Thursday, January 2, 2014

'कसक' कहानी की चौथी किस्त



हां, वो था। अहोना के पास। हर वक्त। दिन भर।
उसे याद है दिसंबर की वो दुपहरी, जब उसे अंकल यानि अहोने के पिता के दिल के दौरे के बारे में पता चला था। भागा-भागा पहुंचा था वो कल्याणी के गांधी अस्पताल में। अंकल सीरियस थे। अंकल के साथ कभी उसकी बातचीत नहीं हुई थी। वो जब कभी अहोना के घर गया, अंकल को बाहर के चबूतरे पर बैठे हुए पाया था। अगर कभी कभार ड्राइंग रूम में होते भी थे तो तब हट जाते थे, जब भी अहोना का कोई दोस्त या सहेली आते थे। उनका फलसफा साफ था कि बच्चों के मामले में कोई दखलंदाजी नहीं।

जिस आदमी के साथ कभी कोई बातचीत ही नहीं हुई हो, उसके लिए वो भागा-भागा सिर्फ इसलिए गया था क्योंकि वो अहोना के पिता भी थे।

कॉलेज कब के खत्म हो गए थे। अनमित्र को केंद्रीय विद्यालय में नौकरी मिल गई थी। अहोना को नौकरी वगैरह में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हां, घर पर ट्यूशन खूब पढ़ाती थी। कोर्स की कुछ किताबें भी लिख रही थीं। कॉलेज खत्म होने के बाद अहोना से मिलना जुलना कम हो गया था। कभी कभार उसके घर चला जाता। अहोना और उसकी दीदी से खूब गप्पें होतीं। चाय का दौर चलता लेकिन ये सब कुछ अहोना की बौदी (भाभी) को बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती थी। अहोना ने भी उसे ये बात बताई थी। ऐसे फिकरे कस कर चली जाती थी कि फिर वहां बैठना भारी लगता। इसलिए अहोना को देखने, उससे मिलने की इच्छा होने के बावजूद उसका अहोना के घर आना जाना धीरे-धीरे कम होता गया। शायद अब तीन चार महीने बाद कभी किसी बहाने बारी आ जाती। इसके लिए भी अनमित्र को भी कोई ना कोई बहाना ढूंढना पड़ता। आज की तरह तब मोबाइल फोन तो था नहीं कि उठाते और बात कर लेते।

उसकी बड़ी इच्छा होती कि अहोना को कहीं बाहर बुलाए। उसके साथ घंटों बातें करे, वक्त गुजारे लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाया। उसे पता था कि अहोना नहीं आएगी, इसलिए उसने कभी उसे बुलाने की कोशिश नहीं की। हालांकि उसने कभी ये जानने की भी कोशिश नहीं की कि उसके बुलाने पर अहोना आती या नहीं।

और इसी बीच अंकल के बीमार होने की खबर पहुंची थी। भागा-भागा गया था। शायद अहोना से मिलने की उम्मीद भी थी। अहोना अस्पताल में ही मिली थी। बौदी, मां, दीदी के बीच रूआंसा होकर बैठी हुई थी। उसे देख दादा को कुछ भरोसा हुआ था। दादा से उसके संबंध ठीक ठाक थे। छात्र जीवन में भी अक्सर बातचीत होती थी। खासकर पढ़ाई को लेकर। दादा ने बताया था सीरियस हैं। आईसीयू में हैं। अनमित्र का चेहरा भी उतर गया।

उसने देखा दूर बेंच पर बैठी हुई थी अहोना। एकदम उदास। जैसे उसके लिए दुनिया में कोई सुख बचा ही नहीं हो। सबकुछ मानो खत्म हो गया हो। सूजी आंखें इस बात की चुगली कर रही थी कि खूब रोई थी अहोना। पिता की चहेती थी। तीन भाई बहनों में सबसे छोटी। दादा और मानसी दीदी से काफी छोटी थी अहोना और इसलिए पिता का भरपूर प्यार उसे मिला। पिता के बिना उसका भी एक काम नहीं चलता था। सच कहा जाय तो मां से ज्यादा करीब वो पिता के थी। और वही पिता आज आईसीयू में मौत से लड़ रहे थे। अहोना के पास जाने की हिम्मत नहीं हुई उसको। वो भी दूर दादा के पास ही बैठा रहा।

अंकल चले गए। अहोना को रोता-बिलखता छोड़। अहोना तब तक रोती रही, जब तक उसके आंसू सूख नहीं गए। कलेजा पत्थर का नहीं हो गया। और जब अंकल की आखिरी यात्रा शुरू हुई तो सारा  लोकलाज भूलकर अहोना अनमित्र से चिपक कर दहाड़े मार पड़ीं। मानो कह रही हो कि बाबा तो चले गए तुम साथ छोड़ कर ना जाना। अनमित्र भी रो पड़ा। अहोना का दर्द उसकी रगों में दौड़ने लगा था।
और मानो तब से ही वो इस इस दर्द को जी रहा है। अहोना से बिछड़ने का दर्द।

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अनमित्र ने सिर झटक दिया। एक मीठी सी महिला आवाज़ में हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला में बारी बारी से उद्घोषणा हो रही थी कि बनगांव जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 5 से रवाना होने वाली है। अनमित्र ने सिर को झटक दिया।
पता नहीं डानकुनी वाली लोकल किस प्लेटफॉर्म पर आएगी?’ अहोना को घर जाने की जल्दी हो रही थी।
चली भी जाना। इतनी जल्दी क्या है?’ अनमित्र ने टोका था।
नहीं, बच्चे चिंता कर रहे होंगे?’ कभी मां-बाप-भाई के डर से घर जल्दी जाना चाहती थी, आज बच्चों की चिंता सता रही है। उसके लिए तो अहोना के पास कभी समय ही नहीं था। बेवजह वो जिंदगी पर कलपता रहा। कोफ्त हुई अनमित्र को लेकिन फिर उसे लगा कि अहोना सही है, वही गलत है। उसकी चिंता करने वाले लोग हैं तो चिंता तो करेंगे ही। सब उसकी तरह तो नहीं कि कोई ... किरण की बहुत ही धुंधली से तस्वीर उसके जेहन में आई और मानो उसे मुंह चिढ़ाती हुई विलीन हो गई। उसने सिर झटक दिया।
बच्चे क्या कर रहे हैं?—इस सवाल के जरिए शायद अनमित्र ये भी जानना चाहता था कि कितने बच्चे हैं उसके।
बेटी की शादी हो गई है। बैंगलोर में पति के साथ रहती है। यहां बेटा और बहू हैं।
बहुत अच्छा। भरा पूरा परिवार है। दादी भी बन गई होगी?’
दादी नहीं, नानी जरूर बन गई हूं। दो साल का नाती है। दादी कब बनूंगी पता नहीं। बेटा-बहू दोनों नौकरी करते हैं। अभी बच्चा नहीं चाहते। नए जमाने के बच्चे हैं, अपने हिसाब से प्लान करेंगे। गहरी सांस लेते हुए अहोना ने कहा।
देख कर लगता नहीं नानी बन गई हो। अनमित्र ने कहा। कहीं न कहीं उसके मन में कसक की एक गहरी लहर एक ओर से दूसरी ओर दौड़ गई। अच्छी ही जिंदगी कटी भास्कर बाबू के साथ। भरा पूरा परिवार। नाती-बेटा बहू। 

छी छी छी, वो अपनी अहोना से जल रहा है। कितना स्वार्थी हो गया है। भला वो ऐसा कैसे सोच सकता है। लेकिन सच भी तो यही है। उसके पास क्या है आज? कुछ भी तो नहीं। शायद अहोना ने उसे कभी प्रेम ही नहीं किया। अच्छी दोस्ती थी, जिसे वो प्यार समझकर जीता रहा लेकिन फिर वो 15 दिन? वो सच था या धोखा था। अहोना के पिता के निधन के बाद के वो 15 दिन, जब अहोना उसके दिल के बिल्कुल करीब आ गई थी। उसकी भाभी, दीदी सबने अलग-अलग तरह से इस बात की इशारा किया था। उसके पास तो बस वो ही 15 दिन बचे हैं। उन्हीं 15 दिनों की यादें।

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अहोना के पिता के गुजरे आज पांच दिन हो गए थे। घर के सभी लोग सदमे से उबरकर जिदंगी की पटरी पर लौट रहे थे। तरह-तरह के कर्मकांड चल रहे थे। घर में रिश्तेदारों की भीड़ थे और सब अनमित्र को जान गए थे। मानो घर का अहम सदस्य बन गया था अनमित्र।

कोई भी काम हो, हर ओर से एक ही आवाज आती थीअनमित्र, अनमित्र, अनमित्र।

हैरानी तो इस बात की थी कि बात-बात पर ताना मारने वाली बौदी ने भी अब अनमित्र को अपना लिया था। वो अनमित्र से बहुत प्रभावित थी।

और अहोना। उसे तो मानो सबकुछ मिल गया था। कम से कम उसके बर्ताब से अनमित्र ने यही समझा था। अनमित्र को ऐसा लगा था मानो अगर वो नहीं होता इतनी जल्दी नहीं संभल पाती अहोना।

खुद बौदी ने ही कहा था, अन्नू, तुमने संभाल लिया अहोना को। अगर तुम नहीं होते तो पता नहीं अहोना का क्या होता? बाबा की लाडली थी।

अहोना सिर झुकाए बैठी रही। दोपहर के खाने के बाद रोज ऐसी ही बैठकें होती थी। सब एक साथ बैठकर गप्पें मारतें। दुख कम होता। पिताजी के जाने का गम भूल जाते। एक कोने में मां भी गुमसुम बैठी रहती। कभी कभी वो भी कुछ बोल देतीं।

मानसी दीदी ने भी बौदी का समर्थन किया।
सिर्फ मेरी ही बात क्यों करते हो, अनमित्र ने तो पूरे घर को संभाल लिया। अगर वो नहीं होता तो...
सच कहामां ने कहा, बेटा, तुम्हारी लंबी उम्र हो।
अहोना से भी अक्सर अकेले में बात हो जाया करती। अहोना खास तौर पर उसका ख्याल रखती। खाना खाया कि नही, नाश्ता किया कि नहीं, चाय पी की नहीं। रात होते ही अहोना को ही उसकी सबसे ज्यादा चिंता होती। जल्दी निकल जाओ। देर हो रही है। देर हो रही है तो यहीं रुक जाओ। अनमित्र को बहुत अच्छा लगता था। अहोना उसके बारे में इतना सोचती है।
श्राद्ध से पहले दिन वाली रात को वो अहोना के यहां ही रूक गया था। दादा ने खास तौर पर कहा था। सारी जिम्मेदारी अनमित्र पर ही थी। टेंट वाले से लेकर हलवाई तक उसी ने ठीक किया था। आज सब्जी बाजार करते करते भी देर हो गई थी। दादा ने कहा था, अनमित्र यहीं रूक जाओगे तो अच्छा रहेगा। कल सुबह ही हलवाई-टेंट वाले सभी पहुंच जाएंगे।
ठीक है दादा अनमित्र ही जवाब दिया था।
उस रात अहोना के साथ देर तक बातें हुई थीं।
अहोना ने पिताजी, दादा, बौदी, मानसी दी, जामाई बाबू सबके बारे में बातें की थीं। पापा की बातें करते करते कई बार अहोना की आंखें भर आई थीं। अनमित्र ने अपनी अंगुलियों से उसकी आंखें पोंछ दी थी। प्रतिरोध नहीं किया था अहोना ने। अहोना को अपने दिल के इतने करीब पहली बार पाया था उसने। आसमान में उगे हजारों टिमटिमाते  तारे इसके गवाह थे।

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श्राद्ध के दिन अनमित्र सुबह से ही काम में ऐसा फंसा कि उसे खाने तक की फुरसत नहीं मिली। दोपहर को पांडाल में ही घर के सभी लोगों ने खाना खाया। अनमित्र भी परिवेशन (खाना परोसने) में जुटा हुआ था। उसके बाद अहोना ने जबरन उसे खाना खिलाने बिठा दिया था, जामाई बाबू के साथ। जामाई बाबू भी सुबह से काम में लगे हुए थे। अहोना और मानसी दी ने खुद खाना परोसा था। अहोना ने पूरी कोशिश की थी कि अनमित्र को ठूस ठूस कर खाना खिला दिया जाय। पता नहीं रात को कब खाने का वक्त मिले।
अहोना का पूरा परिवार मान गया था कि दोस्त हो तो अनमित्र जैसा।
बौदी ने कहा था, अनमित्र, तुमने जो किया, कोई अपना भी नहीं करता। बीच-बीच में आते रहना।
उस दिन देर रात जब वो अहोना  के  घर से निकला था तो सिर्फ थका ही नहीं था, बुझा हुआ भी था। अहोना की पारिवारिक त्रासदी से उसके स्वार्थ की भी सिद्धि हुई थी। ज्यादा के ज्यादा वक्त अहोना के करीब रहने के स्वार्थ की। नहीं, नहीं ये स्वार्थ नहीं, उसका प्यार है। उसने जो भी किया निस्वार्थ भाव से किया। अहोना के लिए किया, दादा के लिए किया, आंटी के लिए किया।
अहोना दरवाजे तक छोड़ने आई थी, परसों सुबह ही आ जाना। मत्स्यमुखी का आयोजन है।

उसने सिर हिलाकर सहमति दी। मत्स्यमुखी श्राद्ध के बाद होने वाली रस्म। उस दिन मछली बनती है और फिर उस दिन से लोग मछली खाना शुरू कर देते हैं। वो आएगा, जरूर आएगा।

कल पढ़ें कहानी का आखिरी भाग

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