खूब चलती है लेकिन साथ ही यह भी सुना था कि इसमें बंगालियों का वर्चस्व है और वे बिहारी मजदूरों की मदद नहीं करते। मेड़ो (पश्चिम बंगाल में यही कहकर हिंदीभाषियों को चिढ़ाया जाता है) कहकर भगा देते हैं। लेकिन पता नहीं क्यों उसे इस बात पर विश्वास नहीं होता था। वह बिहार के कितने ही मजदूरों को जानता था जो लाल झंडा वाली यूनियन में जाते थे। घंटों बैठे रहते थे। बाबू लोगों के लिए दुकान से चाय लाते थे, कुल्हड़ों में सबको चाय बांटते थे, खुद भी शान से बैठकर पीते थे। और जवाहर? उसका तो रूतबा देखने लायक है। जब भी चटकल मैदान में मीटिंग होती है, रिक्शा पर माइक लेकर वही चिल्लाता है--भाइयो और बहनो, आज शाम चार बजे, चटकल मैदान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया है. इस जनसभा में मजदूरों की समस्याओं पर विचार होगा। सभा को पार्टी के लड़ाकू नेता कॉमरेड जतीन चटर्जी सम्बोधित करेंगे। घंटों वह रिक्शा में घूमता और अपनी बुलंद आवाज में मुनादी करता रहता था। उसके पीछे-पीछे कुछ मजदूर-कुछ बच्चे भागते रहते । वह भी तो मेड़ो ही है। अगर बात मेड़ो की ही होती तो उसे ये काम क्यों मिलता? सब लोग उसकी कितनी इज्जत करते हैं।
जवाहर से उसकी थोड़ी जान पहचान थी। उसने तय कर लिया वह आज ही जवाहर से मिलेगा और लाल झंडा का सदस्य बन जायेगा। सारे दुख दूर हो जायेंगे। रोज काम मिलेगा। रोज काम अर्थात हर पंद्रह दिन बाद ठीक-ठाक तंख्वाह। फिर मुन्ना को बनर्जी बाबू के घर की सूखी रोटी नहीं खानी पड़ेगी। सुरसती को मन मार कर लोगों के सामने उधार के लिए हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। मुन्ना के लिए एक पैंट और सुरसती के लिए एक साड़ी जरूर ले लेगा। चप्पल भी। सुरसती के पास चप्पल तक नहीं है। नंगे पांव दौड़ती रहती है। थोड़ी सी उम्मीद और नरेश के सपनों की फ़सल लहलहाने लगी थी उसने बाबू की ओर देखा। वह चश्मे के बाहर से नरेश की ओर ही देख रहा था। नरेश की आंखों में नफ़रत झलकी तो उसने झट अपनी आंखें फेर ली। शायद झेंप गया था।

लेबर ऑफिस से वह सीधे जवाहर के घर ही गया था लेकिन जवाहर घर पर नहीं था। पता चला दो तीन घंटे बाद आयेगा। पार्टी के काम से कहीं गया हुआ है । मन ही मन जवाहर से ईष्या हुई। कितना व्यस्त रहता है जवाहर। बाबू लोगों में कितनी इज्जत है उसकी। सब उसकी बात सुनते हैं। काम को लेकर भी कोई समस्या नहीं। जब चाहा काम कर लिया, जब चाहा पार्टी के काम से निकल पड़ा। उसने व्यर्थ ही अपना समय गंवा दिया। और पहले ही यूनियन में आ जाना चाहिए था लेकिन अब वह इस गलती को नहीं दोहरायेगा। जवाहर से मिलकर ही जायेगा।वह जवाहर के घर के बाहर ही घूमने लगा। कुछ देर बाद वहीं बगल की चाय की दुकान पर जाकर बैठ गया। घर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। ज़रूरतें मुंह बाये खड़ी थीं और आज तो घर में राशन भी नहीं थी। किस मुंह से पत्नी और बच्चों के पास जाकर अपनी हताशा की बात कहेगा? घर जाने में देर होता देख कम से कम कुछ देर तक तो वे इस उम्मीद में रहेंगे कि उसे काम मिल गया है। अभाव में ऐसी उम्मीदें भूख पर भी भारी पड़ती हैं। बहुत बल मिलता है। उसने तय किया कि वह कुछ देर तक उन्हें इस उम्मीद का आनन्द उठाने देगा।

जवाहर उसे जतीन दा से मिलाने पर राजी हो गया था। उसने उम्मीद दिलाई थी कि यूनियन का सदस्य बनने के बाद काम मिलने में कोई दिक्कत नहीं होगी। नाम नंबर भी बन जायेगा। पीएफ कटने लगा। ईएसआई कार्ड बन जायेगा। हजारों सपने। छोटा सा मन। उछलता हुआ घर लौटा था नरेश।वक्त से पहले उसे देखकर सुरसती की उम्मीदों को झटका लगा था--का हुआ जी? आज भी काम नहीं मिला?
--नहीं, काम तो नहीं मिला लेकिन अब काम मिलेगा?
--कैसे?
और नरेश ने सारा किस्सा उत्साह के साथ बांच दिया था। उम्मीद का दीया और तेज जलने लगा था। लेकिन बिना भात के दोपहर कैसे कटेगी? कम से कम बच्चों के लिए कोई व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी। हमेशा की तरह सुरसती ने ही की थी व्यवस्था। पड़ोस से चावल उधार मांग कर लाई थी। जल्द ही वापस लौटाने के करार पर। दोपहर ठीक-ठाक गुजर गई। अब सारी उम्मीदें शाम पर टिकी थीं।

लाल झंडा का ऑफिस कारखाने के उत्तरी गेट के ठीक सामने था। अगल-बगल चाय की दो दुकानें। दिन भर चलने वाली दुकानें। कार्यकर्ताओं-मजदूरों-नेताओं की भीड़ लगी रहती थी। यहां एक घंटे बैठ जाओ तो कारखाने के बारे में, नेताओं के बारे में इतनी ज्यादा जानकारी मिल जाती थी कि बस पूछिए मत। कुछ जानकारी सही होती थी तो कुछ अटकलें। सिर्फ कारख़ाना ही क्यों राज्य और देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितयों का आकलन, अखबार की एक-एक ख़बर की समीक्षा। अगर पढ़ना नहीं आता है तो भी कोई बात नहीं। एक अखबार पर जब दस दस लोग हों तो उनमें से एक वाचक की भूमिका में आ जाता था। बाकी नौ गोलबंद होकर ख़बर का मजा लेते थे। टिप्पणियां करते थे। बहस होती थी। बड़े-बड़े बुध्दिजीवी इन बहसों के आगे नहीं टिक सकते थे। सही मायने में अख़बार कैसे जनमत बनाता-बिगाड़ता है, इसका जीता-जागता प्रमाण इस चाय की दुकान पर मिल जाता था। कभी-कभी बहस हंगामे और मारपीट तक में तब्दील हो जाती थी।

नरेश जवाहर के बताये समय पर चाय की दुकान पर पहुंच गया था। लाल झंडा के ऑफिस में लोगों का आना जाना शुरू हो गया था। लगभग दस पंद्रह लोग भीतर बैठे भी थे। नरेश को बाहर ही इंतजार करना था। जवाहर के आने पर उसके साथ ही अंदर जाने की बात थी। उसके अन्दर का शर्मीला आदमी अब धीरे-धीरे जगने लगा था। इतने लोगों के बीच अपनी बात जतीन दा के सामने कैसे रख पायेगा?वह चाय की दुकान पर बैठ गया। डरते-डरते। सुना था दुकान वाला चाय का ऑर्डर नहीं देने वाले को नहीं बैठने देता । आप एक चाय पी लीजिये और घंटों बैठ कर राजनीति पर भाषण झाड़ते रहिए , उसे कोई समस्या नहीं थी लेकिन बिना ऑर्डर के बैठने पर किचकिच होने की आशंका थी लेकिन नरेश ने रिस्क उठाया और एक बेंच पर बैठ गया। चाय वाले ने ध्यान नहीं दिया। दुकान पर भीड़ थी और वह काफी व्यस्त था। अखबार के भीतर का एक पन्ना बेंच पर पड़ा हुआ था। उसने उठा लिया और पढ़ने की कोशिश करने लगा लेकिन पढ़ नहीं पाया। वह अखबार पर नज़र गड़ा ही नहीं पा रहा था। उसकी नज़रें बार-बार सड़क की ओर उठ जाती थी। जवाहर अभी तक आया क्यों नहीं? तय समय के हिसाब से तो उसे अब तक आ जाना चाहिए था। अखबार पर नज़र पड़ते ही मन में आशंका घुमड़ने लगती कि कहीं उसकी नज़र चूक गई और जवाहर यूनियन में घुस गया तो? वह अखबार का पन्ना हाथ में लेकर जवाहर के लिए टकटकी लगाये रहा।

एक घंटे बीत चुके थे। चाय की दुकान पर कितने ग्राहक आये और चले गये लेकिन नरेश उसी बेंच पर बैठा जवाहर की बाट जोहता रहा। यूनियन ऑफिस में और भीड़ हो गई थी। लगभग ठसाठस भर गया था। हंसी-मजाक -शोरगुल लेकिन उसके लिए सब जैसे बाहरी दुनिया की बात थी। उसकी दुनिया तो बस जवाहर के कदमों की आहट तक सिमट गई थी। कहीं ऑफिस में आ तो नहीं गया। हो सकता है उसकी नज़रें चूक गईं हो और जवाहर ऑफिस के अन्दर चला गया हो। लेकिन उसने तो चाय की दुकान पर ही इंतजार करने को कहा था।मन नहीं माना। वह बेंच से उठकर ऑफिस के सामने गया। ऑफिस खचाखच भरा हुआ था। अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई उसकी। उसके अन्दर का मेड़ो उसे ऑफिस से दूर धकेलने लगा। अगर ऑफिस के अन्दर गया और किसी ने मेड़ो कहकर भगा दिया तो? वह खिड़की के पास तक आया। भीतर झांक कर जवाहर को ढूंढने की कोशिश की लेकिन जवाहर नहीं दिखा।

भीतर मनमोहन सरकार की कोई बात चल रही थी। सोनिया और ज्योति बसु की मुलाकात की बात चल रही थी। कोई जोर-जोर से हंस रहा था। तरह-तरह की बातों का मिश्रण और कुल मिलाकर मछली बाज़ार का माहौल । मार्क्सवाद का मछली बाज़ार या मछली बाज़ार में मार्क्सवाद--समझ में नहीं आया। हताश कदमों से फिर चाय की दुकान पर वापस लौट आया

तीन घंटे बीत गये थे। रात के नौ बज रहे थे। जवाहर नहीं आया। अब आने की संभावना भी नहीं थी। यूनियन ऑफिस लगभग खाली हो चुका था। चार पांच लोग थे और लग रहा था कि वे ही यूनियन ऑफिस बंद कर चले जायेंगे। चाय की दुकान भी खाली हो गई थी। चाय वाले की नज़र अब उस पर पड़ी।--क्या भाई? क्या बात है? शायद तुम शाम से ही यहां बैठे हो? कोई काम-धाम नहीं है क्या?

नरेश लगभग घबड़ा गया। याद आ गई चाय वाले बिना ऑर्डर के बैठने वालों को भगा देता है। उसे लगा अब बेइज्जत भी होना पड़ेगा। उसने लगभग डरते-डरते कहा--माफ करना भाई, तुम्हारी दुकान पर बहुत देर बैठ गया। एक आदमी का इंतजार कर रहा था लेकिन वह आया नहीं।
--कोई बात नहीं। यहां बैठने की मनाही नहीं है। ग्यारह बजे तक दुकान खुली रहती है तुम और दो घंटे बैठ सकते हो लेकिन बात क्या है? बहुत परेशान हो।
नरेश को राहत मिली। उसने अपना पूरा दिल उघाड़ कर रख दिया। इस ज़माने में ऐसा आदमी कहां मिलता है, जो दूसरों का दर्द सुनने के लिए वक्त निकाल सके।
--तो अभी तुम्हें दौड़ायेंगे सब। नेता लोग इतना जल्दी काम थोड़े ही करते हैं? मैं तो बरसों से यही देख रहा हूं? चाय वाले ने कहा और साथ ही पूछा---चाय पियोगे?
नरेश चुप रहा।
--पैसे की चिंता न करो। जब काम मिलेगा तो दे देना। शाम से बैठे हो। अरे छोटू, बाबू को चाय देना।
छोटू चाय दे गया।नरेश ने पूछा--दौड़ाते हैं लेकिन काम तो कर देते हैं न?नरेश दौड़ने के लिए तैयार था।
--देखो भाई, काम होता भी और नहीं भी होता है। सब इस बात पर है कि तुम्हारा सोर्स कैसा है।
सोर्स तो उसका जवाहर था। कायदे से मजबूत सोर्स था। काम हो जाना चाहिए था लेकिन वह चुप ही रहा।
--जाओ, अब कल एक बार फिर चक्कर लगाना। अब तो इतनी रात को यहां कोई आयेगा भी नहीं और अब ऑफिस तो बंद भी होगा।
कुछ देर बाद ऑफिस बंद भी हो गया. नरेश टूट गया। जब तक ऑफिस खुली थी उम्मीद की एक किरण बाकी थी कि शायद जवाहर आ जाय। भले ही जतीन दा से भेंट नहीं हो लेकिन जवाहर से भेंट होने पर भी उसे थोड़ी तसल्ली, थोड़ा दिलासा मिल जाता। वह बुरी तरह थक गया था। मानसिक रूप से भी और शारीरिक रूप से भी। किस मुंह से घर जाय। पता नहीं क्यों घर शब्द से ही अब उसे चिढ़ होने लगी थी। अभाव और घर दोनों एक साथ नहीं हो सकते। आदमी की ज़िन्दगी में इनमें से कोई एक ही होना चाहिए। घर जाते ही सुरसती का सवाल--क्या हुआ जी और जवाब सुनने के बाद उससे भी कठिन सवाल--अब क्या होगा जी?
दूसरे दिन भी वह तय समय पर यूनियन ऑफिस पहुंच गया था। चाय वाले से जान-पहचान हो गई थी। बैठते ही चाय आ गई। वह चकित रह गया। चाय वाले ने कहा--चिंता न करो। दो चाय का पैसा हो गया। काम मिलते ही दे देना।
चाय वाले ने उधारी शुरू कर दी थी। उधार लेते उसका दिल कांप उठा लेकिन निराला काका की बात याद आ गई--चटकल में काम करोगे और उधार नहीं लोगे-- यह कैसे हो सकता है। और उसके बाद खुला ठहाका। ऊपर से नीचे तक कर्ज में डूबे निराला काका कैसे ठहाके लगा लेते थे, यह बात आज तक नरेश नहीं समझ पाया। कर्जदारों के तकादे आते, गालियां सुनते लेकिन फिर अपने रंग में। जोरदार ठहाके। ठहाकों पर ठहाका। घर में चूल्हा नहीं जला तो ठहाका, पत्नी से झगड़ा हुआ तो ठहाका, मिल में किसी बाबू से झगड़ा हुआ तो ठहाका। केवल ठहाका। निराला काका को देख उसे आश्चर्य भी होता और बल भी मिलता। दुखों से दो दो हाथ करने की ताकत मिलती। ज्ञान भी अच्छा था निराला काका का। पुराने जमाने के मैट्रिक पास थे। बहुत कुछ बताते थे नरेश को। नरेश ने उनसे बहुत कुछ सीखा था, समझा था लेकिन यूनियन वाली बात उसने अभी तक निराला काका को नहीं बताया था। बताते तो फिर लगता जोरदार ठहाका और फिर ऐसी बातें कि उसका दिल बैठ जाता। उसने सिर झटक दिया।

चाय ठंडी हो रही थी। वह चाय सुड़कने लगा।यूनियन ऑफिस अभी खुला नहीं था। चार बजे के आसपास खुलता था। उस दिन जवाहर आया था। जतीन दा से मुलाकात भी हुई। जतीन दा ने ढेर सारे सवाल दागे--कब से इहां हो, अब तक यूनियन में काहे नहीं आया। फिर जवाहर से पूछा था-चंदा दे पाएगा ये? जवाहर ने नरेश से पूछा--चंदा कहां से दोगे? मेम्बर बनने के लिए चंदा देना पड़ता है।
नरेश चुप। इस बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था। जवाहर ने सुझाया-काम मिलने के बाद दे देना?कितना अच्छा सुझाव था। नरेश तत्काल राजी हो गया। जवाहर को उसने ऐसे देखा मानो वो भगवान हो। बाद में जवाहर ने बताया था कि बाद में चंदा देने पर थोड़े ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। कोई बात नहीं, थोड़ा ज्यादा पैसा दे देगा। पहले काम तो मिले। आखिरकार जवाहर की मदद से वो लाल हो गया। लाल झंडा का आदमी। अपने आप उसकी अक़ड़ थोड़ी बढ़ गई। शायद अब रोटी के लाले नहीं पड़े। सिर उठाकर घर पहुंचा था।

15 दिन बीत गए। काम मिलना बिल्कुल बंद हो गया था। पहले तो बाबू के पास चक्कर लगाने पर एकाध रोज काम मिल भी जाता था लेकिन अब तो वो भी बंद हो गया था। उसने बाबू के यहां जाना छोड़ दिया था। अब सारी उम्मीद जतीन दा से थी। जवाहर ने कहा भी था कि जतीन दा ये बिल्कुल पसंद नहीं करते कि उनकी यूनियन का कोई आदमी काम के लिए जाकर बाबू के पास गिड़गिड़ाए। तुम निश्चिंत रहो, बाबू साला बुलाकर काम देगा। नरेश को काफी अच्छा लगा था। तो अब वो बेसहारा साधारण आदमी नहीं है।लेकिन 15 दिन बीतते-बीतते उसे अपनी बेचारगी का एहसास होने लगा था। लाल का आदमी होने की हेकड़ी गुम होने लगी थी। सुबह-शाम नियम से यूनियन ऑफिस जाता। पटला दा आफिस खोलता और उसके बाद पूरे आफिस की साफ सफाई। बड़े से लेकर छुटभैये नेताओं तक की सेवा। सबको लाकर चाय पिलाना। चाय का बर्तन धोकर रखना। जतीन दा रोज आता। सफेद कुर्ता, सफेद पाजामा। बगल में खादी का बैग लटकाए। रोज पूछते कैसे हो और वो रोज बताता अच्छा है लेकिन अभी तक हिम्मत नहीं हो पाई थी कि काम के लिए सीधे जतीन दा से बोले। जवाहर से कई बार बोल चुका था लेकिन उसका जवाब भविष्य के सपने दिखाता था। वर्तमान के बारे में उसके पास कहने को कुछ भी नहीं था। क्या जतीन दा जैसे नेता को ये भी नहीं पता कि परदेस में काम के बिना किसी आदमी का क्या हाल हो सकता है? क्या उन्हें ये भी नहीं दिखता की पार्टी आफिस में एक आदमी सुबह-शाम नौकर की तरह क्यों खट रहा है?
जवाहर कहता-देखो अभी तुम्हें आए दस-पंद्रह दिन ही हुए हैं। आते ही काम के लिए कैसे कह सकते हो? यहां लोगों ने सालों संघर्ष किया है। पार्टी के लिए काम किया है। तब जाकर ये मुकाम मिला है। और तुम चाहते हो कि तुम्हें आते ही काम मिल जाय। पार्टी को इस्तेमाल की चीज मत समझो।सुरसती को वो ये बात कैसे समझाएं। अब तो बच्चों की बदहाली उससे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। अपनी भूख मार भी ले लेकिन बच्चे तो उसे ही तंग करते हैं। बच्चों की भूख की तड़प अब सुरसती के मुंह से व्यंग्य बन कर निकल रही थी। घर पहुंचते ही पूछती-क्यों नेताजी, आज भी कुछ नहीं हुआ और नरेश टूट कर रह जाता।
और आज तो हद हो गई। घर पहुंचा तो सुरसती घर पर नहीं थी। दोनों बच्चे गला फाड़-फाड़ कर रो रहे थे। पूछने पर पता चला कि सुरसती सुबह से ही गायब है। बच्चों ने सुबह से कुछ नहीं खाया था। मां के लिए तो वो रो ही रहे थे, भूख उन्हें और तड़पा रही थी।नरेश की समझ में नहीं आया कि क्या करे? पहले सुरसती को ढूंढे या बच्चों की भूख मिटाए। घर में आस-पड़ोस की औरतों की भीड़ जमी हुई थी। सब बच्चों को चुप कराने की कोशिश में जुटी थीं। ऊपर से हर तरह की बातें, तरह-तरह के कयास। नरेश के पहुंचते ही वो शुरू हो गईं।
'कहां चले जाते हैं आप लोग?'
'अरे बच्चों का तो ध्यान रखा कीजिए।'
'सुबह से इनकी मां भी गायब है।'
'अरे मां के लिए रो रो कर बुरा हाल है। बाप तो बेचारा काम के जुगाड़ में भटक रहा था।'
'अरे भूख भी लगी है इन्हें।'
'अरे कोई रोटी वगैरह लाकर दो'
और पंडिताइन रोटी लाने चली गईं। जाकर झट से चार रोटी लाईं। दोनों बच्चे खाने लगे। आंसू थम गए थे।इस मकान की यही खासियत थी। लोग एक दूसरे से झगड़ा भी करते थे लेकिन दुख के वक्त एक दूसरे के साथ खड़े भी नज़र आते थे। लेकिन जो भी हो आज उसका घर पहली बार तमाशा बन गया था। तमाशा बन गया था वो खुद, भिखारी बन गए थे उसके बच्चे और तमाशा बन गई थी सुरसती।
अब घर से भीड़ छंट गई थी। बच्चे भी चुप हो गए थे। सिर झुकाए नरेश बैठा था। कहां गई होगी सुरसती? गरीबी और अभाव से तंग आकर कहीं जान तो नहीं दे दी उसने? अक्सर वो इस तरह की बातें किया करती थीं। कहती थी-गंगा मैया ही अब सहारा है। जब बर्दाश्त नहीं होगा, जाकर उन्हीं की गोद में समा जाऊंगी। कभी कहती-रेल के आगे कूदकर जान दे दूंगी। मन बुरी तरह घबड़ा रहा था। तरह-तरह की अनिष्ट आशंकाएं मन में हावी हो रही थी। अगर ऐसा होता है तो इसका जिम्मेदार केवल और केवल वो है। वो बीवी और बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नहीं मुहैया करा सकता।किस तरह का बाप है वो? कैसा पति है वो? अगर सुरसती ने कुछ कर लिया तो वो खुद को कभी भी माफ नहीं कर सकता। वो हत्यारा है। जीते जी वो अपने बीवी और बच्चों को मार रहा है। क्या मतलब है उसकी जिंदगी का?अब वक्त बर्बाद करना ठीक नहीं था। सुरसती को खोजने जाना जरूरी था। बच्चे घर में अकेले नहीं रहना चाहते थे। छोटे-छोटे बच्चों के मासूम मन में भी शायद अनिष्ट आशंकाएं बलवती हो रही थीं। इसलिए वो पापा के साथ मां को खोजने जाने की जिद कर बैठे। नरेश उन्हें साथ लेकर निकल पड़ा।
गंगा घाट की आखिरी सीढ़ी पर सुरसती बैठी मिल गई।राहत की सांस ली थी नरेश ने। गंगा शान्त थी लेकिन सुरसती उफ़ान पर थी। नरेश के हर सवाल का जवाब चुप्पी। और फिर सवाल-'हम क्या गांव वापस नहीं लौट सकते?'
हिल उठा था नरेश। कितनी उम्मीदों से गांव से शहर आया था। अभाव और दर्द के गांव को ठेंगा दिखाते हुए। मानो ये कहते हुए-देखो, हम जा रहे हैं। हमारे लिए तुम्हारे पास रोटी और छत नहीं है तो हम भी तुम्हारी गोद में रहने को बेकरार नहीं। रहो अकेले। हम तो चलें।लेकिन शहर तो गांव से भी ज्यादा बेदर्द निकला था। शायद इसीलिए उचट गया था सुरसती का मन। दोबारा पूछा-'तुमने जवाब नहीं दिया? क्या हम गांव नहीं जा सकते?'
'कहां जाएंगे गांव में? किसके यहां जाएंगे? कौन है जो नज़रें बिछाएं हमारे लिए बैठा है? क्या करेंगे गांव में?'
'तो शहर में ही हम क्या कर रहे हैं। गांव में तो कम से कम मैं भी खेतों में मजूरी कर लूंगी। यहां दूसरों के घर जाकर चौका बर्तन करने से तो बेहतर है अपनी जमीन की सेवा करना।'
'नहीं सुरसती। हम इतनी जल्दी नहीं हारेंगे। हम लड़ेंगे?'
' कब तक , जब बच्चे भूख से दम तोड़ देंगे। '
'समझने की कोशिश करो सुरसती।हम गांव से उजड़े हुए लोग। गांव ने हमें त्याग दिया है?'
'तो शहर ने कौन सा अपना लिया है?'
इस सवाल का कोई जवाब उसके पास नहीं था। वो भी चुप बैठा रहा। बच्चे खेल रहे थे। गंगा धीर गंभीर बहती जा रही थी। मानो उनके दुख के बोझ से वो भी बुरी तरह दब गई हो।