Friday, January 3, 2014

'कसक' कहानी का आखिरी भाग



मत्स्यमुखी के दिन सुबह नहीं पहुंच पाया था अनमित्र। स्कूल से इमरजेंसी बुलाया आ गया था। उसने छुट्टी ले रखी थी, फिर भी उसे बुलाया गया था। परीक्षा के बारे में मैनेजिंग कमेटी ने आपात बैठक बुलाई थी।
वो दोपहर तीन बजे अहोना के घर पहुंचा था। खाना-पीना चल रहा था।

‘अरे, कहां रह गए थे तुम? मैंने तो सोचा तुम आओगे ही नहीं।’ मानसी दी ने दरवाजे पर ही उसे पकड़ लिया। अंदर ले जाकर बिठाया। अहोना पानी  लेकर आई।
‘चाय पिओगे?’ अहोना ने पूछा था।
‘सॉरी अहोना। अचानक स्कूल जाना पड़ गया’
‘कोई बात नहीं। परेशान ना हो’ अहोना ने कहा था।

शाम को पूरा परिवार ड्राइंग रूम में बैठा था। मां, दादा,  बौदी, जामाई बाबू, मानसी दी, अहोना सभी मौजूद थे। बाहर का केवल वही था लेकिन अब वो बाहर का था कहां। घर का ही हिस्सा बन गया था। दादा स्कूल की मीटिंग के बारे में पूछ रहे थे। वो भी टीचर थे, इसलिए उनकी  दिलचस्पी  थी। मत्स्यमुखी रस्म के साथ ही अहोना के पिताजी पूरी तरह से विदा हो गए। बस फोटो और यादों में बचे रह गए। कुछ देर बाद दादा कहीं निकल गए और फालतू की बातें होने लगी। तरह-तरह की बातें।

और इसी बातचीत में जामाई बाबू के मुंह से निकला था—अपनी अहोना के लिए तो अनमित्र जैसा ही लड़का चाहिए।

सबने समर्थन किया था। अहोना ने सिर झुका लिया था। अनमित्र भी मानो शॉक्ड रह गया था। जामाई बाबू ने कहा था—अनमित्र जैसा और अनमित्र के कानों में गूंज रहा था—अनमित्र, अनमित्र, अनमित्र, अनमित्र-अहोना, अनमित्र-अहोना, अनमित्र-अहोना...

लेकिन आज वो समझ पाया था अनमित्र जैसा का मतलब अनमित्र नहीं होता। वो भास्कर होता है। वो भास्कर, जिसके साथ अहोना ने सफल दांपत्य जीवन बिताया था। वो भास्कर, जिसने अहोना को दी थी जिंदगी भर की खुशियां। वो भास्कर, जिसने अहोना को दिया था भरा-पूरा परिवार। वो भास्कर, जिसे आज भी बहुत मिस करती है अहोना।

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‘अपने बारे में कुछ नहीं बताया’ अहोना ने उसकी तंद्रा तोड़ी थी।
हंसा था अनमित्र, ‘मैं अनमित्र बनर्जी, रिटायर्ड टीचर’

अहोना ने गुस्से से उसकी तरफ देखा, ‘हर बात पर मजाक कैसे कर लेते हैं?’

‘गुस्से में तुम्हारी आंखें आज भी उतनी ही सुंदर लगती है, जैसे पहले लगती थी। कॉलेज के एनुअल फंक्शन के दौरान लिपिस्टिक वाली बात पर भी तुमने मुझे ऐसे ही देखा था।’ अनमित्र ने हंसने की असफल कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाया। अहोना  का मन घबड़ाने लगा। आखिर  क्या छिपा रहा है अनमित्र?

तभी एनाउंसमेंट हुआ था—डानकुनि जाने वाली ट्रेन फोर ए नंबर प्लेटफॉर्म से छूटेगी।

अनमित्र ने कहा, ‘तुम्हारी ट्रेन आ रही है। चलो मैं तुम्हें बिठा देता हूं।’

‘डानकुनि के लिए बहुत ट्रेनें आएंगी। आखिर तुम क्या छिपाने की कोशिश कर रहे हो?’ अहोना परेशान हो गई, ‘क्या तुम किसी तकलीफ में हो?’

अनमित्र ने कातर निगाहों से अहोना की ओर देखा था। उसकी आंखें भर आईं।
अहोना दर्द की आग में झुलस गई। ये क्या देख रही है वो? अनमित्र की आंखों में आंसू। कितना मजबूत, कितना प्रभावी व्यक्तित्व हुआ करता था उसका, वो रो रहा है। उसने ध्यान से अनमित्र की ओर देखा। दाढ़ी बेतरतीब बढ़ी हुई थी। पैंट-शर्ट भी साधारण सा। पैर में मामूली सी चप्पल। ये क्या उसका वही अनमित्र है, जिसे देख कर मन को सकून मिलता था। उसकी बातों से आत्मविश्वास बढ़ जाता है। उसने अनमित्र का एक हाथ पकड़ लिया।

‘क्या हुआ अनमित्र?’

अनमित्र झेंप गया। उसे इतना कमजोर नहीं पड़ना चाहिए था। वो इतना कमजोर नहीं है।

‘कुछ नहीं, तुम गलत समझ रही हो। आंख में ऐसे ही पानी आ गया। आज ही डॉक्टर दिखाउंगा’ जेब से रूमाल निकाल कर आंखें पोंछते हुए उसने कहा।

‘मुझसे तुम कभी झूठ नहीं बोल पाए अनमित्र। आज भी तुम्हारी झूठ मेरे सामने नहीं टिकने वाली। क्या बात है बताओ ना? क्या तुमने मुझे इतना पराया कर दिया है कि अपना दर्द भी मुझसे नहीं बांट सकते।’ अहोना की आवाज़ भर्रा गई।

अनमित्र के चेहरे पर दर्द उभर आया। उसने अहोना को भरपूर नजरों से देखा और वो सवाल पूछ ही बैठा, जिसे वो इतनी देर से अपने मन में दबा कर रखा था, ‘अहोना, क्या तुम्हें कभी मेरी याद नहीं आई, कभी मुझे मिस नहीं किया? कभी मेरा हालचाल जानने की कोशिश नहीं की।’

‘तुमने भी तो कभी मेरी ख़बर नहीं ली है।’ उसने उल्टे आरोप मढ़ दिया था।

जवाब नहीं था उसके पास। जब आदमी अपनी दुनिया, अपने संसार में मगन हो जाता है तो फिर कहां मिलता है वक्त? पति. बच्चे, ससुराल। ऐसा नहीं कि याद नहीं आई कभी लेकिन हालचाल पता करने की ताकीद कभी अंदर से महसूस नहीं  की थी उसने।

‘ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है अहोना। वैसे मैं जामाई बाबू से दो-तीन बार मिला था। तुम्हारे बारे में पता किया था। तुम अपने संसार में सुखी थी।’

अहोना चुप रह गई। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने कहा, ‘’तुम पता नहीं कहां गायब हो गए? मिलने को कितना जी करता लेकिन तुम काम में इतने बिजी हो गए कि अहोना को भूल ही गए।’

‘भूल गया?’ अनमित्र ने हैरानी से अहोना की ओर देखा था। आज भी उसकी यादों के सहारे वो जिंदा है और अहोना कह रही है कि वो उसे भूल गया।

‘और नहीं तो क्या?’ अहोना की आवाज़ में उलाहना थी, ‘पिताजी के श्राद्ध के बाद तो तुम मानो गायब ही हो गए। कितनी बार मिलने आए तुम मुझसे?’

‘गायब नहीं हुआ। कांचरापाड़ा में ही रहता था। तुमने मेरा घर भी देखा था। तुमने कभी मुझे मिस ही नहीं किया, अगर किया होता तो मेरे  घर आ सकती थी। मैं रोज सोचता तुम्हारे यहां  आऊं लेकिन चाह कर भी नहीं  जा पाता। तुम्हारे घर के आसपास  भी  टहल आता लेकिन दरवाजे पर  दस्तक नहीं दे पाया।’

अहोना ने बड़ी हैरानी से अनमित्र की ओर देखा, ‘मगर क्यों?’

‘पता नहीं क्यों। अंदर से हिम्मत ही नहीं होती थी। शायद मेरे मन में कोई चोर था। एक बार हिम्मत जुटा कर   गया भी था तो तुम मानसी दी के घर गई थी और पता चला कि कई दिनों के लिए गई हुई थी। बौदी मिली थी।’

‘एक बार नहीं मिली तो इसका मतबल ये थोड़े ही था कि तुम घर आना ही बंद कर दो। मैं तुम्हें अक्सर ही याद करती थी।’

‘और मैं हमेशा’ अनमित्र ने गहरी सांस ली, ‘और एक दिन जब देर रात घर लौटा तो मां ने तुम्हारी शादी का कार्ड थमाया था। अहोना वेड्स भास्कर’

‘हां, शादी का कार्ड देने मैं और जामाई बाबू गए थे लेकिन तुम नहीं मिले थे।
शादी में भी तो तुम नहीं आए। सबने तुम्हें बहुत मिस किया?’

‘और तुमने?’ अनमित्र ने सवालिया निगाहों से उसकी ओर देखा था।

बहुत देर चुप्पी छाई रही। फिर अहोना ने धीरे से पूछा, ‘तुम आये क्यों नहीं?’
चुप रहा अनमित्र। क्या जवाब देता कि वो।

‘छोड़ो, बहुत पुरानी बातें हो गईं। अब इन बातों में क्या रखा है? तुम्हारी शादी का गिफ्ट जरूर बाकी है। अगर कहो तो...’

‘चुप भी रहो’ अहोना झुंझला गई, ‘अब जब भास्कर ही नहीं रहे तो फिर शादी का गिफ्ट।’

अनमित्र महसूस कर रहा था कि भास्कर के बिना जिंदगी काटना किस तरह अहोना के लिए मुश्किल हो रहा था।
‘सॉरी, मेरा मतलब वो नहीं था।’

‘तुमने अपने बारे में अभी तक नहीं बताया?’ अहोना ने कहा।
‘क्या बताऊं अपने बारे में? बताने लायक कुछ भी तो नहीं है। अकेली जिंदगी। छोटा सा रूम। पेंशन का पैसा। बस यही है मेरी जिंदगी।’
‘शादी नहीं की तुमने?’
‘क्यों ऐसा क्यों लगा तुम्हें?’ अनमित्र ने शरारत भरे अंदाज़ में पूछा ’ कहीं तुमने ये तो नहीं सोच लिया था कि तुम शादी करके चली जाओगी तो मैं सारी जिंदगी कुंआरा ही बैठा रह जाऊंगा।’

अहोना ने आंखें तरेर कर उसकी ओर देखा। अनमित्र हंस पड़ा। हालांकि वो तत्काल झेंप भी गया। पहली बार उसने अहोना से इस तरह की बात की थी। झेंप मिटाने के लिए गंभीर होना पड़ा।

‘शादी करने का शायद वक्त ही नहीं मिला या सच कहो तो इस बारे में सोच ही नहीं पाया।‘

अहोना सन्न रह गई।

‘मगर क्यों?’

‘वजह तो कोई खास नहीं थी, बस ये समझ लो कि मेरी कुंडली में शादी नहीं थी। बड़दा (भैया) ने शादी नहीं की तो मैंने भी इस बारे में नहीं सोचा। स्कूल में मास्टरी के साथ-साथ समाजसेवा के कामों में जुट गया तो फिर वक्त ही नहीं मिला।’

दोनों चुप रहे।

‘पूरी जिंदगी अकेले काट दी?’ अहोना की आवाज़ में दर्द था।

‘नहीं, मेरे पास तुम्हारे साथ बिताए एक एक पल की यादें थी। खासकर उन 15 दिनों की यादें, जो बाबा की मृत्यु के बाद तुम्हारे  साथ बिता था। शादी करता तो शायद वो खूबसूरत यादें दूसरी जिम्मेदारियों की धूल तले दब जातीं। जो हुआ, ठीक ही हुआ”अनमित्र की आवाज बिल्कुल सपाट थी।

फिर कभी खत्म ना होने वाली एक चुप्पी  छा गई।

अचानक सुबक-सुबक कर रो पड़ी थी अहोना।

ये आंसू उसके अकेलेपन पर था। उसके दर्द पर था या शायद उन दोनों के दर्द पर था। शायद कोई कसक थी, जो दोनों को कचोट रही थी लेकिन आंसू अहोना की आंखों से बह निकले। अनमित्र की उंगलियां आज उसके आंसू नहीं पोंछ पाई। आज अहोना की आंखों से दर्द बह रहे थे। काफी देर दोनों चुपचाप बैठे रहे। हाथ में आधा पैकेट झालमुड़ी वैसे ही पड़ा रहा और अब तो नरम भी हो गया था। ट्रेनों के आने-जाने का ऐलान होता रहा। स्टेशन पर अचानक शोर का  सैलाब उमड़ता, फिर करीब-करीब सन्नाटा छा जाता। लेकिन उन दोनों के मन में सन्नाटा था। ऐसा सन्नाटा जो बहुत गहरे उतर गया था। इतने गहरे कि वो दोनों मानों भूल ही गए थे कि वो एक दूसरे के पास बैठे हुए हैं। दोनों मानो भूल गए थे कि उन्हें अपने अपने घर जाना है। एक को कांचरापाड़ा तो दूसरे को डानकुनी। जिंदगी की ढलान पर एक अजीब सी कसक ने उन दोनों को जड़ कर दिया था। आसमान में आज भी वो तारे टिमटिमा रहे थे, जिन्होंने कभी अनमित्र को अहोना के आंसू पोंछते देखा था।


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