Wednesday, January 1, 2014

मेरी कहानी कसक की तीसरी किस्त

कसक---भाग 3

उसे याद है उस दिन वो देर रात घर लौटा था। खाना भी नहीं खाया था। बस अहोना का रुआंसा चेहरा, उसकी लिपस्टिक, लंबी-लंबी बालियां उसकी आंखों के आगे घूमता रहा और कान पर श्रावणी के बुद्धू शब्द हथौड़े बन कर पड़ते रहे। अहोना की जिंदगी में उसकी बातों की इतनी अहमियत? इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था। तो क्या....???? कल अहोना से बात करेगा वो।

दूसरे दिन कॉलेज में अहोना बिल्कुल शांत और सामान्य दिखी। लगा ही नहीं कि कल कुछ हुआ था। लगा ही नहीं कि कल उसके मजाक की वजह से वो प्रोग्राम छोड़ कर चली गई थी। सब कुछ सामान्य। पूरे ग्रुप के साथ वही हंसी मजाक। क्लास । कैंटीन में एक दूसर का लंच छीन-झपटकर खाना। उसके साथ भी कोई नाराजगी नहीं। और ये सामान्य बर्ताव उसे खटक रहा था। वो अहोना से अकेले में बात करना चाहता था लेकिन मौका नहीं मिल पा रहा था।
जब लंच हो गया और सब कैंटीन से जाने लगे तो उसने आखिरकार कह ही दिया—अहोना, तुम रूकना, मुझे तुमसे कुछ बातें करनी है।

हां, कहो

अभी नहीं, अकेले में बात करनी है
ओय होय—अकेले में क्या बात करनी है?’ सोमा ने चुटकी ली।
हम दोस्तों के बीच ये अकेले-अकेले की बात कहां से आ गई?’ गरिमा को मानो गुस्सा आ गया इससे पहले तो अकेले-अकेले में हमने कभी कोई बात नहीं की
अभी रूक भी नहीं सकते। क्लास का टाइम भी हो रहा है झेंपती अहोना ने टालने के अंदाज में कहा।
है कुछ जरूरी बात। तुम लोग दिल पर मत लो अनमित्र ने दोस्तों को समझाने की कोशिश की, जी डी सर की क्लास की चिंता तुम्हें कब से होने लगी। समझ में आता भी है कुछ
रूक जा ना। सुन भी ले क्या बात है। क्लास में जो पढ़ाई होगी, तुम्हें हम बता देंगे अब तक चुप रही श्रावणी ने कहा था। फिर सब चले गए थे। श्रावणी की संजीदगी अनमित्र को हमेशा अच्छी लगी थी। वो चीजों को इतने अच्छे से हैंडल करती थी कि बस पूछो मत। शायद श्रावणी ने उन दोनों के बीच बढ़ रही करीबी को समझ लिया था।
दोनों अकेले रहे गए। पहली बार दोनों के बीच ये अकेलापन भारी पड़ रहा था।
कहो क्या कहना है
तुम कल प्रोग्राम देखे बिना क्यों चली गई थी?’ अनमित्र ने सीधे सवाल पूछा था।
यूं ही तबीयत ठीक नहीं लग रही थी, इसलिए चली गई थी। अहोना ने मानो कुछ छिपाने की कोशिश की।
तो मुझे बताया होता। रोज मैं तुम्हारे साथ जाता हूं तो कल जब तबीयत खराब थी तो अकेले क्यों चली गई?’
मेरी वजह से तुम प्रोग्राम देखे बिना क्यों जाते। वैसे भी तुम मेरे बॉडीगार्ड थोड़े ही हो?’ कटाक्ष करने में वो उस्ताद थी।
नहीं तुम्हारी तबीयत खराब नहीं थी। मेरा मजाक तुम्हें खराब लग गया था और इसलिए तुम चली गई थी
नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. वैसे मैंने फैसला किया है कि आज के बाद से मैं ना तो लिपस्टिक लगाउंगी, ना ही लंबी बाली पहनूंगी
ये कोई बात नहीं हुई अनमित्र ने समझाने की कोशिश की थी, लिपस्टिक और बाली तुम पर बहुत फब रहे थे, मैंने यूं ही मजाक किया था। मैं सॉरी बोलता हूं।
अब चलें?’ उसने सीधे टॉपिक बदल दिया था।  बात खत्म हो गई थी लेकिन बात क्या सचमुच खत्म हो गई थी। अनमित्र के बुद्धू दिमाग ने जितना समझा था, उसके मुताबिक तो बात उसी दिन शुरू हुई थी। हालांकि बहुत कुछ सोच कर गया था वो लेकिन कह कुछ नहीं पाया था। अहोना ने भी बोलने का मौका कहां दिया!

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आज कह रही है कि तुम नहीं समझ पाओगे। उस दिन खुद कुछ समझने को तैयार नहीं थी लेकिन उस दिन भी वही बुद्धू था और आज भी वही बुद्धू।
देखो उलजलूल की बातें कर रहे हैं, असली सवाल तो पूछा ही नहीं। कैसी हो तुम?’ अनमित्र ने टॉपिक बदलने की कोशिश की।
तुम्हें कैसी लग रही हूं?’ फिर वही कटाक्ष। शायद सवाल के जरिए ये बताने की कोशिश कि तुम्हारे बिना भी अच्छी हूं और बहुत अच्छी हूं।
चुप रहा अनमित्र। प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के आते ही स्टेशन का अचानक उठता शोर बीच बीच में उन दोनों के बीच  दीवार बन कर खड़ा हो जाता। लाउडस्पीकर पर लगातार ट्रेनों की आवाजाही के बारे में उद्घोषणा भी जारी थी।
झालमुड़ी खाओगी?’ अनमित्र ने पूछा,इंडियन रेलवे झालमुड़ी—आईआरजे—तुम्हें बहुत पसंद है ना?’
पसंद, हां लेकिन बरसों हो गया नहीं खाया। ट्रेन से अब कहां आना जाना होता है।
लगता है कार वाली बन गई हो।अनमित्र की बात पर अहोना के होंठों पर हंसी तैर गई।
उसने दो झालमुड़ी का ऑर्डर दे दिया। एक में मिर्च ज्यादा। अहोना के लिए। झालमुड़ी के बहाने एक बार फिर उन दोनों का कॉलेज लाइफ उनके बीच लौट आया।
याद है, इस आईआरजे को लेकर कितना ऊधम मचता था। पैसे नहीं होते तो एक झालमुड़ी और पांच लोग इस बार अहोना ने कहा था।
अनमित्र को अच्छा लगा। चलो अहोना को कुछ बातें तो याद है।
हां याद है। तब झालमुड़ी का हिस्सा नहीं मिलने या कम मिलने पर भी इतनी तसल्ली-इतना आनन्द मिलता था, जो आज पूरा का पूरा पॉकेट झालमुड़ी मिलने पर भी नहीं मिलेता
इसका नाम इंडियन रेलवे झालमुड़ी किसने रखा था?’ अहोना शायद भूल गई थी।
लंबू ने। सोमा ने। कहां है वो,कोई खबर है उसकी?’
नहीं, सुना था बैंगलोर चली गई थी। उसका पति वहीं काम करता था। उसके बाद किसी से संपर्क नहीं हुआ। तुम भी तो अचानक ही मिल गए आज। कभी पता करने की कोशिश ही नहीं की कि कहां हूं किस हाल में हूं—अहोना की बातों में ताना था तो शायद उस उम्मीद के टूटने का दर्द भी था, जो उसने अनमित्र से लगा रखी थी कि कम से कम वो उसका हालचाल तो लेता।
भूला नहीं कभी किसी को लेकिन हालचाल भी पता नहीं कर पाया। शादी के बाद लड़कियों का हालचाल जानने की कोशिश करना शायद ठीक नहीं था। तुम्हारे पति संदेह कर बैठते तो?’ अनमित्र ने मजाक के लहजे में ही अपने मन का डर बता दिया था.
मेरे पति वैसे इंसान नहीं थे
नहीं थे...मतलब अनमित्र ने हैरानी से अहोना की ओर देखा। अब उसने ध्यान से देखा—उसने सिंदूर नहीं पहना हुआ था।
हां, भास्कर को गए पांच साल हो गए
ओहअनमित्र के चेहरे पर दर्द उमड़ आया,पांच साल! तुम्हारी तकलीफ के वक्त भी मैं तुम्हारे पास नहीं था
हां, बच्चे तो थे लेकिन तुम्हारी कमी खली थी मुझे अहोना ने कहा
अहोना के मुंह से ये बात सुनकर अनमित्र मानो दर्द का पहाड़ बन गया। पहली बार अहोना ने माना तो सही कि उसकी कमी उसे खली थी। जिंदगी की पथरीली-उबड़खाबड़ रास्तों पर अहोना को उसकी जरूरत थी लेकिन वो साथ नहीं था। वो अपने सबसे अच्छे दोस्त का दर्द का साथी नहीं बन पाया।
दोस्त क्या केवल दोस्त कहना सही रहेगा। हां, अनमित्र ने खुद को ही जवाब दिया था—दोस्त से ज्यादा खूबसूरत शब्द शायद दूसरा कोई नहीं।

पिता जी की मौत के बाद सबसे ज्यादा भास्कर का जाना मुझे तोड़ गया अहोना ने उसे सोच की दुनिया से बाहर खींचा था, लेकिन तब तुम मेरे साथ थे, हर पल लेकिन जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा  जरूरत थी, तुम मेरे  पास नहीं थे।

जारी...

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